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परमाणु शासन (Nuclear Governance)

30 Jun 2026
1 min

In Summary

  • 11वां एनपीटी समीक्षा सम्मेलन बिना किसी सर्वसम्मत दस्तावेज के समाप्त हो गया, जिसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चल रहे विवादों को उजागर किया और संधि की वैधता को कम कर दिया।
  • वैश्विक परमाणु शासन में आईएईए जैसी संस्थाएं, एनपीटी और सीटीबीटी जैसी संधियां और एनएसजी जैसी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं शामिल हैं, हालांकि चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।
  • प्रमुख चुनौतियों में परमाणु प्रसार के जोखिम, अप्रभावी वैश्विक मंच, निरस्त्रीकरण की धीमी प्रगति और मौजूदा ढांचों की भेदभावपूर्ण प्रकृति शामिल हैं, जिसके लिए संस्थागत सुधार और बेहतर सहयोग की आवश्यकता है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के पक्षकार देशों का 11वाँ समीक्षा सम्मेलन सर्वसम्मत परिणाम दस्तावेज के बिना समाप्त हो गया। ऐसा इसलिए क्योंकि तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद बने हुए थे।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • यह लगातार तीसरी बार है कि समीक्षा सम्मेलन में किसी समझौते पर सहमति नहीं बन पाई है। इसके कारण वैश्विक परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण की आधारशिला मानी जाने वाली यह संधि अभी भी प्रभावी तो है, किंतु इसकी वैधता और विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है।
  • इससे पूर्व वर्ष 2022 में आयोजित संधि की समीक्षा बैठक में रूस ने अंतिम दस्तावेज पर सहमति नहीं बनने दी थी। इसका कारण यूक्रेन पर उसके आक्रमण तथा यूरोप के सबसे बड़े जापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर मॉस्को के कब्ज़े से संबंधित उल्लेखों पर उत्पन्न विवाद था।

वैश्विक परमाणु शासन व्यवस्था 

संधियां/समझौते/संस्थान

विवरण 

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)1957

  • यह सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण (गैर-सैन्य) परमाणु प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने वाली प्रमुख वैश्विक परमाणु प्रशासन संस्था है।
  • भारत ने वर्ष 2009 में IAEA के सुरक्षा उपाय समझौते के अतिरिक्त प्रोटोकॉल (AP) पर हस्ताक्षर किए।
  • वर्ष 2014 में IAEA के अतिरिक्त प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन करने के बाद भारत की असैन्य परमाणु सुविधाएं IAEA के सुरक्षा उपायों के अंतर्गत आ गईं।.

बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty - OST), 1967 

  • यह संधि पृथ्वी की कक्षा, खगोलीय पिंडों तथा बाह्य अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती पर प्रतिबंध लगाती है।
  • भारत OST का सदस्य है।

परमाणु हथियार अप्रसार की संधि (NPT), 1968 

  • यह संधि वर्ष 1970 में लागू हुई। इसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना तथा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना है।
  • भारत NPT को पक्षपातपूर्ण व्यवस्था मानता है, क्योंकि इसने विश्व को "परमाणु हथियार संपन्न देशों" और "परमाणु हथियार विहीन देशों" में विभाजित कर दिया है।

समुद्र-तल संधि (Seabed Treaty), 1971/ समुद्र-तल आयुध नियंत्रण संधि 1971 

  • यह संधि तटीय क्षेत्र से 12 समुद्री मील की सीमा से परे समुद्र-तल पर परमाणु हथियारों तथा अन्य व्यापक विनाश के हथियारों (Weapons of Mass Destruction - WMD) की तैनाती पर प्रतिबंध लगाती है।

निरस्त्रीकरण सम्मेलन (Conference on Disarmament - CD), 1979 

  • भारत CD का समर्थन करता है, यह विश्व का एकमात्र बहुपक्षीय निरस्त्रीकरण वार्ता मंच है।
  • इसमें भारत सहित 65 सदस्य देश शामिल हैं।

व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty - CTBT), 1996 

  • यह संधि सैन्य अथवा असैन्य किसी भी उद्देश्य से किए जाने वाले सभी परमाणु परीक्षण विस्फोटों पर प्रतिबंध लगाती है।
  • भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि इसमें परमाणु हथियार संपन्न देशों द्वारा समयबद्ध परमाणु निरस्त्रीकरण की कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं है।

परमाणु हथियार निषेध संधि (Treaty on the Prohibition of Nuclear Weapons - TPNW), 2017 

  • यह संधि वर्ष 2021 में लागू हुई। यह परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने वाली पहली विधिक रूप से बाध्यकारी बहुपक्षीय संधि है।
  • हस्ताक्षरकर्ता: 95, पक्षकार: 74
  • भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि उसका मानना है कि यह संधि न तो प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय विधि के विकास में योगदान देती है और न ही कोई नए अंतर्राष्ट्रीय मानक या मानदंड स्थापित करती है।

