स्व-विनियामक निकाय ने इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग व्यवसाय के लिए ‘मानकों की संहिता’ प्रस्तुत की | Current Affairs | Vision IAS
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उद्योग जगत के अग्रणियों ने इंडिया इन्फ्लुएंसर गवर्निंग काउंसिल (IIGC) की शुरुआत की है। यह इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के लिए एक स्व-विनियामक निकाय है। इसमें मेटा और गूगल जैसी प्रमुख कंपनियों के सदस्य शामिल हैं।

  • IIGC ने भारत के डिजिटल इकोसिस्टम में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक कंटेंट सृजन सुनिश्चित करने के लिए एक मानकों की संहिता और साप्ताहिक इन्फ्लुएंसर रेटिंग की शुरुआत की है ।
    • एक अनुमान के अनुसार इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का कारोबार 2026 तक 3,375 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को विनियमित करने की आवश्यकता क्यों है?

  • उपभोक्ता को गलत सूचना देना और उसके साथ धोखाधड़ी: इन्फ्लुएंसर्स अक्सर असत्यापित उत्पादों, जैसे हेल्थ सप्लीमेंट्स या क्रिप्टो योजनाओं को बढ़ावा देते हैं।
    • इनका विनियमन जवाबदेही को लागू कर सकता है तथा यह सुनिश्चित कर सकता है कि उनके द्वारा प्रचारित उत्पाद प्रमाणित भी हों।
  • सुभेद्य आबादी का शोषण: इन्फ्लुएंसर्स अक्सर युवा या सुभेद्य फॉलोवर्स को लक्षित करते हैं।
    • आयु के अनुसार अनुचित उत्पादों जैसे शराब या गैंबलिंग के प्रचार पर प्रतिबंध लगाकर नाबालिगों की रक्षा की जा सकती है।
  • अनुचित प्रतिस्पर्धा और बाजार को नुकसान: इन्फ्लुएंसर्स द्वारा अविनियमित प्रमोशन अभियान पारंपरिक विज्ञापन व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिसे सख्त मानक और निगरानी का सामना करना पड़ता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य और अवास्तविक मानक: इन्फ्लुएंसर्स के कंटेंट हानिकारक सौंदर्य मानक या जीवनशैली को बढ़ावा दे सकते हैं। इसलिए, अवास्तविक एडिटिंग (जैसे, फ़िल्टर) पर अंकुश लगाना और चेतावनियों को प्रदर्शित करना अनिवार्य है।
  • प्लेटफ़ॉर्म द्वारा जवाबदेही का अभाव: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर इन्फ्लुएंसर्स के कंटेंट के लिए जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। अतः ऐसे में विनियमन इन प्लेटफॉर्म्स को हानिकारक कंटेंट की निगरानी करने और उन्हें हटाने के लिए मजबूर कर सकता है।
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