नीति आयोग की रिपोर्ट में भारत के कम अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीडीपी का 0.65%) और शोधकर्ताओं की कम संख्या पर प्रकाश डाला गया है, और इसमें जीडीपी के 2% तक राष्ट्रीय निवेश बढ़ाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने की सिफारिश की गई है।
प्रमुख चुनौतियों में वित्त पोषण का केंद्रीकरण, विलंबित फैलोशिप, प्रशासनिक बोझ, कमजोर उद्योग-अकादमिक संबंध और ज्ञान संसाधनों तक अपर्याप्त पहुंच शामिल हैं।
सिफारिशों में फेलोशिप को बढ़ाने, संकाय संरचनाओं में सुधार करने, पेशेवर अनुसंधान एवं विकास कार्यालयों की स्थापना करने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालयों को मजबूत करने और पत्रिकाओं और डेटाबेस तक पहुंच को व्यापक बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
In Summary
सुर्ख़ियों में क्यों
हाल ही में, नीति आयोग ने "भारत में अनुसंधान और विकास में सुगमता (Ease of Doing Research & Development in India)" नामक एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में भारत के अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारितंत्र की प्रमुख बाधाओं की पहचान की गई है तथा उन्हें दूर करने के लिए व्यावहारिक और क्रियान्वित किए जा सकने वाले सुझाव दिए गए हैं।
भारत का वर्तमान अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारितंत्र
अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD): भारत में यह व्यय GDP का लगभग 0.65% है। यह अमेरिका (~3.5%), चीन (~2.4%) और दक्षिण कोरिया (~4.5%) की तुलना में बहुत कम है।
भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय का अधिकांश हिस्सा अभी भी सरकार द्वारा वित्तपोषित है, जबकि निजी क्षेत्रक की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है।
शोधकर्ता घनत्व: भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 262 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-Time Equivalent-FTE) शोधकर्ता हैं। इसकी तुलना में अमेरिका में यह संख्या 4,821 और चीन में 1,585 है। (वैश्विक नवाचार सूचकांक- GII, 2025)।
भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) में सुगमता से संबंधित मुख्य चुनौतियां और सुझाव (NITI आयोग)
प्रमुख चुनौतियाँ
सुझाव
वित्तपोषण एवं उसका उपयोग
R&D वित्तपोषण कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित: उदाहरण के लिए, ANRF के अनुसंधान एवं विकास (R&D) वित्तपोषण का 80% से अधिक IITs को प्राप्त है।
विभागों के बीच समन्वय और जानकारी का अभाव: उदाहरण के लिए, DST और CSIR दोनों ही हाइड्रोजन ऊर्जा तथा कार्बन प्रग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) जैसे क्षेत्रों में R&D परियोजनाओं को सहायता देते हैं।
R&D में राष्ट्रीय निवेश बढ़ाया जाए: अगले 4–5 वर्षों में R&D पर व्यय को GDP के कम-से-कम 2% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा जाए।
लक्षित GERD का लगभग आधा हिस्सा निजी क्षेत्रक से प्राप्त किया जाए।
परोपकारी संस्थाओं और CSR के माध्यम से सहायता बढ़ाना: इसके लिए कंपनी अधिनियम के तहत CSR प्रावधानों का बेहतर उपयोग किया जाए।
गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन को आकर्षित करना एवं बनाए रखना
फेलोशिप के वितरण में देरी: शोधार्थियों को मिलने वाली फेलोशिप के वितरण में देरी होती है। साथ ही, संस्थानों को मानव संसाधन की आवश्यकताओं के अनुसार नियुक्तियों की योजना बनाने की पर्याप्त स्वायत्तता नहीं है।
भर्ती प्रक्रिया में देरी:प्रशासनिक कारणों से भर्ती में देरी होती है। राज्य संस्थानों में इसके पीछे वित्तीय कारण भी हो सकते हैं।
शिक्षकों पर प्रशासनिक बोझ: संकाय सदस्य प्रायः शिक्षण दायित्वों और प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं और उनके पास R&D के लिए बहुत कम समय होता है।