चार बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं (Four Multilateral Export Control Regimes)

  • परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (Nuclear Suppliers Group - NSG), 1974: भारत के वर्ष 1974 के परमाणु परीक्षण (ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा) के बाद इसकी स्थापना की गई थी, ताकि परमाणु सामग्री एवं प्रौद्योगिकी के निर्यात का उपयोग परमाणु हथियार निर्माण के लिए न हो सके।
  • भारत NSG की सदस्यता प्राप्त करना चाहता है (वर्तमान में सदस्य नहीं है), जिससे उसकी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार हो सके तथा परमाणु ईंधन एवं अन्य आवश्यक कच्चे परमाणु पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
  • मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (Missile Technology Control Regime - MTCR): इसका उद्देश्य उन वस्तुओं एवं प्रौद्योगिकियों के निर्यात को नियंत्रित करके व्यापक विनाश के हथियारों (WMD) के प्रसार के जोखिम को कम करना है, जिनका उपयोग उनके प्रक्षेपण तंत्र के विकास में किया जा सकता है। इसमें 35 सदस्य देश शामिल हैं; भारत वर्ष 2016 से सदस्य है।
  • वासेनार व्यवस्था (Wassenaar Arrangement): इसका उद्देश्य संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में हथियारों के अस्थिरकारी संचय को रोकना तथा हथियारों को आतंकवादियों के हाथों में पहुंचने से रोकना है। भारत वर्ष 2017 में इसका सदस्य बना।
  • ऑस्ट्रेलिया समूह (Australia Group): इसका उद्देश्य निर्यात अथवा पारगमन करने वाले देशों को रासायनिक एवं जैविक हथियारों (CBW) के प्रसार में अनजाने में सहयोग करने के जोखिम को कम करने में सहायता प्रदान करना है। भारत वर्ष 2018 में इसका सदस्य बना।

परमाणु शासन की सफलता

  • परमाणु अप्रसार: परमाणु अप्रसार संधि (NPT) ने 20वीं शताब्दी के मध्य की उस आशंका को गलत सिद्ध किया कि 20 से 30 देश परमाणु हथियार प्राप्त कर लेंगे। 
  • वर्तमान में केवल 9 देशों के पास परमाणु हथियार हैं, जो वैश्विक अप्रसार प्रयासों की सापेक्ष सफलता को दर्शाता है।
  • वैश्विक परमाणु शस्त्रागार में कमी: विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच हुए शस्त्र नियंत्रण समझौतों एवं रणनीतिक संवादों के परिणामस्वरूप शीत युद्ध के बाद परमाणु हथियारों के भंडार में उल्लेखनीय कमी आई।
    • उदाहरण के लिए सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि (START) तथा नई स्टार्ट (START) संधि के अंतर्गत दोनों पक्षों के लिए अधिकतम 1,550 तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड रखने की सीमा निर्धारित की गई, जो शीत युद्ध काल की तुलना में काफी कम थी।
  • सत्यापन एवं सुरक्षा उपाय प्रणाली: अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने असैन्य परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी तथा परमाणु सामग्री के दुरुपयोग का पता लगाने के लिए एक संस्थागत तंत्र विकसित किया।.
  • वर्ष 2024 में IAEA ने 190 देशों में सुरक्षा उपाय लागू किए तथा 1,300 से अधिक परमाणु सुविधाओं पर 3,000 से अधिक निरीक्षण किए, इस प्रकार यह अंतर्राष्ट्रीय शासन की सबसे व्यापक सत्यापन प्रणालियों में से एक बन गई।
  • परमाणु-हथियार-मुक्त क्षेत्र (Nuclear-Weapon-Free Zones-NWFZs): संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1975 में NPT के अनुच्छेद VII के अनुरूप परमाणु-हथियार-मुक्त क्षेत्रों की स्थापना की पुनः पुष्टि की, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत हुई तथा परमाणु अप्रसार के वैश्विक मानदंड को सुदृढ़ता मिली।
  • लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा दक्षिण प्रशांत जैसे क्षेत्रों ने क्रमशः ट्लाटेलोल्को (Tlatelolco), पेलिंडाबा, बैंकॉक तथा रारोटोंगा संधियों के माध्यम से स्वयं को कानूनी रूप से परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित किया है।
  • बहुपक्षीय परमाणु शासन: IAEA तथा NSG जैसी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं सहित विभिन्न बहुपक्षीय संस्थाओं के उद्भव ने परमाणु मामलों में निगरानी, विनियमन एवं अंतर्राष्ट्रीय  सहयोग के प्रभावी तंत्र उपलब्ध कराए हैं।

