भारत-अफगानिस्तान संबंधों में बदलाव (SHIFT IN INDIA–AFGHANISTAN RELATIONS) | Current Affairs | Vision IAS
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भारत-अफगानिस्तान संबंधों में बदलाव (SHIFT IN INDIA–AFGHANISTAN RELATIONS)

05 Mar 2025
34 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, भारत के विदेश सचिव और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री के बीच पहली द्विपक्षीय बैठक दुबई में संपन्न हुई।

अन्य संबंधित तथ्य

  • यह बैठक भारत की कूटनीति में बदलाव और तालिबान समर्थित अफगान सरकार के साथ बढ़ते संपर्क का संकेत है।
  • यह 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी और सत्ता पर तालिबान के नियंत्रण के बाद भारत और तालिबान के बीच उच्चतम स्तर की बैठक थी।
  • इससे पहले नवंबर, 2024 में भारतीय राजनयिकों और तालिबान के रक्षा मंत्री के बीच पहली आधिकारिक बैठक काबुल में संपन्न हुई थी।

अफगानिस्तान के प्रति भारत की कूटनीतिक नीति में बदलाव क्यों आया है?

  • अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में तनाव: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंध भारत को इस क्षेत्र में पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने का अवसर प्रदान करता है
    • उदाहरण के लिए, पाकिस्तान ने 5,00,000 से अधिक अफगान शरणार्थियों को अपने देश से निष्कासित कर दिया है। इससे अफगानिस्तान में मानवीय संकट पैदा हो गया है। 
  • पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के अड्डों को नष्ट करने के लिए पूर्वी अफगानिस्तान पर हवाई हमले किए हैं। तालिबान सरकार ने पाकिस्तानी हवाई हमले को अफगानिस्तान की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन बताया।
  • क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को प्रतिसंतुलित करना: तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से, चीन अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठा रहा है।
    • उदाहरण के लिए, अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में चीन के नए राजदूत की नियुक्ति, खनिज और अन्य खनन अनुबंधों पर हस्ताक्षर करना, काबुल में शहरी विकास परियोजनाएं शुरू करना, आदि।
  • अफगानिस्तान की जमीन से आतंकी गतिविधियों को रोकना: आतंकवादी समूहों ने अफगानिस्तान की धरती को लॉन्च पैड के रूप में इस्तेमाल किया है। तालिबान के साथ निरंतर वार्ता यह सुनिश्चित करेगी कि अफगानिस्तान की जमीन से भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां नहीं चलाई जाएं।
    • उदाहरण के लिए, अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद से भारत को वहां सक्रिय लश्कर-ए-तैयबा (LeT), जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे  पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी समूहों से अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से खतरा है।
  • मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद: अफगानिस्तान सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जगह पर अवस्थित है। यह मध्य और दक्षिण एशिया के बीच स्थित है। इसलिए इसे 'हार्ट ऑफ एशिया' भी कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से यह खैबर और बोलान दर्रे के माध्यम से भारत के लिए प्रवेश एक प्रमुख मार्ग रहा है।
    • उदाहरण के लिए, चाबहार बंदरगाह के विकास पर ईरान के साथ सहयोग करने से भारत को अफगानिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुंचने में मदद मिलेगी
  • अफगानिस्तान में विकास परियोजनाओं को फिर से शुरू करना और पहले से किए गए निवेश को सुरक्षित करना: उदाहरण के लिए, भारत ने अफगानिस्तान में सड़क, बिजली लाइन, बांध निर्माण, अस्पताल-निर्माण जैसी 500 से अधिक अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में 3 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है।
    • भारत ने अनेक अफगान अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है, हजारों छात्रों को छात्रवृत्तियां प्रदान की है और अफ़गानिस्तान के नए संसद भवन का निर्माण भी किया है।
  • भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करना: वर्ष 2021 के अंत में भारत ने सूखा प्रभावित अफगानिस्तान को मानवीय सहायता के रूप में हजारों टन गेहूं की आपूर्ति की।
    • उदाहरण के लिए, 2024-25 के केंद्रीय बजट में, भारत ने अफगानिस्तान को सहायता के लिए 50 करोड़ रुपये आवंटित किए।
  • क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करना: भारत इस बात को लेकर चिंतित है कि अफगानिस्तान में अस्थिरता का असर इस संपूर्ण क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।

अफगानिस्तान के साथ कूटनीतिक अप्रोच में परिवर्तन क्यों चुनौतीपूर्ण हो सकता है?

