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संक्षिप्त समाचार

28 Jan 2026
2 min

उच्चतम न्यायालय ने बाल तस्करी के मामलों में पीड़ितों के साक्ष्य के मूल्यांकन के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए।

  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि भारत में बाल तस्करी और बच्चों का व्यावसायिक यौन शोषण एक "अत्यधिक विचलित करने वाली वास्तविकता" है।

पीड़ितों के साक्ष्य के मूल्यांकन के लिए दिशा-निर्देश:

  • पीड़ित की सुभेद्यता: न्यायिक जांच के दौरान बाल पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक सुभेद्यता को पहचानना अनिवार्य है।
  • गवाही में गौण विसंगतियां: तस्करी के पीड़ित बच्चे की गवाही में मामूली विसंगतियों के कारण उसके साक्ष्य को खारिज नहीं किया जाएगा।
  • एकल गवाही: यदि पीड़ित की गवाही विश्वसनीय और ठोस है, तो सजा के लिए केवल उसकी गवाही ही पर्याप्त होगी। 
  • घटना की स्मृति से पुन: पीड़ित होना: शोषण की घटनाओं को बार-बार याद करना मनोवैज्ञानिक आघात, हीन भावना और प्रतिशोध के भय का कारण बनता है। न्यायिक मूल्यांकन में संवेदनशीलता और यथार्थवाद दृष्टिगोचर होना चाहिए। 
  • तस्करी का पीड़ित बालक: ऐसे बच्चे के साथ उसे कोई 'सह-अपराधी' (accomplice) नहीं, बल्कि एक "पीड़ित गवाह" (injured witness) मानकर व्यवहार किया जाना चाहिए, जो उचित सम्मान और विश्वास का पात्र है।

नीति आयोग ने 'भारत में उच्चतर शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण' पर रिपोर्ट जारी की है।  

'शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण' राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 का एक मुख्य स्तंभ है। इसका उद्देश्य भारत के घरेलू उच्चतर शिक्षा तंत्र को वैश्विक स्तर पर एकीकृत प्रणाली में बदलना है। इस कार्य को संपन्न करने के लिए मुख्य माध्यम निम्नलिखित हैं:

  • भारतीय उच्चतर शिक्षा संस्थाओं (HEIs) में अंतर्राष्ट्रीय छात्रों और संकायों (Faculty) के अनुपात में वृद्धि करके;
  • भारत में शीर्ष वैश्विक शिक्षा संस्थाओं के स्थानीय परिसरों की उपस्थिति बढ़ाकर;
  • भारतीय HEIs का भारत से बाहर विस्तार करके आदि।

भारत को अपनी उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता क्यों है?

  • देश से बाहर विप्रेषण (Outward Remittances): विगत एक दशक में इसमें 2,000% से अधिक की वृद्धि हुई है। यह 2023–24 में लगभग 3.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था, जो भारत के केंद्रीय उच्चतर शिक्षा बजट का लगभग 53% है।
  • गुणवत्ता का लोकतंत्रीकरण: घरेलू संस्थाओं में पढ़ने वाले 97% भारतीय छात्र उच्च गुणवत्ता वाली विश्व स्तरीय शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप होगी। 
  • वैश्विक तैयारी: भारतीय परिसरों में अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क, संकाय विनिमय और वैश्विक पाठ्यक्रम को शामिल करके, देश अपने विशाल कार्यबल को "वैश्विक रूप से तैयार" और वैश्विक प्रतिभा पूल में प्रतिस्पर्धी बना सकेगा।
  • अन्य: 
    • प्रतिभा पलायन (Brain Drain) को रोकना; 
    • प्रवासी भारतीयों (Diaspora) का लाभ उठाना; 
    • वैश्विक रैंकिंग में सुधार करना (जैसे- अंतर्राष्ट्रीय छात्र और संकाय अनुपात बढ़ाना);
    • सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन करना (जैसे- अबू धाबी में IIT दिल्ली का विदेशी परिसर) आदि।

नीति आयोग द्वारा की गईं नीतिगत सिफारिशें

  • शासन: एक अंतर-मंत्रालयी कार्य बल की स्थापना करनी चाहिए। साथ ही, विशिष्ट देशों के लिए नोडल केंद्रों के रूप में कार्य करने हेतु 54 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 'कंट्री सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस' (CoEs) नामित करने चाहिए। 
  • विनियमन: अंतर्राष्ट्रीयकरण के मानकों को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) मानदंडों को संशोधित करना चाहिए और वीज़ा दस्तावेजों को सरल बनाना चाहिए।
  • वित्त: वैश्विक शोधकर्ताओं और मास्टर्स डिग्री के छात्रों को आकर्षित करने के लिए 'भारत विद्या कोष' (10 बिलियन डॉलर का सॉवरेन रिसर्च फंड) और 'विश्व बंधु' फ्लैगशिप छात्रवृत्ति जैसी पहलें शुरू करनी चाहिए। 
  • ब्रांडिंग और आउटरीच: भारतीय मूल के सफल पूर्व छात्रों को वैश्विक ब्रांड एंबेसडर के रूप में संलग्न करने के लिए 'भारत की आन' (पूर्व छात्र राजदूत नेटवर्क) विकसित करना चाहिए। साथ ही, "स्टडी इन इंडिया" पोर्टल को वन-स्टॉप डिजिटल समाधान के रूप में नया रूप देना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम और संस्कृति: भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) को वैश्विक शैक्षणिक मानकों के साथ एकीकृत करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, डिग्री कार्यक्रमों में वर्तमान उद्योगों के लिए प्रासंगिक और चिंतनशील लेखन मॉड्यूल को अनिवार्य बनाना चाहिए।

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पीड़ित गवाह

यह एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग बाल तस्करी या शोषण के पीड़ितों के लिए किया जाता है। उन्हें 'सह-अपराधी' मानने के बजाय, 'पीड़ित गवाह' के रूप में माना जाता है, जिससे उन्हें सम्मान और विश्वास के साथ व्यवहार करने का अधिकार मिलता है।

एकल गवाही

जब किसी अपराध के संबंध में केवल एक पीड़ित या गवाह की गवाही ही उपलब्ध होती है, तो उसे एकल गवाही कहा जाता है। यदि यह गवाही विश्वसनीय और ठोस पाई जाती है, तो सजा के लिए यह पर्याप्त आधार बन सकती है।

गवाही में गौण विसंगतियां

बच्चों द्वारा दी गई गवाही में कभी-कभी मामूली या छोटी-मोटी विसंगतियां पाई जा सकती हैं, जो उनकी उम्र, सदमे या स्मृति की प्रकृति के कारण हो सकती हैं। इन छोटी विसंगतियों के आधार पर पूरे साक्ष्य को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

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