सुर्ख़ियों में क्यों?
नीति आयोग ने "भारत में सार्वजनिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) संस्थान: बहु-क्षेत्रीय और प्रणालीगत एकीकरण के माध्यम से नवाचार को गति देना (Public R&D Institutes in India: Driving Innovation through Multisectoral and Systemic Integration)" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की।
अन्य संबंधित तथ्य

- यह रिपोर्ट भारत में सार्वजनिक अनुसंधान और विकास संस्थानों का विश्लेषण करती है। यह बताती है कि एक मजबूत अनुसंधान और विकास अवसंरचना राष्ट्र की निरंतर आर्थिक संवृद्धि में सीधे योगदान देती है और रोजगार के अवसर सृजित करती है।
- आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के 2019 के एक अध्ययन में पाया गया कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में R&D निवेश की हिस्सेदारी में 1% की वृद्धि की जाती है, तो दीर्घकाल में प्रति व्यक्ति GDP में 0.13% की वृद्धि होती है।
R&D पारितंत्र की वर्तमान स्थिति:
- रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
- GDP के प्रतिशत के रूप में व्यय: यह 0.6% से 0.7% पर स्थिर बना हुआ है, जो वैश्विक अग्रणी देशों (जैसे, संयुक्त राज्य अमेरिका के लगभग 3.5%, चीन के लगभग 2.4%) की तुलना में बहुत कम है।
- क्षेत्रीय वितरण: सार्वजनिक R&D संस्थानों के परिदृश्य में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रकों का प्रभुत्व है, जिनकी हिस्सेदारी 51% है।
- इसके बाद स्वास्थ्य, आईटी (IT) और दूरसंचार का स्थान आता है, जिनकी संस्थागत हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से बहुत कम है।
- R&D संस्थानों का वितरण: बड़े राज्यों में, कर्नाटक (208) में R&D संस्थानों की संख्या सर्वाधिक है, इसके बाद महाराष्ट्र (185) और गुजरात (165) का स्थान है।
- हालांकि, केंद्रीय R&D संस्थानों की सर्वाधिक संख्या महाराष्ट्र (78) में है, उसके बाद कर्नाटक (70) और उत्तर प्रदेश (56) का स्थान है।
- छोटे राज्यों में, मेघालय (11) में R&D संस्थानों की संख्या सर्वाधिक है।
- संघ राज्य क्षेत्रों में दिल्ली में सार्वजनिक R&D संस्थानों की संख्या सर्वाधिक है।
- अन्य प्रमुख संकेतक:
- वैश्विक रैंकिंग: भारत पेटेंट फाइलिंग (1 लाख से अधिक फाइलिंग के साथ) की दृष्टि से विश्व स्तर पर छठे स्थान पर और ट्रेडमार्क फाइलिंग (5 लाख से अधिक फाइलिंग) की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है।
- वैश्विक नवाचार सूचकांक: वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) में भारत वर्ष 2015 के 81वें स्थान से सुधरकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गया है।
रिपोर्ट द्वारा रेखांकित R&D की मुख्य चुनौतियां
- प्राथमिक वित्तपोषण स्रोत: इसमें सरकारी क्षेत्रक का प्रभुत्व (63.6%) है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत है। ज्ञातव्य है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्रक का योगदान 70% से अधिक होता है।
- क्षेत्रीय असमानता: कुछ ही राज्यों और शहरों में संस्थानों का संकेंद्रण समावेशी नवाचार और क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान को सीमित करता है।
- उदाहरण के लिए: 36% संस्थान दक्षिण भारत में संकेंद्रित हैं।
- संस्थागत पृथक्करण: विश्वविद्यालयों (शिक्षण-केंद्रित), R&D संस्थानों (अनुसंधान-केंद्रित) और उद्योगों (बाजार-केंद्रित) के बीच समन्वय एवं तालमेल का अभाव पाया जाता है।
- अन्य चुनौतियां:
- कमजोर व्यवसायीकरण: प्रयोगशाला-स्तर के अनुसंधान और बाजार के लिए तैयार उत्पादों के बीच एक बड़ा अंतराल विद्यमान है।
- पेटेंट विरोधाभास: पेटेंट की संख्या में वृद्धि गुणवत्तापूर्ण परिणामों में परिवर्तित नहीं हो पा रही है। कई पेटेंट फाइलिंग 'सामान्य' प्रकृति की होती हैं, जिनका उद्देश्य बाजार उपयोगिता के बजाय केवल अकादमिक स्कोर (API) बढ़ाना होता है।
- प्रशासनिक बाधाएं: पुरानी खरीद नियमावली, कठोर भर्ती संरचना और धीमी निर्णय प्रक्रिया उस गतिशीलता को बाधित करती है जो आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए आवश्यक है।
- मानव पूंजी की गतिहीनता: शिक्षा जगत और उद्योग के बीच शोधकर्ताओं की गतिशीलता की कमी विचारों के परस्पर आदान-प्रदान को सीमित करती है।
भारत में R&D को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहलें
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R&D पारितंत्र में सुधार हेतु आगे की राह
- स्थान-आधारित नवाचार: भविष्य के R&D संस्थानों को औद्योगिक क्लस्टरों (जैसे अमेरिका में सिलिकॉन वैली) के भीतर ही स्थापित किया जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अनुसंधान बाजार की मांग के अनुरूप होंगे तथा "प्रयोगशाला से उत्पादन तक (Lab-to-Production)" लगने वाले समय में कमी आएगी।
- साझा केंद्रों की स्थापना: संसाधनों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए "साझा उपकरण हब" (जैसे वाशिंगटन विश्वविद्यालय के 'को-मोशन लैब्स') बनाए जाने चाहिए। इससे स्टार्टअप्स और छोटे संस्थानों को उच्च-स्तरीय अवसंरचनाओं तक पहुंच प्राप्त हो सकेगी।
- निजी क्षेत्रक में R&D को प्रोत्साहित करना: R&D को "सरकार के नेतृत्व" वाले मॉडल से बदलकर "सरकार द्वारा सक्षम" मॉडल की ओर ले जाना आवश्यक है।
- डीप-टेक और सनराइज क्षेत्रकों में निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिए अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।
- अकादमिक-R&D समेकन: दोहरी नियुक्ति प्रणाली लागू की जानी चाहिए, जहां वैज्ञानिक विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य कर सकें और प्रोफेसर सार्वजनिक संस्थानों में अनुसंधान का नेतृत्व कर सकें।
- उदाहरण के लिए, MIT (USA) अपने 'इंडस्ट्रियल लीऐजन प्रोग्राम' (ILP) के माध्यम से शोधकर्ताओं को उद्योग जगत के नेतृत्वकर्ताओं के साथ साझेदारी करने में सक्षम बनाता है, जिससे ज्ञान और संसाधनों के आदान-प्रदान को मजबूती मिलती है।
- न्यायपालिका का सुदृढ़ीकरण: बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (IPAB) के उन्मूलन के बाद, मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए उच्च न्यायालयों में समर्पित बौद्धिक संपदा (IP) बेंच स्थापित की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
अनुसंधान एवं विकास (R&D) आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एक उत्प्रेरक है। भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और अंततः एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत @2047) बनाने हेतु एक सुदृढ़ R&D पारितंत्र अनिवार्य है।