भारत में घरेलू कामगारों की सुरक्षा के लिए अपर्याप्त कानून हैं | Current Affairs | Vision IAS
मेनू
होम

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के लिए प्रासंगिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास पर समय-समय पर तैयार किए गए लेख और अपडेट।

त्वरित लिंक

High-quality MCQs and Mains Answer Writing to sharpen skills and reinforce learning every day.

महत्वपूर्ण यूपीएससी विषयों पर डीप डाइव, मास्टर क्लासेस आदि जैसी पहलों के तहत व्याख्यात्मक और विषयगत अवधारणा-निर्माण वीडियो देखें।

करंट अफेयर्स कार्यक्रम

यूपीएससी की तैयारी के लिए हमारे सभी प्रमुख, आधार और उन्नत पाठ्यक्रमों का एक व्यापक अवलोकन।

ESC

In Summary

भारत सरकार के पास घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए व्यापक कानूनों का अभाव है, और मौजूदा ढाँचे खंडित हैं। बेहतर सुरक्षा के लिए एक समान प्रवर्तन और एक केंद्रीय कानून की तत्काल आवश्यकता है।

In Summary

हालिया दिनों में यह सुर्ख़ियों में रहा है कि केंद्र सरकार ने जनवरी 2025 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अभी तक घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए एक व्यापक कानून 

नहीं बनाया है।

अन्य मौजूदा वैधानिक फ्रेमवर्क्स 

  • उचित मजदूरी का अधिकार: कामगारों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत कम-से-कम राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए। 
  • सुरक्षित कार्य दशाओं का अधिकार: नियोक्ताओं को कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, निषेध और रोकथाम) अधिनियम, 2013 (POSH अधिनियम, 2013) के तहत दुर्व्यवहार-मुक्त परिवेश उपलब्ध कराना होता है।  
  • दुर्व्यवहार/ शोषण से सुरक्षा: भारतीय नागरिक सुरक्षा (BNS) संहिता, 2023 सभी प्रकार के दुर्व्यवहार के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करती है। साथ ही, कानूनी राहत और शिकायत तंत्र को सक्षम बनाती है।
  • राज्य स्तरीय पहलें: तमिलनाडु मैनुअल वर्कर अधिनियम, 1982 के तहत कल्याणकारी लाभ और न्यूनतम मजदूरी प्रदान करता है। कर्नाटक का 2025 विधेयक कल्याण कोष में कामगार पंजीकरण, अनुबंध, न्यूनतम मजदूरी आदि को अनिवार्य करता है।

कानूनी संरक्षण को लागू करने में समस्याएं 

  • राज्यों में अनियमित विनियमन: न्यूनतम मजदूरी और श्रम सुरक्षा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हैं। इसके अलावा, इनका प्रवर्तन भी कमजोर है।
  • श्रम संहिता के अंतर्गत बहिष्करण: प्रतिष्ठानों या उद्योगों के संबंध में "श्रमिक" को परिभाषित किया गया है। घरों में कार्यरत श्रमिकों, जैसे- घरेलू कामगारों को शामिल नहीं किया गया है।
  • सीमित संगठन: असंगठित कार्यस्थल, प्रवासी स्थिति, खराब सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आदि के कारण यूनियन बनाना कठिन हो जाता है। 
  • डेटा और परिभाषा संबंधी मुद्दे: विश्वसनीय डेटा का अभाव और घरेलू कार्य की विवादित परिभाषाएं नीति-निर्माण को जटिल बनाती हैं। 

आगे की राह 

  • न्यूनतम मजदूरी: सभी राज्यों द्वारा न्यूनतम मजदूरी निर्धारित और अपडेट करनी चाहिए।
  • अनिवार्य पंजीकरण: नियोक्ताओं, एजेंसियों और कामगारों को राज्य स्तर पर अनिवार्य रूप से पंजीकृत करना चाहिए। 
  • विधायी कार्रवाई: घरेलू कामगारों के अधिकारों, मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को लागू करने के लिए व्यापक केंद्रीय कानून बनाए जाने चाहिए। 
Watch Video News Today
Title is required. Maximum 500 characters.

Search Notes

Filter Notes

Loading your notes...
Searching your notes...
Loading more notes...
You've reached the end of your notes

No notes yet

Create your first note to get started.

No notes found

Try adjusting your search criteria or clear the search.

Saving...
Saved

Please select a subject.

Referenced Articles

linked

No references added yet