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पैरा-डिप्लोमेसी (Para-Diplomacy)

30 Oct 2024
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने केरल सरकार द्वारा "विदेश मामलों में सहयोग" के प्रभारी सचिव की नियुक्ति के आदेश की आलोचना की है। 

अन्य संबंधित तथ्य 

  • भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, राज्य सरकारों को उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जो उनके संवैधानिक क्षेत्राधिकार से बाहर हैं यह भी कि विदेशी मामलों में हस्तक्षेप, राज्य द्वारा संघ सूची के विषय पर क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने जैसा है।
    • गौरतलब है कि भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत संघ सूची की एंट्री (प्रविष्टि)-10 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि विदेशी मामले और ऐसे सभी मामले जो भारत संघ का किसी अन्य देश के साथ संबंध से जुड़े हैं, उन पर संघ सरकार का विशेषाधिकार होगा।
  • केरल राज्य सरकार के उपर्युक्त कदम ने भारत की विदेश नीति परिदृश्य के एक पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया है, और यह पहलू है; "अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को दिशा देने में उप-राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका"। इसे "पैरा-डिप्लोमेसी" के रूप में जाना जाता है।

पैरा-डिप्लोमेसी के बारे में

  • पैरा-डिप्लोमेसी उप-राष्ट्रीय सरकारों यानी राज्य सरकारों की विदेश नीति क्षमता या अधिकार से संबंधित है
    • इसे 'राज्य कूटनीति', 'महाद्वीपीय कूटनीति', 'क्षेत्रीय कूटनीति' और 'उप-राष्ट्रीय कूटनीति' के नाम से भी जाना जाता है।
  • पैरा-डिप्लोमेसी उन उप-राष्ट्रीय या संघीय इकाइयों के वैदेशिक संबंधों के लिए अवसर उपलब्ध कराती है जो अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।
    • यह पारंपरिक राजनयिक संबंधों से भिन्न है। पारंपरिक राजनयिक संबंध पूरी तरह से संप्रभु राष्ट्र राज्यों के विशेषाधिकार क्षेत्र में आते हैं, जिन्हें केंद्रीय/संघीय सरकारों द्वारा संचालित किया जाता है।
  • भारत के विदेश मंत्रालय ने 2014 में "राज्य प्रभाग (States Division)" नामक एक नए विभाग की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय करना है ताकि राज्यों से निर्यात और उनके यहां पर्यटन को बढ़ावा देने तथा अधिक विदेशी निवेश एवं विशेषज्ञता को आकर्षित करने के प्रयासों में मदद की जा सके।

पैरा-डिप्लोमेसी की आवश्यकता 

भारतीय उपमहाद्वीप की विविधता तथा सांस्कृतिक एवं भौगोलिक अंतर्संबंध को देखते हुए, राज्यों ने सदैव विदेश नीति के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • क्षेत्रीय सबलता: पैरा-डिप्लोमेसी राज्यों को अपनी विशिष्ट क्षमताओं का उपयोग करने में सक्षम बनाती है, ताकि वे अपने व्यापार को बढ़ावा दे सकें और अन्य देशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित कर सकें। 
    • उदाहरण के लिए- केरल ने खाड़ी देशों के साथ व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रवासी समुदाय की मदद ली है।
  • निवेश को आकर्षित करना: राज्य विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को आकर्षित करने हेतु नीतियां डिज़ाइन कर सकते हैं। इनमें कुशल श्रम, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता आदि से जुड़ी अपनी विशिष्टताओं को दर्शाना और निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना शामिल है।
    • उदाहरण के लिए- कई राज्य निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित करते हैं। वाइब्रेंट गुजरात, प्रोग्रेसिव पंजाब और वाइब्रेंट गोवा ऐसे ही शिखर सम्मेलन हैं। 
  • सांस्कृतिक कूटनीति: पैरा-डिप्लोमेसी राज्यों को अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में मदद करती है। इससे पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और शैक्षिक स्तर पर सहयोग को बढ़ावा मिलता है। 
    • उदाहरण के लिए- तमिलनाडु के श्रीलंका के साथ संबंध नृजातीयता पर आधारित है जबकि पश्चिम बंगाल का बांग्लादेश के साथ संबंध बंगाली संस्कृति पर आधारित है।
  • राष्ट्रीय विदेश नीति में योगदान: हालांकि विदेश नीति केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आती है, फिर भी राज्य राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अन्य देशों से मधुर संबंध रखते हुए इस नीति में अपना योगदान दे सकते हैं। इससे भारत के समग्र कूटनीतिक प्रयासों को समर्थन मिलता है।
    • उदाहरण के लिए- 1996 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की बांग्लादेश यात्रा ने फरक्का बैराज संधि के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त किया।
  • संघवाद को मजबूत करना: पैरा-डिप्लोमेसी भारत की संघीय प्रणाली को मजबूत करने में मदद कर सकती है, क्योंकि इससे राज्यों को अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलता है। साथ ही, इससे  अधिक विकेंद्रीकृत और उत्तरदायी विदेश नीति को बढ़ावा मिल सकता है।

