विश्व के पहले क्रायो-बॉर्न बेबी प्रवाल (Corals) को सफलतापूर्वक ग्रेट बैरियर रीफ में शामिल किया गया | Current Affairs | Vision IAS
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प्रवाल संरक्षण एवं पुनर्बहाली के संदर्भ में यह अभूतपूर्व उपलब्धि ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया एक सहयोगात्मक प्रयास है।

क्रायो-बॉर्न कोरल के बारे में

  • क्रायो-बॉर्न कोरल: इन्हें क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक का उपयोग करके विकसित किया जाता है। इसमें प्रवाल कोशिकाओं और ऊतकों को बहुत कम तापमान पर फ्रीज किया जाता है।
  •  क्रायोप्रिजर्वेशन प्रोसेस
    • प्रवाल कोशिकाओं और ऊतकों में पानी भरा होता है, जो फ्रीजिंग पर हानिकारक बर्फ के क्रिस्टल बनाता है।
    • क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक में फ्रीजिंग के दौरान कोशिकाओं से पानी निकालने और बर्फ के पिघलने पर प्रवाल की कोशिका संरचनाओं को सहारा देने के लिए क्रायोप्रोटेक्टेंट्स का उपयोग किया जाता है। 

इस सफलता का महत्त्व

  • जलवायु परिवर्तन का सामना: इस परियोजना का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए प्रतिवर्ष अधिक तापमान को सहन करने में सक्षम लाखों प्रवालों को रीफ में जोड़ना है।
  • चयनात्मक प्रजनन (Selective Breeding):
    • प्रवाल की प्राकृतिक रूप से प्रजनन अवधि काफी लघु होती है। ये साल में केवल एक बार प्रजनन करते हैं। अतः क्रायोप्रिजर्वेशन का उपयोग करके प्रवाल के अंडाणु (अंडे) और शुक्राणु (स्पर्म) को संरक्षित किया जा सकता है, ताकि भविष्य में साल के किसी भी समय प्रवाल की पुनर्बहाली करने संबंधी प्रयासों में उनका उपयोग किया जा सके।
    • यह तकनीक शोधकर्ताओं के लिए चयनात्मक प्रजनन और प्रजनन के लिए प्रवाल कॉलोनियों का कई बार उपयोग करना संभव बनाती है।

प्रवाल भित्ति (Coral Reef) के बारे में

  • प्रवाल एंथोजोआ वर्ग के अंतर्गत आने वाले अकशेरुकी (बिना रीढ़ की हड्डी वाले) जीव हैं। एंथोजोआ वर्ग फाइलम नाइडेरिया के तहत आता है। 
  • प्रवाल अत्यंत छोटे जीव होते हैं, जिन्हें 'पॉलीप्स' कहा जाता है। ये पॉलीप्स कॉलोनियों के माध्यम से भित्ति का निर्माण करते हैं। ये पॉलीप्स कैल्शियम कार्बोनेट (चूना पत्थर) से बने एक कठोर कंकाल रूपी संरचना का निर्माण करते हैं। ये पोषण के लिए सहजीवी शैवाल जूजैंथेले (zooxanthellae) पर निर्भर रहते हैं।
  • वितरण: मुख्य रूप से 30 डिग्री उत्तरी और 30 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के बीच उथले जल में पाए जाते हैं। 16°C से 32°C के बीच का तापमान प्रवाल भित्तियों के विकास के लिए सर्वोत्तम होता है। इस कारण ये ऐसे जल में विकसित होती हैं, जहां सूर्य का पर्याप्त प्रकाश पहुंचता है। 
  • गहराई: प्रवाल भित्तियां आम तौर पर 50 मीटर से कम गहराई पर विकसित होती हैं, जहां अधिक प्रकाश पहुंचता है।

प्रवाल भित्तियों के संरक्षण हेतु शुरू की गई पहलें:

  • भारत द्वारा शुरू की गई पहलें
    • आर्द्रभूमि, मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों पर राष्ट्रीय समिति (1986): यह समिति प्रवाल संरक्षण पर सलाह देती है।
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (1986): निर्माण कार्यों के लिए प्रवाल और रेत के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
    • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI): प्रवाल भित्तियों की पुनर्स्थापना के लिए बायोरॉक या मिनरल एकरेशन टेक्नोलॉजी का उपयोग करता है।
  • वैश्विक स्तर पर शुरू की गई पहलें
    • CITES ने प्रवालों के व्यापार को विनियमित करने के लिए प्रवाल प्रजातियों को परिशिष्ट-II में सूचीबद्ध किया है।
    • विश्व धरोहर अभिसमय प्रवाल भित्ति स्थलों को संरक्षण के लिए नामित करता है।
    • विश्व का सबसे बड़ा फ्रोजन कोरल भंडार: टारोंगा क्रायोडायवर्सिटी बैंक में 32 प्रवाल प्रजातियों के खरबों स्पर्म संग्रहित हैं, जिन्हें 2011 से प्रतिवर्ष एकत्र किया जा रहा है।
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