  • तालिबान की आंतरिक कार्यप्रणाली और नीतियां: तालिबान हिंसा और क्रूरता में विश्वास करने वाला समूह है। इसने 1990 के दशक वाले अपने स्वरूप को बदलने का बहुत कम प्रयास किया है, खासकर महिलाओं और लड़कियों के प्रति अपनी नीतियों के मामले में।
    • उदाहरण के लिए, सत्ता पर दोबारा नियंत्रण के बाद से, तालिबान सरकार अफगान लोगों को बुनियादी आर्थिक अवसर, स्वास्थ्य-देखभाल सुविधाएं, शैक्षिक अवसर आदि प्रदान करने के लिए एक व्यावहारिक समावेशी सरकार देने में विफल रही है।
  • आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित चिंताएँ: तालिबान को अपनी धरती पर वैश्विक और क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों को पनाह और समर्थन करने के लिए जाना जाता है। ये आतंकवादी संगठन भारत की सुरक्षा के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से खतरा पैदा करते हैं।
    • उदाहरण के लिए, अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान (ISKP), अल-कायदा तथा पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए- तैबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी समूहों की मौजूदगी से इस क्षेत्र में कट्टरपंथ और उग्रवाद के प्रसार का खतरा बढ़ गया है।
  • मादक पदार्थों की तस्करी: अफगानिस्तान वैश्विक स्तर पर अफीम का एक बड़ा उत्पादक देश है तथा यहां से उत्पन्न होने वाले मादक पदार्थों के व्यापार ने इस क्षेत्र में अस्थिरता और हिंसा को बढ़ावा दिया है। इसका अफगानिस्तान और भारत, दोनों देशों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
    • उदाहरण के लिए, 2021 में, दुनिया की 80% से अधिक अफीम अफगानिस्तान में उगाई गई थी। भारत को डर है कि अफीम से होने वाली कमाई का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण में किया जा सकता है।
  • चीन का बढ़ता प्रभाव: अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहां पर चीन की बढ़ती भागीदारी ने इस क्षेत्र में भारत की चिंताएं बढ़ा दी है। 
    • उदाहरण के लिए,  चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को अफगानिस्तान तक विस्तारित करने का प्रयास किया जा रहा है।

आगे की राह

  • एक्ट वेस्ट पॉलिसी: भारत को "एक्ट वेस्ट पॉलिसी" में यथार्थवादी अप्रोच अपनाना चाहिए तथा इस क्षेत्र में अपनी पारंपरिक मित्रता का लाभ उठाना चाहिए। इसके अलावा भारत को अपनी 'एक्ट वेस्ट पॉलिसी' में अफगानिस्तान को अधिक महत्त्व देने की आवश्यकता है।
  • मानवीय सहायता: इस क्षेत्र की जटिल भू-राजनीतिक गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए और चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए, भारत को अफगानिस्तान के स्वास्थ्य-देखभाल क्षेत्र में मदद और वहां शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए मानवीय सहायता बढ़ानी चाहिए
  • विकास परियोजनाओं को फिर से शुरू करना: विकास परियोजनाओं के माध्यम से निवेश बढ़ाने से अफगान अर्थव्यवस्था में सुधार होगा, रोजगार के अवसर सृजित होंगे, मादक पदार्थों की तस्करी को रोका जा सकेगा, आतंकवाद में कमी आएगी तथा अफगानिस्तान के साथ भारत की आर्थिक भागीदारी भी मजबूत होगी
  • सांस्कृतिक संबंध: सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने हेतु अफगान नागरिकों के लिए वीजा नियमों में ढील, खेल (जैसे- क्रिकेट) अवसंरचना का विकास, और अफगान छात्रों के लिए शैक्षिक छात्रवृत्तियों की व्यवस्था जैसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
  • कूटनीतिक भागीदारी बढ़ाना: अलग-अलग अंतर्राष्ट्रीय और बहुपक्षीय फ़ोरम पर सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है, जैसे कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) में। 

 

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