सुर्ख़ियों में क्यों?
सरकार ने लघु जलविद्युत विकास योजना को स्वीकृति प्रदान की है। इसका उद्देश्य देश में लघु जलविद्युत परियोजनाओं के विकास को बढ़ावा देना है।
भारत में लघु जलविद्युत परियोजनाएं
- लघु जलविद्युत परियोजनाएं ऐसी जलविद्युत परियोजनाएं हैं जिनकी स्थापित क्षमता 25 मेगावाट (MW) तक होती है। इनका प्रशासन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा किया जाता है।
- बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं: 25 मेगावाट से अधिक क्षमता वाली परियोजनाओं का प्रशासन विद्युत मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

- रन-ऑफ-द-रिवर (RoR) परियोजनाएं: ऐसी जलविद्युत परियोजनाएं जो बड़े बांधों या जलाशयों के निर्माण के बिना, नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करके विद्युत उत्पादन करती हैं।
- स्थापित क्षमता: लगभग 5,171 मेगावाट (2026 की शुरुआत तक)।
- संभावित क्षमता: भारत में 7,133 चिन्हित स्थलों पर 21,133.61 मेगावाट लघु जलविद्युत क्षमता का अनुमान है। इसमें से अब तक केवल 24.5% क्षमता का ही दोहन किया गया है।
- सर्वाधिक संभावित क्षेत्र: उत्तरी क्षेत्र, जहां 7,978 मेगावाट (कुल SHP क्षमता का लगभग 38%) संभावित क्षमता उपलब्ध है।
- अग्रणी राज्य: हिमाचल प्रदेश, जहां 3,460 मेगावाट लघु जलविद्युत क्षमता उपलब्ध है।
लघु जलविद्युत विकास योजना के बारे में
- संबंधित मंत्रालय: नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE)।
- अवधि: पांच वर्ष (2026–27 से 2030–31 तक)।
- कुल परिव्यय: ₹2,584.60 करोड़।
- उद्देश्य: लघु जलविद्युत परियोजनाओं के विकास में तेजी लाना तथा विशेष रूप से पर्वतीय एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में भारत की अप्रयुक्त जलविद्युत क्षमता का दोहन करना।
- लक्ष्य: लगभग 1,500 मेगावाट नई लघु जलविद्युत क्षमता का विकास।
- कवरेज: 1 मेगावाट से 25 मेगावाट स्थापित क्षमता वाली लघु जलविद्युत परियोजनाएं।
- प्राथमिकता वाले क्षेत्र: पर्वतीय राज्य, उत्तर-पूर्वी राज्य, अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे जिले तथा दूरस्थ क्षेत्र।
योजना की प्रमुख विशेषताएं
- वित्तीय सहायता संरचना
- उत्तर-पूर्वी राज्य एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे जिले: ₹3.6 करोड़ प्रति मेगावाट अथवा परियोजना लागत का 30% (जो भी कम हो) की वित्तीय सहायता। प्रति परियोजना अधिकतम ₹30 करोड़ की सीमा।
- अन्य क्षेत्र:
- ₹2.4 करोड़ प्रति मेगावाट अथवा परियोजना लागत का 20% (जो भी कम हो) की वित्तीय सहायता।
- प्रति परियोजना अधिकतम ₹20 करोड़ की सीमा।
- पाइपलाइन विकास एवं विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) सहायता
- DPR सहायता: न्यूनतम 200 परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार करने हेतु वित्तीय सहायता।
- परियोजना पाइपलाइन विकास: एक मजबूत भावी परियोजनाओं पाइपलाइन विकसित करने के लिए केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियों को ₹30 करोड़ का पृथक आवंटन।
- निवेश एवं आर्थिक प्रभाव
- निवेश जुटाना: लघु जलविद्युत क्षेत्रक में लगभग ₹15,000 करोड़ के निवेश को आकर्षित करने की संभावना।
- आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा: स्वदेशी संयंत्र एवं मशीनरी के उपयोग को प्रोत्साहित कर घरेलू विनिर्माण तथा आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना।
- रोजगार सृजन
- निर्माण चरण में रोजगार: निर्माण अवधि के दौरान लगभग 51 लाख मानव-दिवस के रोजगार का सृजन।
- दीर्घकालिक आजीविका: विशेष रूप से ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में संचालन एवं अनुरक्षण (Operation & Maintenance) के माध्यम से स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।
लघु जलविद्युत का महत्त्व
- विकेंद्रीकृत विद्युत आपूर्ति: दूरस्थ, पर्वतीय एवं सीमा क्षेत्रों में संचरण (Transmission) हानियों को कम करती है तथा विद्युत आपूर्ति की विश्वसनीयता में वृद्धि करती है।
- स्वच्छ ऊर्जा: ईंधन के उपभोग के बिना उत्सर्जन-मुक्त विद्युत का उत्पादन करती है।
- ग्रामीण विकास: ऊर्जा तक पहुंच में सुधार कर स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करती है।
- रोजगार सृजन: निर्माण, संचालन एवं अनुरक्षण के दौरान रोजगार के अवसर उत्पन्न करती है।
- पर्यावरणीय समुत्थानशीलता : कम भूमि आवश्यकता एवं न्यूनतम विस्थापन के कारण इसका पारिस्थितिक प्रभाव कम होता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: चौबीसों घंटे विश्वसनीय नवीकरणीय विद्युत उपलब्ध कराती है तथा विद्युत ग्रिड की स्थिरता को सुदृढ़ करती है।
निष्कर्ष
भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता एवं समुत्थानशील विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में लघु जलविद्युत पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए संतुलित समाधान प्रस्तुत करती है। यह योजना दूरस्थ एवं वंचित क्षेत्रों तक विश्वसनीय विद्युत पहुँच सुनिश्चित करेगी, विद्युत ग्रिड की सुदृढ़ता में सुधार करेगी तथा स्वच्छ, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देगी।