सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में पत्तन,पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) ने दो प्रमुख योजनाओं पोत निर्माण वित्तीय सहायता योजना (SBFAS) और पोत निर्माण विकास योजना (SbDS) के लिए परिचालन दिशा-निर्देश अधिसूचित किए हैं।
अन्य संबंधित तथ्य

- इन दिशा-निर्देशों में वर्ष 2047 तक भारत की वाणिज्यिक पोत निर्माण क्षमता को बढ़ाकर 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज (GT) प्रति वर्ष करने का रोडमैप निर्धारित किया गया है।
परिचालन दिशा-निर्देशों के बारे में
- पोत निर्माण वित्तीय सहायता योजना (SBFAS)
- श्रेणीबद्ध वित्तीय सहायता: पोत की श्रेणी के आधार पर, उसकी लागत की 15%-25% तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।।
- राष्ट्रीय पोत निर्माण मिशन (NSM): इसका उद्देश्य देश भर में पोत निर्माण के समन्वित नियोजन, मांग एकत्रीकरण और समकालिक निष्पादन की निगरानी करना है।
- शिपब्रेकिंग क्रेडिट नोट: भारतीय शिपयार्डों में पोतों को स्क्रैप करने वाले पोत मालिकों को स्क्रैप मूल्य के 40% मूल्य का क्रेडिट नोट प्रदान किया जाएगा।
- पोत निर्माण विकास योजना (SbDS)
- ग्रीनफील्ड अवसंरचना विकास: इसके तहत नए क्लस्टरों में सामान्य समुद्री और आंतरिक अवसंरचना के लिए 100% पूंजी सहायता प्रदान की जाएगी।
- अनुसंधान और कौशल विकास: भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय (IMU) के तहत भारतीय पोत प्रौद्योगिकी केंद्र (ISTC) की स्थापना करने की बात कही गई है।
- क्रेडिट जोखिम कवरेज ढांचा: वित्तीय जोखिमों को कम करने हेतु सरकार समर्थित बीमा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
भारत में पोत निर्माण क्षेत्रक
- वैश्विक स्थिति: भारत की वर्तमान में वैश्विक पोत निर्माण बाजार में हिस्सेदारी 1% से भी कम है। यह चीन (47%), दक्षिण कोरिया (25%) और जापान (18%) जैसे देशों से काफी पीछे है।
- वर्तमान क्षमता: भारत का वार्षिक उत्पादन लगभग 0.072 मिलियन ग्रॉस टनेज (GT) है। इसे 2030 तक 0.33 मिलियन GT और 2047 तक 4.5 मिलियन GT तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
- बेड़े की आयु (Fleet Age): भारतीय ध्वज वाले बेड़े की औसत आयु 21 वर्ष है, जिससे बेड़े के प्रतिस्थापन के लिए लगभग 2,500 नए पोतों की तत्काल घरेलू मांग पैदा होती है।
- बाजार वृद्धि: भारतीय पोत निर्माण क्षेत्रक का मूल्य 2022 में 90 मिलियन अमेरिकी डॉलर था तथा 60% की CAGR से बढ़ते हुए 2033 तक 8.12 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
चुनौतियाँ और संरचनात्मक बाधाएं
- उच्च पूंजी लागत: भारतीय शिपयार्ड्स को 9-11% की उधार लागत का सामना करना पड़ता है। वहीं, चीन और दक्षिण कोरिया में यह 4-6% है। इससे 20% लागत का नुकसान होता है।
- खंडित इकोसिस्टम: एकीकृत क्लस्टरों की कमी के कारण शिपयार्ड घटक आपूर्तिकर्ताओं से दूर स्थित हैं, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत और समय-सीमा बढ़ती है।
- आयात निर्भरता: भारत अभी भी विशेष स्टील, प्रणोदन इंजन और नेविगेशन इलेक्ट्रॉनिक्स सहित महत्वपूर्ण समुद्री घटकों का 60-70% आयात करता है।
- अवसंरचना संबंधी सीमाएं: भारत के अधिकांश ड्राई डॉक 310 मीटर से छोटे हैं, जिससे अल्ट्रा लार्ज क्रूड कैरियर्स (ULCC) जैसे बड़े पोतों का निर्माण या मरम्मत करना संभव नहीं हो पाता है।
- बाजार की प्राथमिकता: कम लागत और तत्काल उपलब्धता के कारण भारतीय पोत मालिक अक्सर पुराने विदेशी पोत खरीदना पसंद करते हैं।
- अपर्याप्त MRO (मरम्मत) क्षेत्र: अधिकांश भारतीय ध्वज वाले पोत अपनी मरम्मत एवं रखरखाव कार्य सिंगापुर, दुबई या कोलंबो में कराना पसंद करते हैं, जहाँ बेहतर अवसंरचना और त्वरित सेवा उपलब्ध होती है।
पोत निर्माण क्षेत्रक को बढ़ावा देने के लिए पहलें
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