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ऑनलाइन कंटेंट का विनियमन (Online Content Regulation)

19 Aug 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MoI&B) ने अश्लील कंटेंट की स्ट्रीमिंग के लिए कई OTT प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • मंत्रालय ने निम्नलिखित कानूनों के तहत इन प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश जारी किया है:
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT अधिनियम, 2000), तथा 
    • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम {Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules}, 2021
  • रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद (1965) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अश्लीलता के मद्देनजर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) पर युक्ति-युक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है। 

ऑनलाइन कंटेंट का विनियमन करने की आवश्यकता क्यों है?

  • सामाजिक पहुंच और प्रभाव: भारत में 950 मिलियन से अधिक लोगों की इंटरनेट तक पहुंच है, ऐसे में अविनियमित कंटेंट समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित कर सकता है।
  • हिंसा और हिंसक व्यवहार पर रोक लगाना: उदाहरण के लिए- 2010 के एक अध्ययन में पोर्नोग्राफी वीडियो का विश्लेषण किया गया तथा यह पाया गया कि लगभग 90 प्रतिशत दृश्यों में शारीरिक आक्रामकता दिखाई गई थी।
  • सुभेद्य वर्गों की सुरक्षा:
    • बच्चे: कम उम्र में अश्लील कंटेंट के संपर्क में आने से बच्चों में रिश्तों के बारे में समझ बिगड़ सकती है और सेक्सुअलिटी की समझ विकृत हो जाती है।
    • महिलाएं: ऐसा कंटेंट अक्सर महिलाओं को वस्तु की तरह प्रस्तुत करता है, जिससे लैंगिक असमानता और महिलाओं के प्रति हिंसा को बढ़ावा मिलता है।
    • अल्पसंख्यक: उदाहरण के लिए- ऑनलाइन हेट स्पीच समाज में दरारें गहरा सकते हैं और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा एवं अधिकारों को जोखिम में डाल सकते हैं।
  • नैतिक अनिवार्यता: अशोभनीय कंटेंट का अनियंत्रित प्रसार सामाजिक मानदंडों, मूल्यों, पारिवारिक संस्थाओं आदि को प्रभावित कर सकता है।
    • समाज को हानि: उदाहरण के लिए- 2021 की "बुली बाई (Bulli Bai)" ऐप घटना, जहां महिलाओं की तस्वीरों की ऑनलाइन नीलामी की गई थी।
      • जे. एस. मिल का हानि सिद्धांत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को तब सीमित करने की अनुमति देता है, जब इससे दूसरों को हानि पहुंचती है या सामाजिक कल्याण में गिरावट आती है।
    • मनुष्य एक साधन के रूप में: ऐसा कंटेंट जो लोगों को यौन रुचि तक सीमित कर देता है, कांट के निरपवाद कर्तव्यादेश (Categorical Imperative) के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यह सिद्धांत मानवता का एक साध्य के साधन के रूप में उपयोग करने को नकारता है। 
    • असमान प्रभाव: इंडियन पॉलिसी फाउंडेशन के अनुसार, निम्न-आय वाले लोग और जिनकी डिजिटल साक्षरता कम है, वे अश्लील कंटेंट के संपर्क में अधिक आते हैं।

अश्लील कंटेंट के विनियमन के लिए विनियामकीय फ्रेमवर्क

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
    • धारा 67 एवं धारा 67A: ये इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील कंटेंट के प्रकाशन और प्रसारण पर नियंत्रण रखते हैं।
    • धारा 69A: यह केंद्र सरकार को विशिष्ट आधारों पर सूचना तक सार्वजनिक पहुंच को अवरुद्ध करने का निर्देश देने का अधिकार देती है।
    • धारा 79: OTT प्लेटफॉर्म्स सहित मध्यवर्तियों को तृतीय-पक्ष कंटेंट के प्रति जिम्मेदारी से "सुरक्षा कवच" (safe harbour) प्रदान करती है।
      • हालांकि, यदि वे सरकार से सूचना मिलने पर अवैध कंटेंट हटाने में विफल रहते हैं, तो यह सुरक्षा वापस ली जा सकती है। 
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Meity) द्वारा जारी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत IT नियम 2021: ये डिजिटल न्यूज मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के अधीन रखते हैं।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 294: यह संहिता 'अश्लील' शब्द को परिभाषित करती है और ऐसे कंटेंट के प्रसार को अपराध घोषित करती है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रसारित कंटेंट भी शामिल है।
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012: यह अधिनियम बाल अश्लील कंटेंट की बिक्री और वितरण को अवैध घोषित करता है।
  • महिला अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986: यह महिलाओं के अश्लील चित्रण वाले कंटेंट के प्रकाशन और वितरण पर प्रतिबंध लगाता है।

कंटेंट को विनियमित करने में आने वाली चुनौतियां

  • विनियामकीय चुनौतियां:
    • विनियामकीय ओवरलैप: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (जो IT नियम बनाता है) तथा सूचना प्रौद्योगिकी ब्यूरो (जो कंटेंट का पर्यवेक्षण करता है) के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन न होने से तालमेल की कमी रहती है।
    • परिभाषाओं में व्यक्तिपरकता: उदाहरण के लिए- अश्लीलता की अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है और इससे सरकार द्वारा मनमाने कदम उठाए जा सकते हैं।
  • तकनीक संबंधी चुनौतियां:
    • एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन और गोपनीयता सुविधाएं बिना किसी जांच के अवैध सामग्री के प्रसार की अनुमति देती हैं।
    • सोशल मीडिया एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को एक फीडबैक लूप में फंसा देते हैं, यानी यदि कोई उपयोगकर्ता गलती से आपत्तिजनक कंटेंट देख लेता है, तो एल्गोरिदम और ऐसे कंटेंट का रिकमंडेशन करने लगता है।
    • वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) उपयोगकर्ताओं को विनियामकीय निगरानी से बचने में सक्षम बनाते हैं, जिससे उन्हें प्रतिबंधित वेबसाइट्स और कंटेंट तक पहुंच मिलती है।
  • रचनात्मक स्वतंत्रता: प्रतिबंध और कठोर विनियमन रचनात्मक स्वतंत्रता को बाधित कर सकते हैं तथा अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन कर सकते हैं।
    • उदाहरण के लिए- फायर (समलैंगिकता पर आधारित फिल्म) जैसी फिल्मों पर लगाया गया प्रतिबंध।

आगे की राह 

  • बहु-हितधारक परामर्श: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, कंटेंट क्रिएटर्स आदि के साथ परामर्श किया जाना चाहिए, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: OTT प्लेटफॉर्म्स स्वचालित प्रोफनिटी फ़िल्टर (अभद्र भाषा फ़िल्टर), यूजर्स-रिपोर्ट आधारित कंटेंट स्कैनर और AI-संचालित कंटेंट विश्लेषण जैसे साधनों का उपयोग कर सकते हैं।
  • स्व-विनियमन को मजबूत करना: कंटेंट मानक तैयार करने और लागू करने के लिए उद्योग-आधारित स्व-विनियामकीय संस्थाओं को सशक्त बनाना चाहिए। इससे सरकार के सीधे हस्तक्षेप की आवश्यकता कम होगी।
  • सर्वोत्तम पद्धतियों/ कार्यों से सीखना: यूरोपीय संघ का ऑडियो-विज़ुअल मीडिया सर्विसेज़ डायरेक्टिव पारंपरिक प्रसारण मानकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक विस्तारित करता है, जबकि जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के माध्यम से मजबूत गोपनीयता सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।

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