सुप्रीम कोर्ट ने पलार नदी में चर्म शोधनशालाओं (Tanneries) से अनुपचारित अपशिष्ट के बहाव को रोकने के लिए निर्देश जारी किए | Current Affairs | Vision IAS
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ये निर्देश वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (1996) मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार जारी किए गए हैं।

  • इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने "एहतियाती सिद्धांत" (Precautionary Principle) और "प्रदूषक द्वारा भुगतान सिद्धांत" (Polluter Pays Principle) को "सतत विकास" का अनिवार्य घटक बताया है। 
    • “प्रदूषक द्वारा भुगतान सिद्धांत” के तहत, जो भी प्रदूषण फैलाता है, उसे प्रदूषण रोकथाम और प्रबंधन की लागत वहन करनी होती है। इसका उद्देश्य प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य या पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाना है।
    • "एहतियाती सिद्धांत" वास्तव में निर्णय प्रक्रिया में शामिल हितधारकों को ऐसे मामलों में एहतियाती कदम उठाने की अनुमति देता है, जहां पर्यावरण या मानव स्वास्थ्य पर खतरे के ठोस प्रमाण पूरी तरह से स्पष्ट न हों। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देशों पर एक नजर

  • राज्य सरकार को प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा देना होगा, जिसे ‘प्रदूषक द्वारा भुगतान सिद्धांत’ के तहत प्रदूषण फैलाने वालों से वसूला जाएगा।  
  • सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति पर्यावरण को होने वाली क्षति का आकलन करेगी और उससे निपटने के लिए उपाय सुझाएगी। 

चमड़े के कारखानों के अपशिष्ट से पलार नदी में प्रदूषण

  • तमिलनाडु की पलार नदी चर्म शोधनशालाओं से निकलने वाले अनुपचारित रासायनिक अपशिष्ट से अत्यधिक प्रदूषित हो रही है। इन अपशिष्टों में क्रोमियम जैसी विषाक्त भारी धातु भी शामिल हैं।
  • चर्म शोधनशालाएं ऐसे कारखाने होते हैं, जहां पशुओं की खाल को संसाधित कर चमड़े में बदला जाता है।
  • इन शोधनशालाओं से निकलने वाले अनुपचारित अपशिष्ट के कारण जल स्रोतों, भूजल और कृषि भूमि को अपूरणीय क्षति होती है।

पर्यावरण संबंधी मुद्दों के संवैधानिकीकरण (Constitutionalization) पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्णय

  • रूरल लिटिगेशन एंड एंटाइटलमेंट सेंटर बनाम राज्य (1988): इस निर्णय में “स्वस्थ पर्यावरण में जीने के अधिकार” को संविधान के अनुच्छेद 21 का भाग माना गया था।
  • एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987): इस वाद में सुप्रीम कोर्ट ने "प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में जीने के अधिकार" को अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार के रूप में स्वीकार किया था।
  • टी.एन. गोदावरमन तिरुमुलपाद बनाम भारत संघ एवं अन्य (1996): इस निर्णय में हरे-भरे क्षेत्रों के संरक्षण के लिए 'वन' की परिभाषा का विस्तार किया गया था। 
    • इसमें सुप्रीम कोर्ट ने वन की “शब्दकोशीय” (डिक्शनरी) परिभाषा को अपनाने को कहा। इसका अर्थ है कि सभी हरे-भरे क्षेत्र, चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी हो और उनका स्वामित्व किसी के भी पास हो, ‘वन’ माने जाने चाहिए।
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