इसरो के स्पेडेक्स मिशन ने उपग्रहों की दूसरी डॉकिंग पूरी की | Current Affairs | Vision IAS
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इसरो द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित डॉकिंग तकनीक को भारतीय डॉकिंग सिस्टम के रूप में जाना जाता है।

  • अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक तब जरूरी होती है, जब सामान्य मिशन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई रॉकेट्स लॉन्च करने की आवश्यकता होती है।

स्पेडेक्स मिशन के बारे में

  • यह एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन है। इसमें PSLV C60 द्वारा प्रक्षेपित दो लघु उपग्रहों का उपयोग करके अंतरिक्ष में डॉकिंग का प्रदर्शन शामिल है। डॉकिंग का अर्थ है अंतरिक्ष में तीव्र गति से यात्रा कर रहे दो उपग्रहों को आपस में जोड़ना। 
  • प्राथमिक उद्देश्य: अंतरिक्ष में दो लघु उपग्रहों SDX01 (चेजर) और SDX02 (टारगेट) की डॉकिंग; स्वतः संचालित तरीके से दूसरे उपग्रह (टारगेट) के पास आना एवं उससे सटीकता के साथ जुड़ जाना; तथा अनडॉकिंग क्षमताओं को विकसित और प्रदर्शित करना है।
  • स्पेडेक्स अंतरिक्ष यान को यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर (URSC), बेंगलुरु द्वारा इसरो के अन्य केंद्रों (VSSC, LPSC, SAC, IISU, और LEOS) के सहयोग से डिजाइन एवं निर्मित किया गया है।
    • URSC, बेंगलुरु को पहले ISRO सैटेलाइट सेंटर (ISAC) के नाम से जाना जाता था। यह उपग्रहों के निर्माण और संबंधित उपग्रह प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए प्रमुख केंद्र है।

मिशन का महत्त्व

  • रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमता: ऑर्बिटल डॉकिंग तकनीक भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ानों, सैटेलाइट मरम्मत मिशनों, और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी है।
  • राष्ट्रीय उपलब्धि: इस मिशन के साथ भारत दुनिया का चौथा देश बन गया, जिसने अंतरिक्ष में सैटेलाइट डॉकिंग में सफलता अर्जित की है। इससे पहले यह उपलब्धि संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन ने हासिल की है।
  • भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों को सक्षम बनाना: यह मिशन भविष्य के मिशनों जैसे चंद्रयान-4 में मदद करेगा, विशेष रूप से तब जब पृथ्वी से GNSS सहायता न मिल रही हो।
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