वर्ष 2019 से लोक सभा में उपाध्यक्ष का पद रिक्त रहना एक संवैधानिक विसंगति का संकेत देता है | Current Affairs | Vision IAS
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लोक सभा के उपाध्यक्ष पद के बारे में 

  • पृष्ठभूमि: यह पद भारत शासन अधिनियम, 1919 के तहत 1921 में अस्तित्व में आया था।
    • सर्वप्रथम सचिदानंद सिन्हा केंद्रीय विधान सभा में इस पद पर आसीन हुए थे। 
    • एम. ए. अय्यंगर स्वतंत्रता के बाद पहले निर्वाचित उपाध्यक्ष थे। 
  • चुनाव: संविधान के अनुच्छेद 93 में प्रावधान किया गया है कि लोक सभा जल्द-से-जल्द सदन के दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनेगी। 
    • लंबे समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार, उपाध्यक्ष का पद विपक्ष के सांसद को दिया जाता है। 
  • पद त्याग और पद से हटाया जाना: अनुच्छेद 94 में पद के रिक्त होने, पद त्याग और हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है। ध्यातत्व है कि लोक सभा उपाध्यक्ष को सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा ही हटाया जा सकता है।
    • अध्यक्ष अपना त्याग-पत्र उपाध्यक्ष को सौंपता है, जबकि उपाध्यक्ष अपना त्याग-पत्र अध्यक्ष को सौंपता है। 
  • कर्तव्य: अनुच्छेद 95 के अनुसार, अध्यक्ष की अनुपस्थिति या रिक्ति की स्थिति में उपाध्यक्ष उसके कर्तव्यों का निर्वहन करेगा। 

उपाध्यक्ष के पद का महत्त्व

  • संवैधानिक अनिवार्यता: यह केवल औपचारिक पद नहीं है, क्योंकि संविधान में इसे अध्यक्ष पद के समकक्ष स्थान दिया गया है।
  • निरंतरता, स्थिरता और संस्थागत संतुलन के लिए आवश्यक: यह पद आपातकाल की स्थिति में द्वितीय नेतृत्व प्रदान करता है।
    • 1956 में अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के आकस्मिक निधन के बाद एम. ए. अय्यंगर ने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था।
  • विधायी कर्तव्य: उपाध्यक्ष महत्वपूर्ण सत्रों की अध्यक्षता करता है, समितियों का नेतृत्व करता है और गंभीर वाद-विवाद का संचालन निष्पक्षता एवं प्राधिकार के साथ करता है।

निष्कर्ष

  • एक निश्चित समय सीमा (जैसे, नई लोक सभा की पहली बैठक के 60 दिन) या एक वैधानिक व्यवस्था की शुरुआत की जा सकती है, ताकि समय सीमा के भीतर उपाध्यक्ष का चयन किया जा सके।
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