इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग (iGOT) कर्मयोगी प्लेटफ़ॉर्म ने 1 करोड़ उपयोगकर्ताओं को पंजीकृत करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल की।
iGOT कर्मयोगी के बारे में
- इसे 2022 में शुरू किया गया था। यह देश भर के सिविल सेवकों के लिए एक समग्र लर्निंग इकोसिस्टम उपलब्ध कराता है।
- इस प्लेटफॉर्म पर सिविल सेवकों के लिए उनकी सुविधा के हिसाब से पाठ्यक्रम, वेबिनार और सहकर्मी-आधारित लर्निंग के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं। इनमें अभिशासन कौशल, नीतिगत कौशल, प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी कौशल से जुड़े विषय शामिल हैं।
- यह मिशन कर्मयोगी का एक प्रमुख घटक है।
- मिशन कर्मयोगी सिविल सेवा के क्षमता निर्माण हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम है।
- मिशन कर्मयोगी का उद्देश्य सिविल सेवा को क्षमता निर्माण के माध्यम से सशक्त बनाना है।
- इसे कर्मयोगी भारत नामक एक स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) द्वारा लागू किया जाता है।
- इसे डिजिटल इंडिया स्टैक का एक अभिन्न हिस्सा मानते हुए विकसित किया गया है।
Article Sources
1 sourceभारत ने 2025-26 के लिए औपचारिक रूप से एशियन प्रोडक्टिविटी ऑर्गनाइजेशन (APO) की अध्यक्षता ग्रहण की।
एशियन प्रोडक्टिविटी ऑर्गनाइजेशन (APO) के बारे में
- स्थापना: यह एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसकी स्थापना 1961 में आठ संस्थापक सदस्य देशों ने की थी।
- भारत भी इन संस्थापक सदस्यों में शामिल है।
- उद्देश्य: एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग के माध्यम से उत्पादकता को बढ़ाना।
- सदस्य: इसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र की 21 अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
- मुख्य भूमिकाएं:
- सदस्य देशों की नई आवश्यकताओं पर अनुसंधान करना और उन पर कार्य के लिए मार्गदर्शन प्रदान करना।
- सदस्य देशों के बीच द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना।
- प्रत्येक सदस्य देश की आर्थिक एवं विकास नीतियों और प्रदर्शन का सर्वेक्षण करना, आदि।
भारतीय शोधकर्ताओं ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र से प्राप्त जरोसाइट के नमूनों का अध्ययन किया।
- गौरतलब है कि कच्छ क्षेत्र का शुष्क और खारा भू-भाग मंगल ग्रह की परिस्थितियों से मिलता-जुलता है।
जरोसाइट (Jarosite) के बारे में
- यह पीले-भूरे रंग का खनिज है। इसमें पोटेशियम, लौह और सल्फेट पाए जाते हैं।
- यह खनिज पृथ्वी और मंगल, दोनों ग्रहों पर पाया जाता है।
- यह खनिज एलुनाइट सुपरग्रुप (Alunite Supergroup) का सदस्य है।
- जरोसाइट का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?
- जरोसाइट के निर्माण के लिए जल और अम्लीय दशाओं की आवश्यकता होती है। इसलिए मंगल पर इस खनिज का पाया जाना इस तथ्य का मजबूत प्रमाण है कि वहां कभी जल मौजूद था।
- यह खनिज ग्लाइसिन जैसे जैव-अणुओं (Organic molecules) को अपनी संरचना में फंसा कर रख सकता है। इससे यह खनिज मंगल ग्रह पर प्राचीन जीवन की खोज के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
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1 sourceत्रिपुरा के कमलपुर ने सिंगल-यूज प्लास्टिक के विकल्प के रूप में पॉलीब्यूटिलीन एडीपेट टेरिफ्थेलैट (PBAT) से बने कम्पोस्टेबल बैग्स प्रस्तुत किए हैं।
PBAT के बारे में
- यह एक बायोडिग्रेडेबल (जैविक रूप से अपघटनीय), रसायन-मुक्त थर्मोप्लास्टिक को-पॉलीमर है।
- थर्मोप्लास्टिक ऐसे पॉलिमर होते हैं, जिन्हें गर्म करके नरम किया जा सकता है। इन्हें वांछित आकार देकर फिर से ठंडा करके कठोर बनाया जा सकता है।
- इसे मक्का स्टार्च, गन्ने जैसे नवीकरणीय संसाधनों से बनाया जाता है।
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1 sourceकेरल के कासरगोड में एशियन जायंट सॉफ्टशेल टर्टल को बचाने पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री ने दादासाहेब फाल्के पुरस्कार जीता।
- दादासाहेब फाल्के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (DPIFF) पुरस्कार 'भारतीय सिनेमा के जनक' दादासाहेब फाल्के की विरासत का स्मरण करने के लिए दिया जाता है।
- उन्होंने 1913 में भारत की पहली फीचर फिल्म, राजा हरिश्चंद्र बनाई थी।
एशियन जायंट सॉफ्टशेल टर्टल (पेलोचेलिस कैंटोरी) के बारे में
- इसे कैंटोर का जायंट सॉफ्टशेल टर्टल कहा जाता है, यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाने वाला एक लंबा मीठे पानी का कछुआ है।
- केरल में इसे भीमनमा (भीमन का अर्थ विशाल और आमा का अर्थ कछुआ) कहते हैं।
- पर्यावास: इसके पर्यावास में बड़ी तराई वाली नदियां, झीलें, जलाशय और मुहाने वाले क्षेत्र आते हैं। इनमें मैंग्रोव चैनल और नदी के मुहानों के पास के तटीय कीचड़ वाले मैदान भी शामिल हैं।
- IUCN स्थिति: क्रिटिकली एंडेंजर्ड।
- इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षित किया गया है।
- विशेषताएं:
- चपटा सिर और फैली हुई आँखें।
- इनका व्यवहार आक्रामक होता है। ये घात लगाकर शिकार करते हैं और बहुत तेज गति से हमला करते हैं। इनका जबड़ा बहुत मजबूत होता है।
भारतीय नौसेना ने पारंपरिक रूप से टांका विधि से निर्मित इंडियन नेवल सेलिंग वेसल (INSV) कौंडिन्य को नौसेना बेस, कारवार (कर्नाटक) में शामिल किया।
- भारत में पारंपरिक रूप से टांका विधि से जहाज निर्माण को टंकाई विधि कहा जाता है।
INSV कौंडिन्य के बारे में
- यह 5वीं शताब्दी ई. के एक जहाज पर आधारित है, जिसे अजंता की गुफाओं के चित्रों में दर्शाया गया है।
- इसका नाम कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है। यह एक पौराणिक भारतीय नाविक था, जिसने हिंद महासागर पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्रा की थी।
- जहाज के पतवार पर लकड़ी के तख्तों को नारियल की रस्सी, नारियल के रेशे और प्राकृतिक राल का उपयोग करके टांका विधि से लगाया गया है।
टंकाई विधि
- यह 2000 साल पुरानी तकनीक है।
- इसमें, जहाज को कील का उपयोग करने की बजाय लकड़ी के तख्तों को एक साथ सिलाई कर बनाया जाता है।
- यह लचीलापन और अधिक स्थायित्व प्रदान करती है। इससे इन्हें उथले पानी और रेत के टीलों से कम नुकसान होता है।