भारत-लैटिन अमेरिकी-कैरेबियाई देशों के मध्य संबंध (INDIA LATIN AMERICAN AND CARIBBEAN COUNTRIES TIES) | Current Affairs | Vision IAS
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भारत-लैटिन अमेरिकी-कैरेबियाई देशों के मध्य संबंध (INDIA LATIN AMERICAN AND CARIBBEAN COUNTRIES TIES)

19 Aug 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, प्रधान मंत्री ने त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राजील की राजकीय यात्रा की। साथ ही, ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया।

अन्य संबंधित तथ्य

  • सर्वोच्च नागरिक सम्मान: भारतीय प्रधान मंत्री को त्रिनिदाद और टोबैगो के "ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक" सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • त्रिनिदाद और टोबैगो: भारतीय प्रधान मंत्री ने त्रिनिदाद और टोबैगो में प्रवासी समुदाय की छठी पीढ़ी को ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड देने की घोषणा की है।

लैटिन अमेरिका और कैरिबियन (LAC)-भारत संबंधों का महत्त्व

  • रणनीतिक व सामरिक पक्ष:
    • रक्षा सहयोग: भारत और ब्राजील ने संयुक्त रक्षा समिति की बैठकों के माध्यम से रक्षा सहयोग को मजबूत किया है और 2+2 राजनीतिक-सैन्य वार्ता शुरू की है।
  • महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा: भारत की सरकारी कंपनी खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) ने अर्जेंटीना में पांच लिथियम ब्लॉक्स के अधिग्रहण के लिए वहां की कंपनी कैमयेन (CAMYEN) के साथ समझौता किया है। यह किसी भारतीय सरकारी कंपनी की पहली लिथियम खोज और खनन परियोजना है।
    • ज्ञातव्य है कि चिली, अर्जेंटीना और बोलीविया को "लिथियम ट्रायंगल" कहा जाता है, और इनके पास दुनिया के 75% से अधिक लिथियम के भंडार मौजूद हैं।
  • खाद्य सुरक्षा: लैटिन अमेरिका भारत के लिए खाद्य पदार्थों (विशेष रूप से खाद्य तेल और दालों) का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है।
    • अर्जेंटीना भारत के लिए खाद्य तेल, विशेष रूप से सोयाबीन तेल के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में से एक है।
  • आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध:
    • व्यापार और निवेश:
      • 2023-24 में इस क्षेत्र के साथ भारत का कुल व्यापार 35.73 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था।
      • निवेश: भारतीय कंपनियों ने पिछले 15 वर्षों में आई.टी., फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा, खनन, विनिर्माण और कृषि-रसायन में 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है।
      • भारत का MERCOSUR के साथ एक अधिमान्य व्यापार समझौता है।
    • ऊर्जा सुरक्षा: भारत द्वारा वेनेजुएला, मेक्सिको और ब्राजील से कच्चे तेल का आयात, इस क्षेत्र (LAC) से होने वाले भारत के कुल आयात का लगभग 30% है। 
      • जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा: भारत ने कैरिकॉम/ CARICOM (कैरेबियाई समुदाय और साझा बाजार) को 140 मिलियन अमेरिकी डॉलर का लाइन ऑफ क्रेडिट दिया है। इसका उपयोग सौर ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी परियोजनाओं में किया जाएगा।
        • कैरिकॉम कैरेबियन क्षेत्र में आर्थिक एकीकरण और सहयोग बढ़ाने के लिए निर्मित एक क्षेत्रीय संगठन है।
      • भारत, ब्राजील के साथ मिलकर बायोफ्यूल (जैव-ईंधन) के शोध और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बायोफ्यूचर प्लेटफॉर्म पर काम कर रहा है।
  • क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग
    • महत्वपूर्ण सहयोग: भारत का अर्जेंटीना और ब्राजील के साथ G-20 में तथा ब्राजील के साथ BRICS, IBSA एवं G-4 जैसे समूहों में मजबूत सहयोग है।
    • क्षेत्रीय समूह: भारत कम्युनिटी ऑफ लैटिन अमेरिकन एंड कैरिबियन स्टेट्स (CELAC), कैरिकॉम और सेंट्रल अमेरिकन इंटीग्रेशन सिस्टम (SICA) के साथ सक्रिय भागीदारी और बैठकें करता है।

