भारत में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy in India) | Current Affairs | Vision IAS
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भारत में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy in India)

30 Oct 2024
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 2014 के 76.38 गीगावाट (GW) से बढ़कर 2024 में 203.1 GW हो गई है। यह 10 वर्षों में 165% की वृद्धि को दर्शाता है।

नवीकरणीय ऊर्जा क्या होती है?

  • यह प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा होती है, जो जितनी तेजी से उपयोग की जाती है उससे कहीं अधिक तेजी से पुनः भरण  है अर्थात् सतत प्रक्रिया के माध्यम से लगातार पुनःपूर्ति होती रहती है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और हमारे चारों ओर मौजूद हैं।
  • उदाहरण के लिए: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जल-विद्युत, महासागरीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा आदि।

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की वर्तमान स्थिति

  • देश में कुल स्थापित ऊर्जा उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 43.12% है।
  • भारत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर है।
    • भारत का विश्व में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता (46.65 गीगावाट) के मामले में चौथा स्थान है, जबकि सौर फोटोवोल्टिक ऊर्जा की स्थापित क्षमता (85.47 गीगावाट) के मामले में पांचवां स्थान है। 
  • भारत में पहली बार गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से ऊर्जा की स्थापित क्षमता 200 गीगावाट को पार कर गई है। 
    • इसमें 85.47 गीगावाट सौर ऊर्जा; 46.93 गीगावाट बड़ी जल-विद्युत; 46.66 गीगावाट पवन ऊर्जा; 10.95 गीगावाट जैव ऊर्जा; 5.00 गीगावाट लघु जल-विद्युत और 0.60 गीगावाट अपशिष्ट से ऊर्जा शामिल है। 
  • भारत द्वारा निर्धारित नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य 
    • भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। 
    • इसके अलावा, 2030 तक ऊर्जा आवश्यकताओं का कम-से-कम आधा हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से पूरा करने का लक्ष्य भी रखा गया है।

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रक के समक्ष मौजूद चुनौतियां

  • उच्च लागत: नवीकरणीय संसाधनों से एक यूनिट विद्युत उत्पादन करने के लिए सामग्री और प्राकृतिक संसाधन (मुख्य रूप से भूमि) की लागत, जीवाश्म ईंधन से एक यूनिट विद्युत उत्पादन की तुलना में काफी अधिक है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत, जैसे- सूर्य का प्रकाश और पवन, जीवाश्म ईंधन (जैसे- कोयला, तेल या प्राकृतिक गैस) की तरह विशिष्ट स्थानों पर केंद्रित होने के बजाय व्यापक क्षेत्रों में फैले होते हैं। ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा का दोहन करने के लिए बड़े क्षेत्रों में अवसंरचना स्थापित करने की आवश्यकता पड़ती है।
  • भूमि अधिग्रहण: उदाहरण के लिए- नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वाली भूमि की पहचान, इसका रूपांतरण (यदि आवश्यक हो), भूमि सीलिंग अधिनियम के तहत मंजूरी, भूमि के पट्टे हेतु किराए पर निर्णय, राजस्व विभाग से मंजूरी और अन्य ऐसी मंजूरियों में अधिक समय लगता है। 
  • डिस्कॉम का खराब प्रदर्शन: अधिकांश डिस्कॉम को ताप विद्युत के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) का पालन करना होता है। इसलिए सौर आधारित विद्युत क्रय करने की उनकी क्षमता कम हो जाती है, जिससे समग्र रिन्यूएबल परचेज ऑब्लिगेशंस (RPO) संबंधी लक्ष्य प्रभावित होता है।
    • RPO ऐसी व्यवस्था है, जो प्रत्येक राज्य में बिजली खरीददारों को प्रतिवर्ष एक निश्चित न्यूनतम मात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा खरीदने के लिए बाध्य करती है।
  • भंडारण संबंधी चिंताएं: नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न होने वाली बिजली की मात्रा पर मौसम की स्थिति के आधार पर उतार-चढ़ाव होता है और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में अचानक वृद्धि या गिरावट ग्रिड से विद्युत आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है।
  • पर्यावरण संबंधी चिंताएं: उदाहरण के लिए- खासकर प्रवास के मौसम में पक्षी और चमगादड़ विंड टरबाइन से टकरा सकते हैं। इसके अलावा, ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। 

नवीकरणीय ऊर्जा के विभिन्न उप-क्षेत्रकों के समक्ष चुनौतियां

सौर

  • हीटवेव का प्रभाव: एक अध्ययन के अनुसार, तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से सौर पैनल के वोल्टेज में लगभग 0.5% की गिरावट होती है।
  • निर्भरता: फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की आपूर्ति श्रृंखला के 80% से अधिक हिस्से पर चीन का कब्जा है।

पवन 

  • कौशल: टरबाइन बनाने तथा विंड फार्म्स के निर्माण एवं रख-रखाव के लिए उच्च स्तर की तकनीकी योग्यता एवं कौशल की आवश्यकता होती है।
  • अपर्याप्त ट्रांसमिशन अवसंरचना: इसमें लम्बी एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज (EHV) ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता होती है, जिससे निर्माण की लागत और परिचालन घाटा बढ़ जाता है।

