सुर्ख़ियों में क्यों?
रसायन और उर्वरक संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने उर्वरकों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
भारत में उर्वरक का उपयोग

- भारत विश्व स्तर पर उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- प्रमुख उर्वरक: देश में किसानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों में यूरिया, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं सल्फर (NPKS), तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) शामिल हैं।
उर्वरक सब्सिडी नीति
- यूरिया सब्सिडी योजना: इसका उद्देश्य किसानों को वैधानिक नियंत्रित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में यूरिया की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना: इस योजना के अंतर्गत पोषक तत्वों की मात्रा के आधार पर सब्सिडी युक्त फॉस्फेट एवं पोटाश (P&K) उर्वरकों पर वार्षिक/अर्धवार्षिक आधार पर एक निश्चित सब्सिडी प्रदान की जाती है।
- यह योजना 28 ग्रेड पर लागू है, जिनमें DAP, मोनो अमोनियम फॉस्फेट (MAP), MOP, ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (TSP), SSP के 3 ग्रेड, अमोनियम सल्फेट (AS), शीरे से प्राप्त पोटाश (PDM) तथा NPKS जटिल उर्वरकों के अन्य 19 ग्रेड सम्मिलित हैं।
- अन्य नीतियां
- निगरानी प्रणाली: देश भर में सभी प्रमुख सब्सिडी वाले उर्वरकों की आवाजाही की निगरानी इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मॉनिटरिंग सिस्टम (iFMS) नामक एक ऑनलाइन वेब-आधारित निगरानी प्रणाली द्वारा की जाती है।
- नई निवेश नीति (NIP), 2012: इसका उद्देश्य यूरिया क्षेत्र में नए निवेश की सुविधा प्रदान करना और भारत को यूरिया क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।
- एक राष्ट्र, एक उर्वरक: इसे प्रधान मंत्री भारतीय जनउर्वरक परियोजना (PMBJP) के तहत शुरू किया गया है। इसके तहत गुणवत्ता और ब्रांडों में एकरूपता लाने के लिए सभी यूरिया, MOP, DAP और NPK को समान 'भारत' ब्रांड के तहत बेचना अनिवार्य किया गया है।
- प्रधान मंत्री किसान समृद्धि केंद्र (PMKSKs): ये ऐसी 'वन-स्टॉप शॉप' हैं जहाँ उर्वरकों की बिक्री के साथ-साथ परामर्श सेवाएं, मृदा परीक्षण तथा अन्य कृषि आदानों की सुविधा भी किसानों को प्रदान की जाती है।
भारत में उर्वरक उपयोग से संबंधित मुद्दे
- असंतुलित उर्वरक उपयोग: भारत का N:P:K उपभोग अनुपात नाइट्रोजन की ओर अत्यधिक केन्द्रित है (जो अनुशंसित 4:2:1 से कहीं अधिक है)। इसका मुख्य कारण यूरिया पर भारी सब्सिडी है, जो इसके अत्यधिक उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
- इस असंतुलित उपयोग, सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपेक्षा तथा जैविक पदार्थों के कम उपयोग के कारण मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्पन्न हो रही है।
- आयात निर्भरता: भारत में रॉक फॉस्फेट के पर्याप्त भंडार की कमी है और वह अपनी फॉस्फेट आवश्यकताओं का लगभग 95% सऊदी अरब, जॉर्डन, मोरक्को और रूस जैसे देशों से आयात करता है।
- भारत के पास पोटाश का कोई ज्ञात वाणिज्यिक भंडार नहीं है और वह कनाडा, रूस, इजरायल और जॉर्डन से 100% आयात पर निर्भर है।
- सब्सिडी का बोझ: उर्वरक सब्सिडी खाद्य सब्सिडी के बाद दूसरा सबसे बड़ा सब्सिडी मद बनी हुई है, जो कुल केंद्रीय व्यय के 10% से अधिक है।
- कच्चे माल की वैश्विक कीमतों में वृद्धि (जैसे यूरिया के लिए प्राकृतिक गैस), विनिमय दर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान उर्वरकों की घरेलू लागत को प्रभावित करते हैं।
- दुरुपयोग: उर्वरकों की कालाबाजारी और विपथन (diversion) एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है क्योंकि सब्सिडी प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा एक बड़ा राजकोषीय बोझ उठाया जाता है।
- अप्रचलित तकनीक: परिचालन में शामिल 33 यूरिया संयंत्रों में से 27 संयंत्र 25 वर्ष से अधिक पुराने हैं और 7 संयंत्र 50 वर्ष से अधिक पुराने हैं। इन संयंत्रों में आज भी पुरानी तकनीक का ही इस्तेमाल किया जा रहा हैं, जिससे उत्पादन लागत में बढ़ोतरी होती है।
- इसके अलावा, भारत प्रोसेस टेक्नोलॉजी के लाइसेंस के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर है।
- पर्यावरण और स्वास्थ्य प्रभाव: रासायनिक उर्वरक, विशेष रूप से नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण प्रदूषण में योगदान देता है। इससे जलवायु परिवर्तन और जल संदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।
समिति द्वारा सुझाए गए सुधार
- विनिर्माण क्षमता बढ़ाना: समिति ने नई निवेश नीति के तहत घरेलू यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन करने की सिफारिश की है।
- नई इकाइयों की स्थापना के लिए वित्तीय और कर प्रोत्साहनों के माध्यम से फॉस्फेटिक और पोटाश (P&K) उर्वरकों की उत्पादन क्षमता का भी विस्तार किया जाना चाहिए।
- कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना: समिति के अनुसार यूरिया की कुल लागत का 90% प्राकृतिक गैस है, जिसे बड़े पैमाने पर दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से आयात किया जाता है।
- प्रतिस्पर्धी कीमतों पर प्राकृतिक गैस की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गैस खरीद तंत्र में संशोधन किया जाना चाहिए। इससे सरकार पर सब्सिडी का लागत बोझ भी कम होगा।
- दुरुपयोग पर नियंत्रण: कालाबाजारी रोकने के लिए सख्त नीतियां बनाना, उर्वरक की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रयोगशालाओं का नेटवर्क स्थापित करना और एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है।
- नैनो उर्वरकों का प्रोत्साहन: नैनो उर्वरकों के उत्पादन में वृद्धि करना और नैनो उर्वरकों के छिड़काव के लिए ड्रोन के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना शुरू की जानी चाहिए।
- कम कच्चे माल की आवश्यकता, उच्च पोषक तत्व ग्रहण और कम उर्वरक उपयोग के साथ उच्च फसल उपज के कारण नैनो उर्वरक लंबी अवधि में पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में प्रभावी रूप से किफायती हैं।
- संतुलित उर्वरक उपयोग: किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग, फसल चक्र और खेती के प्राकृतिक तरीकों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत की उर्वरक चुनौती केवल उपलब्धता सुनिश्चित करने में नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भरता, राजकोषीय विवेक और पर्यावरणीय संधारणीयता के बीच एक विवेकपूर्ण संतुलन प्राप्त करने में निहित है। ऐसा करने के लिए एक सुविचारित रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। इसमें घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना, तकनीक का स्वदेशीकरण करना, संतुलित पोषक तत्व उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना और कृषि पद्धतियों में पारिस्थितिक विचारों को एकीकृत करने की आवश्यकता है।