सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, 'मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया' (MRAI) ने चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए एक केंद्रीय नोडल एजेंसी या एक समर्पित मंत्रालय बनाने का समर्थन किया है।
चक्रीय अर्थव्यवस्था

- यह उत्पादन और उपभोग का एक मॉडल है। इसमें विद्यमान सामग्री और उत्पादों को अधिक से अधिक समय तक साझा करना, लीज पर देना, पुनः उपयोग करना, मरम्मत करना, नवीनीकरण करना और पुनर्चक्रण करना शामिल है।
- यह पारंपरिक रेखीय "लो-बनाओ-फेंको (Take-make-dispose)" मॉडल से अलग रणनीति अपनाता है, जिसमें कच्चे माल का दोहन किया जाता है तथा उन्हें उत्पादों में बदला जाता है। तत्पश्चात अपशिष्ट के रूप में फेंक दिया जाता है।
- उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक सामान को पुनः उपयोग करना, पशुओं के अपशिष्ट को खाना पकाने, हीटिंग और रोशनी आदि के लिए बायोगैस में बदलना।
भारत में चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की आवश्यकता
- बढ़ता अपशिष्ट प्रबंधन संकट: भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 62 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसमें प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक और खतरनाक अपशिष्ट तेजी से बढ़ रहे हैं।
- उदाहरण के लिए, भारत प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करने में विश्व में सबसे अग्रणी है (2024 के आंकड़ों के अनुसार) और विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-अपशिष्ट उत्पन्न करने वाला देश है (वैश्विक मात्रा का 7%)।
- अप्रयुक्त आर्थिक मूल्य और रोजगार के अवसर (वेस्ट-टू-वेल्थ): वर्ष 2050 तक भारत में अपशिष्ट के माध्यम से $2 ट्रिलियन से अधिक का बाजार मूल्य उत्पन्न होने और 10 मिलियन तक नए रोजगार सृजित होने का अनुमान है।
- पर्यावरण और जलवायु को होने वाले नुकसान को कम करना: अकेले नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट से होने वाला वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 2030 तक 41.09 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है।
- कृषि में संधारणीयता: भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 350 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसमें से अधिकतर को जला दिया जाता है, जिससे मृदा के पोषक तत्व कम हो जाते हैं और गंभीर वायु प्रदूषण होता है।
- अवरुद्ध भूमि : यह अनुमान है कि 10,000 हेक्टेयर से अधिक शहरी भूमि कचरे के ढ़ेरों में अवरुद्ध है।
चुनौतियां

- खंडित शासन-व्यवस्था और संस्थागत बाधाएं: पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्रक कई मंत्रालयों और नियामक संस्थाओं के नियंत्रण में है। इससे निगरानी में कमी और कामकाज में अक्षमता आती है।
- उदाहरण के लिए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) पर्यावरण संरक्षण और अपशिष्ट से जुड़े नियम बनाता है, जबकि आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) शहरी योजना और नगरपालिका स्तर पर कार्यान्वयन का प्रबंधन करता है।
- वित्तीय और अवसंरचनात्मक कमियां: उदाहरण के लिए, अवसंरचना में भारी कमियां हैं, जैसे कि पृथक गीले अपशिष्ट को प्रसंस्करण इकाइयों तक ले जाने के लिए सही तंत्र का न होना।
- अनौपचारिक क्षेत्रक का अलग-थलग होना: अधिकतर सामग्री एकत्रित करने का काम करने के बावजूद, अनौपचारिक क्षेत्रक को कोई औपचारिक पहचान नहीं मिली है।
- निम्न पुनर्चक्रण दर: जैसे, भारत की ई-अपशिष्ट पुनर्चक्रण दर 10% है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 22% है और संयुक्त राज्य अमेरिका में यह दर 56% है।
- नीतियों की सीमाएं और नियमों के पालन से जुड़े मुद्दे: जैसे, ई-अपशिष्ट और बैटरी क्षेत्रक में, नीतियां मुख्य रूप से महंगी धातुओं (जैसे सोना, तांबा और एल्युमीनियम) के निष्कर्ष्ण को बढ़ावा देती हैं। हालांकि कई आवश्यक खनिजों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
- अन्य मुद्दे: कमजोर निगरानी व्यवस्था, पुनर्चक्रण उद्योग का अनौपचारिक स्वरूप, डेटा संग्रह और इसकी जांच की निम्नस्तरीय व्यवस्था, कौशल की कमी, उन्नत पुनर्चक्रण तकनीकों तक सीमित पहुंच, अपशिष्ट संग्रह में कमियां, लोगों में जागरूकता की कमी आदि।
प्रारंभ की गई पहलें
- नियामक ढांचों और प्रवर्तन को मजबूत करना

- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): EPR संग्रहण-आधारित फ्रेमवर्क से पुनर्चक्रण-आधारित प्रणाली की ओर बढ़ रहा है।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026: SWM नियम स्रोत पर ही अपशिष्ट को चार श्रेणियों में अलग-अलग करने को अनिवार्य बनाते हैं। साथ ही, बड़े अपशिष्ट उत्पादकों के लिए अपने कचरे का स्वयं प्रसंस्करण करना अनिवार्य करते हैं।
- ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2022: उत्पादकों और पुनर्चक्रण करने वालों के लिए EPR फ्रेमवर्क को मजबूत किया गया।
- बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम (BWMR), 2022: यह अपशिष्ट संग्रह करने, पुनर्चक्रण करने और पुनर्नवीनीकरण के लक्ष्य तय करता है। साथ ही अपशिष्ट को लैंडफिल में डालने और उसे जलाने पर रोक लगाता है।
- नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM), 2025: इसका उद्देश्य लिथियम-आयन बैटरी, ई-अपशिष्ट और औद्योगिक अपशिष्ट से क्रिटिकल मिनरल्स के लिए घरेलू पुनर्चक्रण क्षमता विकसित करना है।
- डिजिटलीकरण और ट्रैक करने की व्यवस्था: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) एक एकीकृत EPR पोर्टल विकसित कर रहा है। इससे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में 50 लाख तक उपयोगकर्ताओं के जुड़ने की उम्मीद है।
- कृषि अपशिष्ट से संपदा के लिए पहलें: जैसे, गोवर्धन (GOBARdhan) योजना, फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) आदि।
- अन्य: नीति आयोग में चक्रीय अर्थव्यवस्था सेल (CE सेल) का गठन, LiFE मिशन (पर्यावरण के लिए जीवनशैली), स्वच्छ भारत मिशन (शहरी और ग्रामीण), 'राइट टू रिपेयर' को बढ़ावा देना आदि।
चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के उपाय
- सामग्री-विशिष्ट नियामक दृष्टिकोण: विशेषकर धातु पुनर्चक्रण (Metal Recycling) जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना, क्षेत्रक-विशिष्ट EPR ढांचे को लागू करना। सभी के लिए एक जैसा नियम बनाने से बचना।
- अवसंरचना विकास: संसाधनों के व्यवस्थित संग्रह, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और पुनर्प्राप्ति को सरल बनाने के लिए एक कुशल अपशिष्ट प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स प्रणाली विकसित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से पिछड़े और दूर-दराज के क्षेत्रों में।
- अपशिष्ट के पुनर्चक्रण के लिए एक विकेंद्रीकृत क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण स्थापित करना।

- पुनर्चक्रण तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा देना: जैसे: प्लास्टिक कचरे को ईंधन तेल (रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल - RDF) में बदलना और सड़क निर्माण में प्लास्टिक अपशिष्ट का उपयोग करना।
- डिजाइन से ही चक्रीयता: टिकाऊपन, पुन: उपयोग, मरम्मत, पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण पर बल देते हुए, उत्पादों के डिजाइन के स्तर पर ही चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को शामिल करके अपशिष्ट को न्यूमतम करना।
- बाध्यकारी प्रतिबद्धता लागू करना: उदाहरण के लिए, निर्माण क्षेत्रक में एक निश्चित प्रतिशत पुनर्चक्रण किए गए अपशिष्ट का उपयोग अनिवार्य करना।
- लक्ष्य तय करना: उदाहरण के लिए, नीदरलैंड जैसे देशों का लक्ष्य 2050 तक 100% पूर्ण चक्रीय अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करना है।
निष्कर्ष
भारत में चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव के लिए मजबूत संस्थागत समन्वय, तकनीकी नवाचार और विभिन्न क्षेत्रकों में समावेशी सहभागिता की आवश्यकता है। प्रभावी नीतियों, अवसंरचना और व्यवहारात्मक बदलाव के माध्यम से, यह एक साथ अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियों, संसाधन सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को संबोधित कर सकता है।