जल-विद्युत 

  • जल-विद्युत उत्पादन में गिरावट: इसके लिए दक्षिण भारत में कम वर्षा एक प्रमुख कारक है। साथ ही, प्राकृतिक आपदाओं के चलते उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के प्रमुख विद्युत संयंत्रों पर भी असर पड़ रहा है।
  • सामाजिक-पर्यावरण: इसमें लोगों का विस्थापन, नदी पारिस्थितिक-तंत्र के समक्ष बाधा, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, जलीय और स्थलीय जैव विविधता की हानि, खाद्य प्रणालियों में नकारात्मक बदलाव आदि शामिल हैं। 

बायोमास

  • फीडस्टॉक की अपर्याप्त आपूर्ति: इसमें फीडस्टॉक आपूर्तिकर्ता के साथ दीर्घकालिक अनुबंध का अभाव शामिल है। 
  • बायोमास व्यापार के लिए सीमित मंच: वर्तमान में, देश में बायोमास व्यापार बिखरा हुआ है और केवल कुछ ही राज्यों तक सीमित है।

अपशिष्ट से ऊर्जा 

  • तकनीकी चुनौती: सूखे ठोस अपशिष्ट की तुलना में गीले ठोस अपशिष्ट का प्रतिशत अधिक होने से विद्युत उत्पादन कठिन हो जाता है।
  • विनियमनों का अभाव: विशेष रूप से अपशिष्ट से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्रों के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अनिवार्य होता है।

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए प्रमुख कदम 

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के लिए स्वचालित मार्ग के तहत 100% तक FDI की अनुमति है।
  • पी.एम. सूर्य घर - मुफ्त बिजली योजना: इसे 75,021 करोड़ रुपये के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ एक करोड़ घरों की छत पर सौर संयंत्र (Rooftop solar plants) स्थापित करने के लक्ष्य के साथ वित्त वर्ष 2027 तक लागू किया जाना है। 
  • हरित ऊर्जा गलियारा (GEC) परियोजनाएं: यह नवीकरणीय ऊर्जा को उनके उत्पादन स्थल से खपत स्थल तक पहुंचाने को सुगम बनाने और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ग्रिड को पुनः आकार देने के लिए शुरू की गई है। 
  • सौर पार्क योजना: इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा डेवलपर्स को सभी क़ानूनी मंजूरियों के साथ आवश्यक अवसंरचना को सुगम बनाकर प्लग एंड प्ले मॉडल प्रदान करना है। 
  • नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन 2023: इस मिशन का लक्ष्य 2030 तक लगभग 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) वार्षिक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता हासिल करना है। 

आगे की राह 

  • ऊर्जा भंडारण क्षमता में वृद्धि करना: ऊर्जा भंडारण प्रणाली (जैसे- पंप स्टोरेज हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी, बैटरी स्टोरेज आदि) का उपयोग नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न ऊर्जा को दिन के अन्य समय में उपयोग करने के लिए भंडारित करने हेतु किया जा सकता है। 
    • इससे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रबंधन किया जा सकता हैग्रिड स्टेबिलिटी में सुधार हो सकता है; एनर्जी/ पीक शिफ्टिंग आदि संभव हो सकता है।
  • केंद्र-राज्य समन्वय: केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर आवश्यक भूमि (उदाहरण के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा जोन) की पहचान करने की आवश्यकता है। इसी तरह, राज्यों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा की आपूर्ति के लिए 'मस्ट रन' स्थिति को सही तरीके से लागू किया जा रहा है।
    • 'मस्ट रन' स्थिति का अर्थ है कि संबंधित विद्युत संयंत्र को हर हालत में ग्रिड को बिजली की आपूर्ति करनी होगी।
  • अभिनव वित्त-पोषण: इसके तहत अनुबंध प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना (जैसे, अनुबंधों का मानकीकरण), और प्रासंगिक जानकारी उपलब्ध कराना, ग्रीन बांड्स के उपयोग का विस्तार करना आदि शामिल हैं।
  • ग्रिड प्रौद्योगिकी को उन्नत करना: सभी स्तरों (राज्य, क्षेत्रीय, और राष्ट्रीय) पर ग्रिड ऑपरेटरों को आस-पास के क्षेत्रों में ग्रिड की स्थिति के बारे में पता होना चाहिए और उनके साथ समन्वय में काम करना चाहिए। इससे वे ग्रिड को अधिक कुशलता से प्रबंधित कर सकेंगे और बिजली की आपूर्ति को स्थिर बनाए रख पाएंगे। 
    • केंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा पूर्वानुमान तंत्र को सिस्टम ऑपरेशंस के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है।
  • भूमि का सर्वोत्तम उपयोग करना: सौर परियोजनाओं के लिए बंजर भूमि, सीमांत भूमि और रूफटॉप के उपयोग को बढ़ावा देने से कृषि एवं वन भूमि पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम किया जा सकता है।
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