दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) पर संसदीय समिति की रिपोर्ट {Parliamentary Committee Report on Insolvency and Bankruptcy Code (IBC)} | Current Affairs | Vision IAS

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दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) पर संसदीय समिति की रिपोर्ट {Parliamentary Committee Report on Insolvency and Bankruptcy Code (IBC)}

28 Jan 2026
1 min

In Summary

  • आईबीसी पर संसदीय समिति की रिपोर्ट में भारत की दिवालियापन रैंकिंग में सुधार के बावजूद प्रणालीगत बाधाओं पर प्रकाश डाला गया है।
  • प्रमुख मुद्दों में कम वसूली दर, मूल्यांकन में विसंगतियां, वैधानिक अतिव्यापीकरण और समाधान प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण देरी शामिल हैं।
  • सिफारिशों में न्यायिक क्षमता को मजबूत करने, मुकदमेबाजी को कम करने, वसूली में सुधार करने, जवाबदेही बढ़ाने और सीमा पार दिवालियापन ढांचे को अपनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

In Summary

सुर्खियों में क्यों? 

हाल ही में वित्त पर संसदीय स्थायी समिति ने "दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की कार्यप्रणाली की समीक्षा और उभरते मुद्दे" शीर्षक से अपनी रिपोर्ट पटल पर रखी।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • यह रिपोर्ट वर्ष 2016 से IBC के विकास क्रम का गहन मूल्यांकन करती है। रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि यद्यपि IBC के कारण भारत की 'दिवाला समाधान' रैंकिंग 136 से सुधरकर 52 हो गई है, किंतु वर्तमान में यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण प्रणालीगत बाधाओं का सामना कर रही है।
  • इसके अतिरिक्त, लोकसभा की एक प्रवर समिति ने भी 'दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025' पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं, जिनमें इस विधिक ढांचे में महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के बारे में

  • IBC एक व्यापक और समेकित विधान है जो कॉर्पोरेट व्यक्तियों, साझेदारी फर्मों और व्यष्टियों (Individuals) के पुनर्गठन और दिवाला समाधान से संबंधित भारतीय कानूनों को एकीकृत करता है। यह 'देनदार-के-कब्जे' (Debtor-in-possession) वाले मॉडल से 'लेनदार-के-नियंत्रण' (Creditor-in-control) वाले सिद्धांत को स्थापित करती है।
  • प्रयोज्यता: यह संहिता कंपनी अधिनियम के तहत निगमित कंपनियों, सीमित दायित्व साझेदारी (LLPs), कॉर्पोरेट देनदारों के निजी गारंटरों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होती है।
  • IBC संहिता के चार स्तंभ:
    • भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI): यह प्रमुख विनियामक निकाय है जो दिवाला पेशेवरों (IPs) और सूचना उपयोगिताओं (IUs) की निगरानी और विनियमन के लिए उत्तरदायी है।
    • दिवाला पेशेवर: ये विनियमित पेशेवर होते हैं जो कॉर्पोरेट देनदार (CD) की आस्तियों और संपूर्ण समाधान प्रक्रिया का प्रबंधन करते हैं।
    • सूचना उपयोगिताएँ: ये इलेक्ट्रॉनिक भंडार हैं जो ऋण चूक का साक्ष्य प्रदान करने हेतु वित्तीय डेटा को एकत्रित और मान्य करते हैं।
    • न्याय निर्णयन प्राधिकरण: कंपनियों और LLPs के मामलों के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), तथा व्यक्तियों एवं साझेदारी फर्मों के लिए ऋण वसूली अधिकरण (DRT) दिवाला कार्यवाही का न्यायनिर्णयन करता है।

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP)

  • शुरुआत: कोई भी वित्तीय लेनदार, परिचालन लेनदार, या स्वयं कॉर्पोरेट देनदार न्यूनतम एक करोड़ रुपये की ऋण चूक होने पर न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के समक्ष आवेदन कर सकते हैं।
  • लेनदारों की समिति (CoC): वित्तीय लेनदारों से मिलकर बनी CoC, समाधान पेशेवर की नियुक्ति करती है और न्यूनतम 66% मतदान हिस्सेदारी के साथ समाधान योजनाओं को अनुमोदित करती है।
  • समय सीमा: CIRP को अनिवार्यतः 180 दिनों के भीतर पूर्ण करना होता है। विधिक औपचारिकताओं सहित इसे अधिकतम 330 दिनों तक विस्तारित किया जा सकता है।
  • परिसमापन और अन्य तंत्र
    • परिसमापन: यदि निर्धारित समय सीमा में कोई समाधान योजना अनुमोदित नहीं होती है, तो न्यायनिर्णायक प्राधिकरण परिसमापन का आदेश देता है। इसके तहत प्राप्त आय का वितरण 'वॉटरफॉल' तंत्र के माध्यम से पूर्व-निर्धारित वरीयता क्रम में किया जाता है।
  • प्री-पैकेज्ड इंसॉल्वेंसी (PPIRP): यह विशेष रूप से MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) के लिए निर्मित एक तीव्र और हाइब्रिड समाधान ढांचा है, जिसे 120 दिनों की समय सीमा के भीतर पूर्ण करना आवश्यक है।

