भारतीय दूरसंचार कंपनियों ने स्पेसएक्स के साथ समझौता किया | Current Affairs | Vision IAS
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भारतीय दूरसंचार कंपनियों एयरटेल और जियो ने स्टारलिंक की सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को भारत में लाने के लिए स्पेसएक्स के साथ समझौता किया। स्टारलिंक विश्व का पहला और सबसे बड़ा सैटेलाइट्स का समूह है। निम्न भू-कक्षा में स्थापित यह सैटेलाइट्स समूह उच्च गति और कम विलंबता वाला ब्रॉडबैंड इंटरनेट प्रदान करता है।

सैटेलाइट इंटरनेट या उपग्रह आधारित इंटरनेट के बारे में 

  • यह पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले संचार उपग्रहों के माध्यम से एक वायरलेस इंटरनेट को व्यक्त करता है। यह वैश्विक कवरेज प्रदान करने में सक्षम है।
  • उपग्रह लेजर के माध्यम से एक दूसरे के साथ संचार करते हैं, जिससे ग्राउंड स्टेशनों पर निर्भरता कम हो जाती है।

स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा

  • वर्तमान में, लगभग 7,086 स्टारलिंक उपग्रह कक्षा में हैं।
  • प्रत्येक स्टारलिंक उपग्रह:
    • 3 स्पेस लेजर (ऑप्टिकल इंटर-सैटेलाइट लिंक या ISLs) होते हैं, जो 200 Gbps तक की स्पीड प्रदान कर सकते हैं। अतः इनका पूरा समूह मिलकर एक वैश्विक इंटरनेट जाल का निर्माण करता है।
    • इसमें उच्च बैंडविड्थ कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए 5 एडवांस्ड Ku-बैंड फेज्ड ऐरे एंटीना और 3 ड्यूल बैंड (Ka-बैंड व E-बैंड) एंटीना का उपयोग किया जाता है।   

सैटेलाइट इंटरनेट का महत्त्व

  • कनेक्टिविटी पहुंच में सुधार: यह दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए उपयुक्त है।
  • आपदाओं के दौरान कनेक्टिविटी: स्टारलिंक ने टोंगा में विशाल ज्वालामुखी प्रस्फुटन और सुनामी के बाद कनेक्टिविटी प्रदान की थी। 
  • सैन्य उपयोग: यह सैन्य ठिकानों और सैन्य विमानों, जहाजों, ड्रोन आदि के बीच कनेक्टिविटी प्रदान करता है।

सैटेलाइट इंटरनेट से संबंधित चिंताएं

  • खगोलीय हस्तक्षेप: रात्रिकालीन आकाश में उपग्रहों द्वारा उत्सर्जित तेज प्रकाश खगोलीय निरीक्षणों में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
  • वायुमंडलीय परिवर्तन: स्टारलिंक उपग्रहों की उपयोग अवधि समाप्त होने के बाद पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के दौरान उत्पन्न मलबे से वायुमंडलीय रासायनिक दशाओं में असंतुलन उत्पन्न होने का खतरा है।
  • तकनीकी सीमाएं: इसकी सेवाओं में चरम मौसमी दशाओं और भू-चुंबकीय तूफानों से व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।
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