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AUKUS के तहत गीलोंग ट्रीटी (GEELONG TREATY UNDER AUKUS)

19 Aug 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक द्विपक्षीय रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को गीलोंग ट्रीटी के नाम से भी जाना जाता है। यह समझौता AUKUS के पिलर-1 के तहत अगले 50 वर्षों के लिए किया गया है।

गीलोंग ट्रीटी के बारे में 

  • इसे न्यूक्लियर-पावर्ड सबमरीन पार्टनरशिप एंड कोलेबरेशन ट्रीटी के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य यूरो-अटलांटिक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा को बढ़ावा देना है।
  • उद्देश्य: SSN-AUKUS पनडुब्बियों के डिजाइन, निर्माण, परिसंचालन, रखरखाव और डिस्पोजल पर व्यापक सहयोग बढ़ाना तथा मजबूत त्रिपक्षीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकास को बढ़ावा देना।
  • यह अंतर्राष्ट्रीय परमाणु अप्रसार के दायित्वों और त्रिपक्षीय AUKUS नौसैनिक परमाणु प्रणोदन समझौता (AUKUS Naval Nuclear Propulsion Agreement: ANNPA) के अनुरूप है।

AUKUS के बारे में 

  • यह ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच 2021 में शुरू किया गया एक सुरक्षा समझौता है।
  • इसके निम्नलिखित दो पिलर हैं:-
    • पिलर 1: इसमें तीनों सदस्य देशों की जहाज-निर्माण क्षमताओं के विकास पर बल दिया गया है। इसी पिलर के तहत ऑस्ट्रेलिया को उसकी पहली SSN सब-मरीन (परमाणु संचालित अटैक सबमरीन) भी मिलेगी।
    • पिलर 2: इसमें 8 एडवांस सैन्य क्षमता क्षेत्रों में संयुक्त विकास को बढ़ावा दिया जाएगा। इनमें ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इलेक्ट्रोमैग्नेटिक युद्ध, मॉडलिंग, सिमुलेशन आदि शामिल हैं।
  • इस समझौते के तहत 2030 के दशक से संयुक्त राज्य अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को पनडुब्बियां बेचेगा। इसके अलावा, यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया संयुक्त रूप से नई पनडुब्बियों का निर्माण करेंगे, जो 2040 के दशक की शुरुआत में सेवा में शामिल की जाएंगी।
  • AUKUS का सामरिक महत्त्व
    • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन प्रणाली को मजबूत करता है: यह क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। साथ ही, यह फोरम इस क्षेत्र में अमेरिका का अपने सहयोगियों और अपने हितों की रक्षा के लिए की गई प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
    • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव और उपस्थिति को बढ़ाता है: यह सोच विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के बारे में है, जहाँ अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी का विस्तार करना चाहता है।
    • अमेरिकी रक्षा उद्योग को बढ़ावा: इससे ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम को अमेरिकी हथियारों की बिक्री और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के नए अवसर पैदा होते हैं।

AUKUS के समक्ष अवसर और चुनौतियां क्या-क्या हैं? 

AUKUS के समक्ष अवसर

AUKUS से जुड़ी चिंताएं 

सफलता की उच्च संभावनाएं: AUKUS देशों के बीच आपसी विश्वास का स्तर बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए- फ़ाइव आइज़ एलायंस के माध्यम से खुफिया जानकारी साझा करना।

संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा समीक्षा: अमेरिका ने AUKUS त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते की समीक्षा शुरू कर दी है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया पर अमेरिका ने दबाव बनाया है कि वह अपने रक्षा व्यय को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद के 3.5% तक करे। उसने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा का अधिक भार सभी के बीच साझा करने की भी वकालत की है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में QUAD का पूरक बनते हुए हार्ड पावर पर ध्यान केंद्रित करना: जहां QUAD और AUKUS, दोनों का उद्देश्य साझा सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करना है, वहीं AUKUS विशेष रूप से 'हार्ड पावर' पर केंद्रित है।

QUAD को कमजोर कर सकता है: कुछ विशेषज्ञों का मानना ​​है कि AUKUS के उभरने से क्वाड की प्रासंगिकता समाप्त हो सकती है। भारत अक्सर सैन्य गठबंधनों से दूरी बनाए रखने की वजह से QUAD की पूर्ण सुरक्षा क्षमता की महत्वाकांक्षा को सीमित करने वाला देश माना जाता है। 

अमेरिका की क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति में बदलाव: अमेरिका ने आत्मनिर्भर क्षेत्रीय सुरक्षा से हटकर चीन के प्रभाव को कम करने के लिए हिंद-प्रशांत के भागीदारों की क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है।

एशियाई भागीदारी का अभाव: पर्यवेक्षकों का तर्क है कि AUKUS पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाला समूह है क्योंकि इसमें एशियाई देशों की भागीदारी नहीं है, जबकि QUAD में एशियाई देशों का भी प्रतिनिधित्व है।

यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया के बीच तालमेल: यह ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति और ब्रिटेन की सामरिक रक्षा समीक्षा के अनुरूप है।

 

समय पर पनडुब्बियों को सौंपने की चुनौतियां: अमेरिका फिलहाल हर साल सिर्फ 1.13 की दर से वर्जीनिया-क्लास पनडुब्बियाँ बना पा रहा है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कम-से-कम 2 पनडुब्बियाँ हर साल चाहिए तथा AUKUS समझौते को पूरा करने के लिए लगभग 2.33 दर से पनडुब्बियाँ सालाना बनानी होंगी।

त्वरित प्रतिक्रिया: पारंपरिक पनडुब्बियों (6.5 नॉट्स की गति) की तुलना में परमाणु पनडुब्बियां (लगभग 20 नॉट्स की गति) संघर्ष क्षेत्रों तक बहुत तेज़ी से पहुंच सकती हैं और काफी लंबे समय तक स्टेशन पर रह सकती हैं।

परमाणु प्रसार: AUKUS समझौता प्रशांत क्षेत्र में हथियारों की होड़ और परमाणु प्रसार को बढ़ावा दे सकता है।

निष्कर्ष 

भारत के पास अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ अपने विशेष संबंध विकसित करने का एक खास अवसर है। यह भारत की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति को मजबूत करेगा और साथ ही, क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा में इसके योगदान को भी बढ़ाएगा।

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