IBC के कारण प्राप्त सफलताएं और व्यवहारगत परिवर्तन

  • समाधान-पश्चात पुनरुद्धार: जिन फर्मों का समाधान हुआ, उनमें परिचालन और वित्तीय स्तर पर उल्लेखनीय सुधार देखा गया। समाधान के बाद के तीन वर्षों में उनकी औसत बिक्री में 76% की वृद्धि हुई और कुल परिसंपत्तियों में लगभग 50% की वृद्धि दर्ज की गई।
  • ऋण संस्कृति में सुधार: ऋण खातों के "अतिदेय" (ओवरड्यू) रहने के औसत दिनों में भारी कमी आई है। यह अवधि IBC-पूर्व के 248–344 दिनों से घटकर अब मात्र 30–87 दिन रह गई है।
  • संहिता के बाहर ऋण निपटान: IBC के निवारक प्रभाव के कारण औपचारिक विधिक प्रक्रिया प्रारंभ होने से पूर्व ही महत्वपूर्ण ऋणों का निपटान हुआ है।
  • तरलता में सुधार: समाधान अवधि के उपरांत संबंधित इकाइयों की तरलता स्थिति में लगभग 80% का सुधार दर्ज किया गया है।

संसदीय समिति द्वारा चिह्नित प्रमुख मुद्दे

  • कम वसूली दरें और परिसंपत्ति मूल्यांकन
    • अत्यधिक कटौती: यद्यपि लेनदार परिसमापन मूल्य का लगभग 170% वसूल करते हैं, लेकिन कुल स्वीकृत दावों के मुकाबले समग्र वसूली केवल 32.8% है।
    • प्रवेश का समय: फर्में प्रायः IBC प्रक्रिया में तब प्रवेश करती हैं जब उनकी परिसंपत्तियां पहले से ही अत्यधिक दबावग्रस्त या क्षरित हो चुकी होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वसूली दर कम हो जाती है।
    • मूल्यांकन में विसंगति: परिसंपत्ति मूल्यांकन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकसमान मानकों का अभाव है।
  • वैधानिक अतिव्याप्ति और विधिक टकराव
    • PMLA के साथ टकराव: धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत परिसंपत्तियों को कुर्क करने की प्रवर्तन निदेशालय (ED) की शक्ति, प्रायः IBC के "क्लीन स्लेट" सिद्धांत से टकराती है, जो संभावित बोलीदाताओं को हतोत्साहित करता है।
    • सरकारी बकाया: "वॉटरफॉल तंत्र" (भुगतान के लिए प्राथमिकता का क्रम) में सरकारी और वैधानिक बकायों की स्थिति को लेकर, विशेष रूप से परस्पर विरोधी न्यायिक निर्णयों के बाद, अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है।
  • विलंब और लंबित मामले (बैकलॉग): CIRP प्रक्रिया में निर्धारित 330 दिनों की सीमा के विरुद्ध औसतन 713 दिन का समय लगता है। बार-बार होने वाली अपीलें और 'निरर्थक मुकदमेबाजी' इसमें विलंब का कारण बनती हैं।
  • MSME संबंधी मुद्दे: PPIRP (प्री-पैकेज्ड समाधान) की स्वीकार्यता अत्यंत कम है। साथ ही, रियायतें प्राप्त करने हेतु MSME पंजीकरण के दुरुपयोग की समस्या भी देखी गई है।
  • शासन संबंधी चिंताएं: समाधान पेशेवरों (RPs) की अत्यधिक शक्तियों और संभावित 'हितों के टकराव' के संबंध में प्रश्न उठे हैं। साथ ही, लेनदारों की समिति (CoC) के लिए अभी भी कोई प्रवर्तनीय आचार संहिता विद्यमान नहीं है।
  • सीमा-पार दिवाला: वर्तमान में भारत में उन मामलों हेतु सुदृढ़ ढांचे का अभाव है जहाँ परिसंपत्तियां कई अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों में फैली हैं।
  • कार्यान्वयन अंतराल
    • दिवाला और शोधन अक्षमता कोष: मूल संहिता में प्रावधान होने के बावजूद यह निधि अभी तक क्रियान्वित नहीं हो पाई है, जबकि यह संसाधन-संकटग्रस्त कार्यवाहियों या क्षमता निर्माण में सहायक हो सकती थी।
    • तकनीकी दक्षता की कमी: समिति ने पाया कि ई-कोर्ट्स की उपस्थिति के बावजूद कुछ न्यायाधीशों में तकनीकी दक्षता का अभाव है। साथ ही, NCLT की सहायता के लिए आईटी पेशेवरों के एक समर्पित संवर्ग (कैडर) की भी आवश्यकता है।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें:

