वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CONVENTION ON INTERNATIONAL TRADE IN ENDANGERED SPECIES OF WILD FAUNA AND FLORA: CITES) | Current Affairs | Vision IAS
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वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CONVENTION ON INTERNATIONAL TRADE IN ENDANGERED SPECIES OF WILD FAUNA AND FLORA: CITES)

19 Aug 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों? 

हाल ही में, वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora: CITES) के 50 वर्ष पूरे हुए। 

CITES के बारे में

  • इस कन्वेंशन का विचार सबसे पहले 1963 में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature: IUCN) की बैठक में आया था। यह 1975 में लागू हुआ था। 
  • उद्देश्य: यह सरकारों के बीच एक स्वैच्छिक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वन्य जीवों और पादपों के नमूनों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, उन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा न बने। 
  • यह लाइसेंसिंग प्रणाली के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कुछ नियंत्रण स्थापित करता है, जिसमें आयात, निर्यात, पुनः निर्यात आदि सभी शामिल हैं। 
  • सचिवालय: इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UN Environment Programme: UNEP) द्वारा जेनेवा (स्विट्ज़रलैंड) से संचालित किया जाता है। 
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) CITES सचिवालय को वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग प्रदान करता है। 
  • पक्षकार (Parties): इसमें 185 देश या क्षेत्रीय आर्थिक संगठन शामिल हैं। भारत ने 1976 में इसकी अभिपुष्टि की थी। 
    • हालांकि, CITES सभी पक्षकारों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी है, लेकिन यह किसी देश के राष्ट्रीय कानूनों का स्थान नहीं लेता है, बल्कि प्रत्येक देश इसे अपने राष्ट्रीय कानूनों के जरिए लागू करता है। 
  • कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (CoP): यह CITES का निर्णय लेने वाला सर्वोच्च निकाय है। CoP-3 (तीसरी बैठक) 1981 में नई दिल्ली में आयोजित हुआ था। 
  • CITES ट्रेड डाटाबेस: इसे CITES सचिवालय की ओर से UNEP का वर्ल्ड कंजर्वेशन मॉनिटरिंग सेंटर (UNEP-WCMC) संचालित करता है।

CITES की मुख्य पहलें: 

  • CITES अपनी अनुसूचियों (Appendices) के माध्यम से 40,000 से अधिक पशु और पादप प्रजातियों की रक्षा करता है। (इन्फोग्राफिक देखें) 
  • MIKE कार्यक्रम: यह कार्यक्रम हाथी रेंज वाले देशों की प्रबंधन और प्रवर्तन से जुड़े निर्णय लेने में मदद करता है। इसका उद्देश्य अफ्रीका और एशिया में हाथियों के अवैध शिकार की प्रवृत्तियों की निगरानी करना है। 
    • उदाहरण के लिए: भारत में MIKE साइट्स हैं - चिरांग-रिपू हाथी रिजर्व और दिहिंग-पटकाई हाथी रिजर्व। 
  • रणनीतिक विजन 2021-2030: यह CITES के प्रयासों को मार्गदर्शन प्रदान करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वन्यजीवों का व्यापार वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों और सतत विकास लक्ष्यों का समर्थन करे। 
  • CITES ट्री स्पीशीज प्रोग्राम (CTSP): इसका उद्देश्य CITES-सूचीबद्ध वृक्ष प्रजातियों के संधारणीय और वैधानिक व्यापार का समर्थन करना है। 
  • वन्यजीव अपराध से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (International Consortium on Combating Wildlife Crime: ICCWC), 2010: इसका गठन आपराधिक न्याय प्रणालियों को मजबूत करने और राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव और वन अपराध से लड़ने के लिए समन्वित सहयोग प्रदान करने हेतु किया गया था। 

निष्कर्ष

अपनी विकसित होती रणनीतियों, MIKE प्रोग्राम और ICCWC जैसे सहयोगी तंत्रों तथा सदस्य देशों द्वारा कार्यान्वित एक मजबूत कानूनी ढांचे के माध्यम से, CITES जैव विविधता की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। 

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