यह टैरिफ उस 25% टैरिफ के अतिरिक्त है, जिसे अमेरिका ने पहले भारतीय उत्पादों के आयात पर लगाया था। इससे अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात के कुल मूल्य के दो-तिहाई हिस्से पर प्रभाव पड़ रहा है।
- यह टैरिफ भारत-अमेरिका 2+2 इंटरसेशनल डायलॉग के दौरान लगाया गया है। इस डायलॉग में दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय शामिल हुए थे।
- उन्होंने रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की, जिसमें अमेरिका-भारत प्रमुख रक्षा साझेदारी के लिए एक नए दस-वर्षीय फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर करना शामिल है।
भारत पर उच्च टैरिफ के प्रभाव
- निर्यात: ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का अनुमान है कि अमेरिका को किया जाने वाला उत्पाद निर्यात 2024-25 के मौजूदा लगभग $87 बिलियन से घटकर 2025-26 में $49.6 बिलियन हो सकता है।
- सर्वाधिक प्रभावित उद्योग: इनमें कम-मार्जिन वाले और श्रम-गहन उद्योग शामिल हैं, जैसे- रत्न व आभूषण, वस्त्र एवं परिधान, झींगा पालन, ऑटो पार्ट्स आदि।
- प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी: इससे भारतीय उत्पाद अधिक महंगे हो जाएंगे। इससे वे वियतनाम, बांग्लादेश और मेक्सिको जैसे देशों के निर्यात के मुकाबले अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। ऐसा इस कारण, क्योंकि इन देशों से आयात पर तुलनात्मक रूप से कम टैरिफ लगाया गया है।
- विदेशी प्रवाह: निर्यात-उन्मुख क्षेत्रकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह घट सकता है। इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) इक्विटी और ऋण बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।
आगे की राह
- ब्याज समकारी योजना (Interest Equalisation Scheme) को बहाल करना: उच्च ब्याज दरों की स्थिति में MSMEs को कम लागत पर निर्यात ऋण प्रदान करना चाहिए।
- लक्षित क्रेडिट लाइन्स शुरू करना: झींगा, परिधान, आभूषण, हस्तशिल्प और उच्च प्रभाव वाले उद्योगों के लिए।
- निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को बढ़ाना: RoDTEP और ROSCTL जैसी योजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि तरलता बढ़ाई जा सके तथा बाजार विविधीकरण को गति मिल सके। साथ ही, क्षेत्रक-विशिष्ट व्यापार मिशनों का नेतृत्व किया जा सके।
- कपास, चमड़ा और रत्न जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल पर सरलीकृत विनियामक प्रक्रियाएं एवं युक्तिसंगत शुल्क।