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एस्ट्रोसैट (ASTROSAT)

12 Nov 2025
1 min

In Summary

2015 में प्रक्षेपित भारत के एस्ट्रोसैट ने 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसने एक्स-रे, पराबैंगनी और प्रकाशीय तरंगदैर्घ्य में खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया है, भारत के अंतरिक्ष विज्ञान नेतृत्व को स्थापित किया है और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

अंतरिक्ष के अध्ययन को समर्पित भारत की पहली वेधशाला 'एस्ट्रोसैट' ने अपने प्रक्षेपण के 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं।

एस्ट्रोसैट के बारे में

  • उद्देश्य: खगोल विज्ञान अध्ययन को समर्पित भारत के इस पहले मिशन को एक्स-रे, अल्ट्रावायलेट, और ऑप्टिकल तरंग दैर्ध्य में खगोलीय पिंडों का एक साथ अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया है। इस तरह यह मिशन ब्रह्मांडीय परिघटनाओं का एक समग्र अवलोकन प्रदान करता है। 
  • प्रक्षेपण: इसे 28 सितंबर, 2015 को श्रीहरिकोटा से PSLV-C30 यान से प्रक्षेपित किया गया था।
  • कक्षा: इसे 650 किलोमीटर की ऊँचाई पर निम्न भू-कक्षा (Low Earth orbit) में स्थापित किया गया है। इसका न्यूनतम जीवनकाल 5 वर्ष का था। 
  • स्पेक्ट्रल रेंज: यह मिशन 0.3 keV से 100 keV तक के विस्तृत ऊर्जा बैंड का अध्ययन करता है। इस तरह यह निकट और सुदूर अल्ट्रावायलेट क्षेत्रों के बारे में जानकारी प्रदान करता है। इससे उच्च-ऊर्जा और मंद ऊर्जा, दोनों ही प्रकार के खगोलीय ऊर्जा स्रोतों की खोज संभव होती है।  

एस्ट्रोसैट के वैज्ञानिक उद्देश्य 

  • उच्च-ऊर्जा उत्सर्जन वाली परिघटनाओं का अध्ययन: इसका उद्देश्य न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल वाली युग्म तारा प्रणालियों (Binary star systems) में उच्च-ऊर्जा प्रक्रियाओं को समझना है। इससे चरम परिघटनाओं वाले ब्रह्मांडीय परिवेश से संबंधित जानकारी मिलती है। 
  • चुंबकीय क्षेत्रों को मापना: इसका उद्देश्य न्यूट्रॉन तारों के चुंबकीय क्षेत्रों का अनुमान लगाना है। यह उनकी संरचना और विकास के अध्ययन में मदद करता है। 
  • तारों के निर्माण का अध्ययन: इसका उद्देश्य तारों के निर्माण वाले क्षेत्रों और हमारी आकाशगंगा से परे की तारा प्रणालियों में उच्च-ऊर्जा वाली गतिविधियों का अध्ययन करना है। यह आकाशगंगा के विकास की हमारी समझ को बढ़ाएगा। 
  • क्षणिक व अनियमित एक्स-रे स्रोतों का पता लगाना: इसका उद्देश्य नए व अल्पकालिक एक्स-रे स्रोतों की पहचान करना है। यह अचानक होने वाली ब्रह्मांडीय परिघटनाओं को ट्रैक करने में मदद करता है।
  • अल्ट्रावायलेट ब्रह्मांड का सर्वेक्षण: इसका उद्देश्य अल्ट्रावॉयलेट स्पेक्ट्रम में ब्रह्मांड के क्षेत्र का सीमित लेकिन गहन सर्वेक्षण करना है। यह सर्वेक्षण सुदूर और मंद या मद्धिम खगोलीय पिंडों के संबंध में हमारी जानकारी को बढ़ाता है।

अंतरिक्ष में और जमीन पर स्थित भारत की अन्य वेधशालाएं

  • एक्सपोसैट (XPoSat): यह खगोलीय स्रोतों से एक्स-रे उत्सर्जन पर अनुसंधान और मापन के लिए समर्पित इसरो का पहला उपग्रह है। 
  • आदित्य-L1: इसे सितंबर 2023 में प्रक्षेपित किया गया था। यह भारत का पहला सौर मिशन है जो सौर गतिविधियों के निरंतर अवलोकन के लिए 'सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु' की परिक्रमा करता है। 
  • भारतीय खगोलीय वेधशाला (IAO), हानले (लद्दाख): यह खगोलीय और वायुमंडलीय अध्ययनों के लिए ऑप्टिकल, इन्फ्रारेड और गामा-रे दूरबीनों से युक्त है। 
  • कोडाइकनाल सौर वेधशाला (तमिलनाडु): यह भारत की सबसे पुरानी सौर वेधशालाओं में से एक है। यह दीर्घकालिक सौर अवलोकनों के लिए जानी जाती है। 

 

भारत के लिए महत्व 

  • वैज्ञानिक अध्ययन में नेतृत्व: इस मिशन ने भारत को बहु-तरंगदैर्ध्य खगोल विज्ञान (Multiwavelength Astronomy) के अध्ययन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देश के रूप में स्थापित किया है। यह उपग्रह एक साथ एक्स-रे, UV और प्रकाश (ऑप्टिकल) स्रोतों का अवलोकन करने में सक्षम हैं।
  • स्वदेशी क्षमता: इस मिशन ने जटिल अंतरिक्ष वेधशाला को तैयार करने और संचालित करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया है।
  • अनुसंधान और शैक्षणिक जानकारी में वृद्धि: यह पूरे भारत में खगोल भौतिकी में अत्याधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है। 
  • वैश्विक सहयोग: यह मिशन खगोल विज्ञान में भारत की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा को बढ़ा रहा है और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी को भी बढ़ावा दे रहा है। 

एस्ट्रोसैट भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान में एक बड़ी उपलब्धि है। यह बहु-तरंगदैर्ध्य खगोल विज्ञान की हमारी समझ को बढ़ाता है और विश्व के देशों के साथ वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करता है। साथ ही, यह अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता को भी दर्शाता है।

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