सुर्ख़ियों में क्यों?
प्रधानमंत्री की हालिया त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा के दौरान यह घोषणा की गई कि भारत सरकार गिरमिटिया समुदाय का एक डेटाबेस तैयार करने तथा नियमित अंतराल पर विश्व गिरमिटिया सम्मेलनों का आयोजन करने की दिशा में कार्य कर रही है।
अन्य संबंधित तथ्य
- त्रिनिदाद और टोबैगो में बसे भारतीय मूल के प्रवासियों की छठी पीढ़ी को भी OCI कार्ड की सुविधाएँ देने की घोषणा की गई।
- इसके अतिरिक्त, त्रिनिदाद और टोबैगो कैरेबियन क्षेत्र का ऐसा पहला देश बन गया है जिसने भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) प्रणाली को अपनाया है।
गिरमिटिया के बारे में
- "गिरमिटिया" उन भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को कहा जाता है जो 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश उपनिवेशों में काम करने के लिए भारत से चले गए थे। ब्रिटिश दासता उन्मूलन अधिनियम 1833 के लागू होने के बाद उपनिवेशों में श्रमिकों की कमी को देखते हुए भारत से श्रमिकों को अन्य उपनिवेशों में ले जाया गया।
- "गिरमिट" शब्दावली वास्तव में अंग्रेजी शब्द "एग्रीमेंट" का अपभ्रंश उच्चारण है। यह उस अनुबंध को इंगित करता है जिसके तहत इन श्रमिकों को भेजा गया था।
- इन्हें मुख्य रूप से गन्ना और चाय के बागानों जैसे अधिक शारीरिक श्रम वाले कार्यों में मजदूरी करने के लिए ले जाया गया था। इनमें से अधिकतर श्रमिक प्रवास वाले देश में स्थायी रूप से बस गए।
- प्रमुख गंतव्य देश: मॉरीशस, फिजी, वेस्टइंडीज, दक्षिण अफ्रीका और कैरिबियन देश (विशेषकर त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना, सूरीनाम, जमैका)।
- जहां से प्रवास कर गए: अधिकतर श्रमिक तत्कालीन पूर्वी संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) और बिहार के निवासी थे।
- प्रवास के कारण: गरीबी, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसी घरेलू आर्थिक मजबूरियों के साथ-साथ उपनिवेशों में आय के बेहतर स्रोत और बेहतर जीवन स्तर की उम्मीद उनके प्रवास के पीछे प्रमुख प्रेरक बल थे।
- हालांकि, जब वे अन्य उपनिवेशों में पहुंचे तब उनका जीवन अत्यंत दुष्कर हो गया क्योंकि उन्हें संसाधन, जीवन निर्वाह मजदूरी, भोजन और स्वच्छ जल जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया। इसे तरह प्रवास देश में भी उन्हें गरीबी में ही जीवन यापन करना पड़ा।
- नोट: इसी दौरान मद्रास, नागापट्टम और थोंडी से तमिल श्रमिकों को सीलोन, बर्मा और मलेशिया भेजा गया।
भारत के लिए गिरमिटिया समुदाय का महत्त्व
- सांस्कृतिक जुड़ाव: मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो तथा सूरीनाम जैसे देशों में वे बहुसंख्यक हो गए, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय रीति-रिवाज स्थानीय संस्कृति के साथ गहन रूप से एकीकृत हो गए।
- उनके गीत, संगीत और परंपराओं में आज भी भारत की झलक मिलती है:
- पर्व-त्योहार: फिजी में दिवाली और रामलीला का आयोजन तथा त्रिनिदाद और टोबैगो का होसे उत्सव इसके जीवंत उदाहरण हैं।
- लोक संगीत: उत्तर भारत के प्रसिद्ध लोकगीत जैसे; कहरवा, बिरहा, लोरिक, और फरवाही आज भी फिजी और सूरीनाम में लोकप्रिय हैं।
- वाद्ययंत्र: ढोलक, हारमोनियम, धनताल और दण्डताल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) जैसे पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्रों का उपयोग आज भी प्रचलित है।
- भाषाएं: मॉरीशस, फिजी और सूरीनाम जैसे देशों में हिंदी, भोजपुरी और अवधी जैसी भाषाएँ आज भी संवाद का माध्यम हैं।
- उनके गीत, संगीत और परंपराओं में आज भी भारत की झलक मिलती है:
- राजनीतिक महत्व:
- सॉफ्ट पावर कूटनीति: प्रवासी भारतीय समुदाय संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के पक्ष का समर्थन करता है।
- उच्च पदों पर आसीन होना: गिरमिटिया देशों में भारतीय मूल के लोग शासन के सर्वोच्च पदों तक पहुँचे हैं, जैसे मॉरीशस के प्रधानमंत्री (नवीनचंद्र रामगुलाम) तथा त्रिनिदाद और टोबैगो की प्रधानमंत्री (कमला प्रसाद-बिसेसर)।
- आर्थिक महत्व: प्रवासी समुदाय भारत के लिए परोपकारी कार्यों, सूचनाओं के आदान-प्रदान, नवाचार में निवेश और विभिन्न विकास परियोजनाओं हेतु समर्थन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में मॉरीशस का योगदान 17% रहा।
निष्कर्ष
भारतीय स्कूली पाठ्यक्रम में गिरमिटिया इतिहास को सम्मिलित करने का नया प्रस्ताव अत्यंत सराहनीय कदम है। यह कदम न केवल उनकी अनूठी संस्कृति, कला और संघर्षपूर्ण इतिहास को संरक्षण प्रदान करेगा, बल्कि भारत के व्यापक सांस्कृतिक धरोहर में इस समुदाय के अमूल्य योगदान को भी रेखांकित करेगा।