मर्कोसुर (MERCOSUR) के बारे में

  • परिचय: यह लैटिन अमेरिका का एक दक्षिणी साझा बाजार है। MERCOSUR' स्पेनिश भाषा के 'Mercado Común del Sur' का संक्षिप्त रूप है, जिसका अर्थ है "दक्षिणी साझा बाज़ार"।
  • स्थापना: इसकी स्थापना 1991 में हुई थी। इसका उद्देश्य वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और लोगों की मुक्त आवाजाही सुनिश्चित करना था।
  • सदस्य देश: अर्जेंटीना, बोलीविया, ब्राज़ील, पराग्वे और उरुग्वे। (वेनेजुएला की सदस्यता फिलहाल निलंबित है)
  • एसोसिएट सदस्य: चिली, कोलंबिया, इक्वाडोर, गुयाना, पनामा, पेरू और सूरीनाम।
  • मुख्यालय: मोंटेवीडियो (उरुग्वे)।

चुनौतियां

  • चीन का प्रभाव: चीन ने लैटिन अमेरिका के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए हैं और 2000 के बाद से दोनों के मध्य व्यापार में 35 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।
  • क्षेत्रीय एकीकरण की कमजोरियां: मर्कोसुर (MERCOSUR) के भीतर आंतरिक मतभेद हैं। जैसे- ब्राजील और उरुग्वे द्विपक्षीय समझौते करना चाहते हैं, वहीं अर्जेंटीना इससे बाहर निकलने की धमकी देता है।
  • परिवहन की उच्च लागत: भौगोलिक दूरी को सीमित संबंधों का कारण माना जाता है, क्योंकि सीधी हवाई और समुद्री सेवाएं महंगी एवं अलाभकारी समझी जाती हैं।
  • विदेश नीति में कम महत्त्व: लैटिन अमेरिका को अक्सर भारत की विदेश नीति के तीन मुख्य दायरों के सबसे आखिरी हिस्से में रखा जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र को भारत द्वारा सबसे कम प्राथमिकता दी जाती है।
  • अन्य कारण: भाषा संबंधी बाधा, प्रभावशाली प्रवासी समुदाय (डायस्पोरा) का अभाव आदि।

आगे की राह

  • राजनीतिक सहभागिता को प्राथमिकता देना: उच्च-स्तरीय वार्ताओं को नियमित रूप से संस्थागत रूप देना चाहिए और लैटिन अमेरिका को विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल करना चाहिए। 
  • आर्थिक संबंध मजबूत करना: टैरिफ (शुल्क) कम करने चाहिए; विनियमों को सरल बनाना चाहिए और मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि आपसी निवेश को बढ़ावा मिल सके।
  • कनेक्टिविटी बढ़ाना: सीधे समुद्री मार्ग, हवाई मार्ग और एयर फ्रेट कॉरिडोर्स विकसित करने चाहिए, ताकि लागत कम हो एवं व्यापार का प्रवाह बेहतर हो।
  • तकनीकी सहयोग का विस्तार करना: लैटिन अमेरिका के संसाधनों और भारत की तकनीकी क्षमता का नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि, आई.टी. एवं जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता जैसे क्षेत्रकों में उपयोग किया जा सकता है।
  • निजी क्षेत्र को सक्रिय करना: व्यापार मिशनों, नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स और निवेश प्रोत्साहनों के माध्यम से आपसी निवेश को बढ़ावा देना चाहिए। 

निष्कर्ष

भारत व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक संबंधों को गहरा करते हुए तथा लॉजिस्टिक्स संबंधी चुनौतियों को हल करते हुए, लैटिन अमेरिका के साथ अपने संबंधों को एक सक्रिय एवं बहुआयामी रणनीति से मजबूत बना सकता है। लोकतांत्रिक मूल्यों का सहारा लेकर भारत एक सतत साझेदारी बना सकता है, जो साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगी तथा बदलते वैश्विक परिदृश्य में दोनों क्षेत्रों की स्थिति को मजबूती प्रदान करेगी।

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