फेलोशिप में वृद्धि: DST, ANRF, DBT, DSIR, DHE, ICAR और ICMR, S&T में पोस्टडॉक्टरल फेलोशिप को प्रति वर्ष 20% बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।
'विज्ञान निधि' की स्थापना: यह एक डिजिटल फेलोशिप प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। इसके माध्यम से शोधार्थियों को सीधे लाभ अंतरण (DBT) किया जा सकेगा तथा फेलोशिप की कमी और उसके वितरण में होने वाली देरी को दूर करने के लिए व्यवस्थित सहायता दी जा सकेगी।
संकाय सुधार: संकाय संरचना को तर्कसंगत बनाने तथा लचीले भर्ती मॉडल अपनाने हेतु संस्थागत स्वायत्तता प्रदान की जाए। विश्वविद्यालयों में शिक्षण-केंद्रित और अनुसंधान-केंद्रित अलग-अलग कैरियर ट्रैक विकसित किए जाएँ।
संस्थागत संरचनाएं एवं प्रक्रियाएं
R&D प्रयासों का बहुत अधिक विषयों में बिखराव: अनुसंधान कार्यों के लिए पर्याप्त प्राथमिकता निर्धारण और दीर्घकालिक योजना का अभाव है।
केंद्रित मूल्यांकन की कमी: R&D गतिविधियों के लिए कोई स्पष्ट और केंद्रित मूल्यांकन या रेटिंग व्यवस्था नहीं है।
सक्षम नीतियों की कमी: संस्थानों में शिक्षकों और शोधकर्ताओं द्वारा संचालित उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देने वाली पर्याप्त नीतियां नहीं हैं।
अन्य मुद्दे: संस्थानों में समर्पित और प्रभावी R&D कार्यालयों का अभाव। परियोजनाओं के प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं के लिए पर्याप्त स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं।
पेशेवर R&D कार्यालयों की स्थापना: इन कार्यालयों को एकल-खिड़की (Single Window) केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, जो अनुदान प्रबंधन आदि कार्यों को सरल बनाएं।
अनुपालन-केंद्रित व्यवस्था से विश्वास-आधारित प्रशासन: प्रशासनिक कार्यों के बड़े हिस्से में शोधकर्ताओं द्वारा स्व-घोषणा (Self-Declaration) या स्व-प्रमाणन (Self-Certification) को पर्याप्त माना जाए।
अन्य सुझाव:
संस्थानों की मौजूदा क्षमताओं और विशेषज्ञता के आधार पर प्राथमिकता वाले अनुसंधान क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान की जाए।
R&D को सुगम बनाने के आकलन का एक व्यापक ढाँचा विकसित किया जाए।
प्रौद्योगिकी विकास, रूपांतरण एवं व्यवसायीकरण
प्रभावी तकनीकी हस्तांतरण सहायता की कमी: प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को व्यावहारिक उपयोग एवं बाजार तक पहुँचाने के लिए प्रभावी तकनीकी हस्तांतरण सहायता का अभाव।
कमजोर उद्योग-अकादमिक जगत लिंकेज: विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक प्रयोगशालाओं आदि के बीच सीमित उद्योग-अकादमिक गतिशीलता।
रेगुलेटरी सैंडबॉक्स व्यवस्था का अभाव: गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस (TTOs) की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण।
उद्योग-अकादमिक जगत के बीच गतिशीलता के लिए संस्थागत ढांचा विकसित करना।
सभी मंत्रालयों के इनक्यूबेटर के लिए समन्वित ढांचा विकसित करना: इनक्यूबेशन पारितंत्र में क्षमता और समेकन बढ़ाने के लिए।
सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी इंडिजिनाइजेशन (CTI) स्थापित करना: स्वदेशीकरण के लिए प्राथमिक प्रौद्योगिकियों की पहचान करना।
ज्ञान एवं संसाधनों तक पहुँच
शोध पत्रिकाओं, डेटाबेस तथा सॉफ़्टवेयर तक पहुँच में कमी: उदाहरण के लिए, वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ONOS) का विस्तार वर्तमान में निजी विश्वविद्यालयों/संस्थानों तक नहीं किया गया है।
राष्ट्रीय प्रकाशनों से संबंधित चुनौतियाँ: जैसे असंगत सहकर्मी-समीक्षा (Peer Review), सीमित अंतर्राष्ट्रीय अनुक्रमण (Indexing), कम उद्धरण (Citations) आदि।
ONOS कवरेज बढ़ाना: लागत-साझेदारी के आधार पर निजी संस्थानों को शामिल करना।
बड़े पैमाने पर, एकीकृत एवं वेब-आधारित राष्ट्रीय रिपॉजिटरी बनाना: भारतीय शोध निष्कर्षों को खुली पहुँच उपलब्ध कराना।