  • न्यायिक और संस्थागत क्षमता का सुदृढ़ीकरण: लंबित मामलों के शीघ्र निपटान हेतु NCLT और NCLAT की पीठों का विस्तार किया जाना चाहिए। उच्च-मूल्य वाले ऋण खातों का प्रबंधन और शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के लिए विशेष 'फास्ट-ट्रैक अदालतों' की स्थापना पर विचार किया जाना चाहिए।
    • दिवाला और शोधन अक्षमता कोष का तत्काल परिचालन: IBC मामलों के लिए समर्पित नियमों को तत्काल अधिसूचित किया जाना चाहिए। फाइलिंग के लिए निश्चित समयसीमा निर्धारित की जाए और रजिस्ट्री की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
  • विलंब और निरर्थक मुकदमेबाजी को कम करना: अपील दायर करने वाले असफल बोलीदाताओं पर 'अनिवार्य जमा राशि' का प्रावधान कर निरर्थक मुकदमेबाजी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
    • समाधान पेशेवरों (RPs) और लेनदारों की समिति (CoC) के लिए एक 'अनुपालन चेकलिस्ट' का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, अग्रिम निर्णय और मध्यस्थता जैसी वैकल्पिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • वसूली दरों और परिसंपत्ति मूल्यांकन में सुधार: कंपनी की वास्तविक क्षमता को बेहतर रूप से प्रतिबिंबित करने तथा लेनदारों द्वारा वहन की जाने वाली 'ऋण कटौती (Haircut)' को कम करने के लिए 'परिसमापन मूल्य' (Liquidation Value) के स्थान पर 'उद्यम मूल्य' (Enterprise Value) को अपनाने का सुझाव दिया गया है। 
    • वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली को प्रोत्साहित करना और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) तथा ऑडिट के साथ मूल्यांकनकर्ताओं की निगरानी को सुदृढ़ करना।
  • जवाबदेही में वृद्धि: समाधान पेशेवर (RP) की नियुक्ति और उन्हें हटाने की प्रक्रिया में लेनदारों की समिति (CoC) को अधिक सशक्त बनाना। वित्तीय अनियमितताओं की जाँच हेतु समयबद्ध फोरेंसिक ऑडिट और अंतर-एजेंसी समन्वय को सक्षम करना। 
  • हितधारक सुधार: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए PPIRP प्रक्रिया को सरल बनाना तथा न्यायसंगत वितरण हेतु 'वॉटरफॉल तंत्र' की समीक्षा करना।
    • समाधान योजना के पूर्ण होने पर ऑनलाइन तंत्र के माध्यम से तत्काल "नो ड्यूज़" (No Dues) प्रमाण पत्र और वैधानिक मंजूरी जारी करने हेतु एक पारदर्शी ऑनलाइन तंत्र विकसित करना।
  • सीमा-पार दिवाला: समिति ने भारत के वित्तीय और कानूनी ढांचे के अनुरूप संशोधनों के साथ 'सीमा-पार दिवाला पर UNCITRAL मॉडल कानून' को चयनात्मक रूप से अपनाने की सिफारिश की है।
  • तकनीकी एकीकरण: कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय को केंद्रीकृत मामला प्रबंधन के लिए एकीकृत प्रौद्योगिकी मंच (iPIE) में तेजी लानी चाहिए और तकनीकी दक्षता में सुधार के लिए न्यायाधीशों को प्रशिक्षित करना चाहिए।

निष्कर्ष

समिति की सिफारिशें दिवाला और परिसमापन को एक निरंतर, अविभाज्य प्रक्रिया के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती हैं। यद्यपि IBC ने बैंकों के सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (GNPA) अनुपातों में सुधार किया है, किंतु अब इसे केवल ऋण वसूली उपकरण के स्थान पर एक 'बचाव तंत्र' (Rescue Mechanism) के रूप में विकसित होना होगा। इसकी समयबद्ध अनिवार्यता को बहाल करने के लिए न्यायिक अवसंरचना को सुदृढ़ करने, प्रक्रियागत खामियों को दूर करने और अंतिम परिसमापन के बजाय व्यवसाय पुनरुद्धार को प्राथमिकता देने के लिए हितधारक अनुशासन का प्रभावी प्रवर्तन आवश्यक है।

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उद्यम मूल्य (Enterprise Value)

यह किसी कंपनी के कुल मूल्य का एक माप है, जिसमें इक्विटी, ऋण और अन्य वित्तीय साधनों का मूल्य शामिल होता है। इसे परिसंपत्ति मूल्यांकन के लिए 'परिसमापन मूल्य' के स्थान पर अपनाने का सुझाव दिया गया है।

बचाव तंत्र (Rescue Mechanism)

यह एक ऐसी प्रणाली है जिसका उद्देश्य वित्तीय संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करना और उन्हें बंद होने से बचाना है, न कि केवल ऋण वसूलना। IBC को ऋण वसूली से आगे बढ़कर एक बचाव तंत्र के रूप में विकसित होने की आवश्यकता है।

सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (GNPA)

यह बैंकों या वित्तीय संस्थानों के कुल ऋण पोर्टफोलियो का वह हिस्सा है जो गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। IBC के कारण GNPA अनुपातों में सुधार देखा गया है।

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