पैरा-डिप्लोमेसी की आलोचनाएं:

  • संवैधानिक: भारतीय संविधान में "विदेशी मामले" संघ सूची का विषय है। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राज्यों की भागीदारी को केंद्र सरकार की शक्तियों में अनाधिकार प्रवेश के रूप में देखा जा सकता है। 
  • संसाधनों पर बोझ: अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी स्थापित करना और उसे जारी रखना, प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी करना जैसे विषय राज्यों के वित्तीय संसाधनों पर दबाव डाल सकते हैं।
  • राजनीतिक मतभेद: राज्य में सत्तारूढ़ किसी अन्य राजनीतिक दल की प्राथमिकताएं या विचारधाराएं केंद्र सरकार से भिन्न हो सकती हैं। इससे केंद्र और राज्य के मध्य संघर्ष उत्पन्न हो सकता है या किसी मुद्दे पर केंद्र सरकार का समर्थन कम हो सकता है। 
    • उदाहरण के लिए- दाभोल परियोजना (महाराष्ट्र) तत्कालीन केंद्र सरकार के सक्रिय समर्थन के बाद ही शुरू हुई थी।
  • केंद्र और राज्यों के अलग-अलग हित: राज्य सरकारों के हित राष्ट्रीय विदेश नीति से अलग हो सकते हैं। इससे निरंतरता कम हो सकती है और संघर्ष उत्पन्न हो सकते हैं।
    • उदाहरण के लिए- पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल बंटवारा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं।
  • द्विपक्षीय संबंध: विदेश नीति निर्धारण में राज्य सरकारों के अप्रत्यक्ष प्रभाव से भारत के द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों पर भी भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
    • उदाहरण के लिए- घरेलू राजनीति के दबाव में आकर भारत ने अपने पड़ोसी मित्र देश श्रीलंका के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के एक संकल्प के पक्ष में मतदान किया था।
  • सुरक्षा संबंधी चिंताएं: पैरा-डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने से अनजाने में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे पूर्वोत्तर क्षेत्र में अथवा पाकिस्तान या चीन से सटे सीमावर्ती राज्यों में।

आगे की राह

  • संस्थागत तंत्र: राज्यों में वाणिज्य दूतावास या वाणिज्य दूतावास कार्यालय कार्यालयों की स्थापना, या विदेश मंत्रालय (MEA) के अधीन संघीय विदेशी मामले कार्यालयों की स्थापना की जा सकती है। विदेश नीति में राज्यों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए अंतर-राज्य परिषद (ISC) जैसे फोरम का भी उपयोग किया जा सकता है।
    • उदाहरण के लिए- ब्राजील के विदेश मंत्रालय ने साओ पाउलो में नगर पालिकाओं और संघीय राज्यों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए एक अलग प्रशासनिक सेवा स्थापित की है। इसे 'एसेसोरिया डे रिलेकोएस फेडेराटिवस (ARF)' सेवा नाम दिया गया है। 
  • क्षमता निर्माण: राज्य सरकारों को पर्याप्त संसाधन आवंटित करना चाहिए तथा राज्यों के अधिकारियों को अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कूटनीति और संवाद कौशल पर प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए। 
  • सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों को साझा करना: एक प्लेटफॉर्म शुरू करना चाहिए जिस पर राज्य सरकारें सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों और पैरा-डिप्लोमेसी के सफल मॉडल्स को साझा कर सकें
  • नियमित मूल्यांकन: पैरा-डिप्लोमेसी पहलों के प्रभाव का नियमित रूप से मूल्यांकन करना चाहिए। साथ ही फीडबैक और आउटकम्स के आधार पर नीतियों में सुधार करने के लिए एक तंत्र स्थापित करना चाहिए। 
  • स्पष्ट दिशा-निर्देश: विदेश मंत्रालय के अंतर्गत स्थापित राज्य प्रभाग को उप-राष्ट्रीय कूटनीति को मजबूत करने के लिए नीति निर्माण और स्पष्ट दिशा-निर्देश विकसित करने में राज्यों को शामिल करना चाहिए। साथ ही राज्यों के हित और समग्र राष्ट्रीय हितों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास भी करना चाहिए।

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