परमाणु शासन व्यवस्था से संबंधित चुनौतियां

  • परमाणु प्रसार का निरंतर जोखिम: उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम तथा ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर जारी विवाद वर्तमान परमाणु अप्रसार तंत्र की सीमाओं को उजागर करते हैं।
  • वैश्विक मंचों की अप्रभावशीलता: भू-राजनीतिक विभाजन तथा परस्पर प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय हित बहुपक्षीय परमाणु मंचों पर सर्वसम्मति बनाने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
    • उदाहरण के लिए परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की समीक्षा हेतु आयोजित चार सप्ताह का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन किसी सर्वसम्मत समझौते के बिना समाप्त हो गया।
  • सार्वभौमिक भागीदारी का अभावअनेक महत्वपूर्ण परमाणु समझौतों में सभी देशों की भागीदारी नहीं है, जिससे उनकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
    • उदाहरण के लिए व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) अभी तक प्रभावी नहीं हो सकी है, क्योंकि प्रमुख देशों द्वारा इसका अनुसमर्थन (Ratification) अभी भी लंबित है।
  • परमाणु निरस्त्रीकरण की धीमी प्रगति: बार-बार की गई अंतर्राष्ट्रीय अपीलों के बावजूद परमाणु हथियार संपन्न देशों ने अपने निरस्त्रीकरण संबंधी दायित्वों के निर्वहन में बहुत कम प्रगति की है।
  • स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (SIPRI) के अनुसार, वर्ष 2024 की शुरुआत में विश्व में लगभग 12,241 परमाणु वारहेड मौजूद थे।
  • भेदभावपूर्ण प्रकृति: वैश्विक परमाणु शासन व्यवस्था की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह मान्यता प्राप्त परमाणु हथियार संपन्न देशों तथा गैर-परमाणु देशों के बीच असमान अधिकारों और दायित्वों को संस्थागत रूप प्रदान करती है।
    • उदाहरण के लिए परमाणु अप्रसार संधि (NPT) केवल पाँच देशों को, एक ऐतिहासिक कट-ऑफ तिथि के आधार पर, आधिकारिक परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में मान्यता देती है।

आगे की राह 

  • शस्त्र नियंत्रण एवं परमाणु निरस्त्रीकरण प्रयासों को पुनर्जीवित करना: नए शस्त्र नियंत्रण समझौतों पर वार्ता की जाए तथा परमाणु शस्त्रागार में क्रमिक, सत्यापन योग्य और विश्वसनीय कमी के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाए।
  • परमाणु अप्रसार एवं सत्यापन तंत्र को सुदृढ़ बनाना: अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की शक्तियों एवं तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाया जाए, ताकि वह अघोषित परमाणु गतिविधियों का प्रभावी ढंग से पता लगा सके तथा संधियों के अनुपालन को सुनिश्चित कर सके।
  • वैश्विक संस्थाओं में सुधार करना: परमाणु अप्रसार संधि (NPT) समीक्षा सम्मेलन तथा निरस्त्रीकरण सम्मेलन जैसे मंचों को अधिक प्रतिनिधिक, प्रभावी और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने में सक्षम बनाया जाए।
  • उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए वैश्विक नियम विकसित करना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध, हाइपरसोनिक हथियारों तथा स्वायत्त हथियार प्रणालियों जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानदंड विकसित किए जाएं, ताकि परमाणु स्थिरता पर उनके प्रतिकूल प्रभाव को रोका जा सके।
  • परमाणु सुरक्षा एवं आतंकवाद-रोधी सहयोग को सुदृढ़ करना: साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान तथा अवैध तस्करी के विरुद्ध प्रभावी उपायों के माध्यम से परमाणु सामग्री एवं परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को और मजबूत किया जाए।
  • रणनीतिक संवाद एवं विश्वास-निर्माण को बढ़ावा देना: परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच संकट संचार तंत्र, पारदर्शिता उपायों तथा पारस्परिक सैन्य संवाद का विस्तार किया जाए, ताकि गलत आकलन एवं आकस्मिक तनाव वृद्धि के जोखिम को कम किया जा सके।

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स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (SIPRI)

यह एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जो संघर्ष, हथियार, हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण पर शोध करता है।

व्यापक विनाश के हथियार (WMD)

इसमें परमाणु, जैविक और रासायनिक हथियार शामिल हैं, जिनका बड़े पैमाने पर विनाश करने की क्षमता होती है।

सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि (START) तथा नई स्टार्ट (START)

ये संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच हुए शस्त्र नियंत्रण समझौते हैं जिन्होंने परमाणु हथियारों के भंडार में उल्लेखनीय कमी लाई, विशेषकर तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड की सीमा निर्धारित करके।

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