उच्च गुणवत्ता वाली राष्ट्रीय शोध पत्रिकाएँ बनाना: भारतीय विज्ञान अकादमियों की विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए पेशेवर रूप से प्रबंधित पारिस्थितिकी तंत्र के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली राष्ट्रीय शोध पत्रिकाएँ तैयार करना।
राज्य संस्थानों में अनुसंधान एवं विकास (R&D)
संस्थागत समर्थन की कमी: जमीनी स्तर के नवाचारों के लिए।
दोहरी नियंत्रण व्यवस्था: जैसे कि, रजिस्ट्रार जैसे प्रशासनिक पद, राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों के पास होते हैं, जबकि कार्यात्मक अधिकार कुलपति (वाइस-चांसलर) के पास होता है।
कोई निर्धारित फ्रेमवर्क नहीं: राज्य में केंद्रीय R&D प्रयोगशालाओं के राज्य संस्थानों के साथ सहयोग हेतु।
राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषदों: क्षमता एवं संसाधनों को सुदृढ़ करने के लिए।
सहयोग के लिए एक रूपरेखा विकसित करना: केंद्रीय वित्तपोषित अनुसंधान एवं विकास (R&D) संस्थानों/उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) और राज्य स्तरीय संस्थानों के बीच सहयोग हेतु।
निगरानी, मूल्यांकन, क्षमता निर्माण एवं नीति प्रशासन
रैखिक प्रवाह: वर्तमान विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (STI) प्रबंधन प्रणाली रैखिक है, जिसमें प्रतिपुष्टि (Feedback) की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर साइंस पॉलिसी एंड गवर्नेंस (NISPG) की स्थापना: नीति निर्माण, कार्यान्वयन और निगरानी अन्तराल को भरने के लिए नोडल संस्था के रूप में। जैसे, जापान।
भारत में अनुसंधान को बढ़ाने की दिशा में मुख्य पहल
रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) योजना: अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी, डीप-टेक परियोजनाओं एवं स्टार्टअप्स को समर्थन देकर निजी क्षेत्रक की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
नेशनल क्वांटम मिशन (NQM): क्वांटम प्रौद्योगिकी के विकास हेतु चार थीमैटिक हब (T-Hubs) स्थापित किए गए हैं, जिनमें IISc बेंगलुरु (क्वांटम कंप्यूटिंग), IIT बॉम्बे (क्वांटम सेंसिंग एवं मेट्रोलॉजी) आदि शामिल हैं।
नेशनल मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर फिजिकल सिस्टम्स (NM-ICPS): देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं।
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत स्थापित यह संस्था उद्योग–अकादमिक जगत के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने का कार्य करती है।
अटल इनोवेशन मिशन (AIM), 2016: देश में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया गया।
अन्य मुख्य पहलें: 'NIDHI' (नेशनल इनिशिएटिव फॉर डेवलपिंग एंड हार्नेसिंग इनोवेशन); PRAYAS (युवा और उभरते टेक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योर्स को बढ़ावा देना और तेज़ करना); टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस (TTOs) की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण, NITI आयोग के प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम (UPMS) के लिए प्रस्तावित यूनिफाइड आर्किटेक्चर, आदि।
प्रमुख संगठन: वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR); भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR); रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) आदि।
निष्कर्ष
प्रक्रियात्मक बाधाओं का व्यवस्थित रूप से समाधान करके तथा अनुसंधान के लिए अनुकूल परिस्थितियों को सुदृढ़ बनाकर भारत के अनुसंधान पारितंत्र की परिचालनात्मक नींव को सुदृढ़ किया जा सकता है। ऐसे सुधार रिसर्च अनुसंधान उत्पादकता में वृद्धि करेंगे, उच्च गुणवत्ता वाली प्रतिभाओं को आकर्षित करने एवं उन्हें बनाए रखने में सहायक होंगे, तथा अनुसंधान के व्यावहारिक एवं वाणिज्यिक अनुप्रयोगों को बेहतर बनाएंगे।