राष्ट्रीय रक्त आधान विधेयक, 2025 का उद्देश्य रक्त बैंकों और रक्त आधान सेवाओं के लिए एक समान राष्ट्रीय ढांचा तैयार करना है।
प्रमुख प्रावधानों में राष्ट्रीय रक्त आधान प्राधिकरण (एनबीटीए) की स्थापना, रक्त केंद्रों का अनिवार्य पंजीकरण और एक राष्ट्रीय रक्त संक्रमण रोकथाम प्रणाली शामिल हैं।
यह विधेयक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों, खंडित कानूनी ढांचों, एकसमान मानकों की कमी और रक्त आपूर्ति में असमानताओं को संबोधित करता है।
In Summary
सुर्ख़ियों में क्यों?
भारत भर में ब्लड बैंकों और रक्त आधान सेवाओं के नियमन हेतु एक समान राष्ट्रीय ढांचा स्थापित करने के उद्देश्य से संसद में राष्ट्रीय रक्त आधान विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया गया।
राष्ट्रीय रक्त आधान विधेयक, 2025 के मुख्य प्रावधान
समर्पित राष्ट्रीय कानून
यह मानव रक्त और रक्त घटकों के संग्रह, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारण, वितरण और आधान को विनियमित करने के लिए एक स्वतंत्र कानून है।
राष्ट्रीय रक्त आधान प्राधिकरण (NBTA)
यह राष्ट्रीय स्तर पर रक्त आधान सेवाओं की देखरेख के लिए एक वैधानिक केंद्रीय प्राधिकरण की स्थापना करता है।
इसका मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। यह देशव्यापी विनियमन, मानक निर्धारण और ब्लड केंद्रों के पर्यवेक्षण के लिए उत्तरदायी होगा।
समान राष्ट्रीय मानक
यह NBTA को सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में रक्त एवं रक्त घटकों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रबंधन के लिए समान मानक निर्धारित करने तथा उन्हें लागू करने का अधिकार देता है।
ब्लड केंद्रों का अनिवार्य पंजीकरण
सभी ब्लड केंद्रों के लिए NBTA के अधीन पंजीकरण अनिवार्य होगा। पंजीकरण पांच वर्षों के लिए वैध होगा और निर्धारित मानदंडों के अनुपालन के अधीन इसका नवीनीकरण किया जा सकेगा।
राष्ट्रीय हीमो-विजिलेंस प्रणाली
यह रक्त आधान के प्रतिकूल प्रभावों की निगरानी करने और रक्त के माध्यम से संचरित होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए एक राष्ट्रीय हीमो-विजिलेंस कार्यक्रम का प्रावधान करता है।
कठोर दंडात्मक प्रावधान
यह निम्नलिखित के लिए कड़े दंड का प्रावधान करता है:
गैर-पंजीकृत ब्लड केंद्र: 3 वर्ष तक का कारावास या 10 लाख रुपये तक का जुर्माना, अथवा दोनों।
असुरक्षित या दूषित रक्त का आधान : 2 से 5 वर्ष का कारावास और न्यूनतम 5 लाख रुपये का जुर्माना।
अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान
स्वैच्छिक और बिना भुगतान रक्तदान को बढ़ावा देना, मौजूदा ब्लड केंद्रों के लिए संक्रमणकालीन सुरक्षा प्रदान करना।
केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान करना। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा लेखापरीक्षा और संसद को वार्षिक प्रतिवेदन के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करना।
विधेयक की आवश्यकता
लोक स्वास्थ्य और रोगी सुरक्षा जोखिमों को कम करना:
उदाहरण: हाल ही में मध्य प्रदेश के सतना जिले में रक्त आधान के माध्यम सेथैलेसीमिया से पीड़ित 6बच्चे ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) से संक्रमित हो गए थे।
विखंडित और अपर्याप्त कानूनी ढांचा: अब तक रक्त आधान सेवाएं औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत परिक्षिप्त प्रावधानों द्वारा शासित थीं, जिससे नियामक अंतराल और विभिन्न राज्यों में असंगत मानक उत्पन्न हो रहे थे।
समान राष्ट्रीय मानकों का अभाव: परीक्षण, भंडारण, घटक पृथक्करण और उन्नत मिलान के लिए मानकीकृत मानदंडों की अनुपस्थिति के कारण क्षेत्रीय असमानताएं उत्पन्न हुईं। साथ ही, नैदानिक परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
अविश्वसनीय रक्त आपूर्ति और अवसंरचना की कमियां: मौसम अनुसार दाता (डोनर) की कमी, असमान इन्वेंटरी प्रबंधन और परिधीय रक्त केंद्रों में उन्नत सुविधाओं (जैसे ल्यूकोरिडक्शन, एलोएंटीबॉडी डिटेक्शन) की कमी ने रक्त तक पहुंच को प्रभावित किया है।
शहरी-ग्रामीण और अंतरराज्यीय असमानता: ब्लड बैंक और भंडारण केंद्र अभी भी मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में संकेंद्रित हैं।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय रक्त आधान विधेयक, 2025 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सहकारी संघवाद, परिधीय रक्त केंद्रों के सुदृढ़ीकरण, सुदृढ़ डिजिटल और हीमोविजिलेंस प्रणालियों के एकीकरण तथा निरंतर वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। यह देशभर में सुरक्षित, न्यायसंगत और विश्वसनीय रक्त आधान सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।
प्राप्तकर्ता और दाता के बीच लाल रक्त कोशिका आधान में अनुकूलता (ABO और Rh प्रणाली)
लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर दो प्रतिजन/एंटीजन, A और B, की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर चार मुख्य रक्त समूह निर्धारित किए जाते हैं।
A और B प्रतिजन के अतिरिक्त, Rh फैक्टर नामक एक प्रोटीन होता है, जो या तो उपस्थित (+) हो सकता है या अनुपस्थित (–)। इस आधार पर 8 सबसे सामान्य रक्त प्रकार (A+, A-, B+, B-, O+, O-, AB+, AB-) बनते हैं।
AB+ रक्त समूह: इसमें A, B और Rh तीनों एंटीजन होते हैं, लेकिन इसमें एंटी-A, एंटी-B या एंटी-Rh प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) नहीं होते हैं। इसी कारण इस समूह के व्यक्ति लाल रक्त कोशिका आधान के लिए "सार्वभौमिक ग्राही" कहलाते हैं।
O- रक्त समूह: इसे लाल रक्त कोशिकाओं के लिए "सार्वभौमिक दाता" माना जाता है क्योंकि इसकी लाल रक्त कोशिकाओं में A, B और Rh (D) प्रतिजन का अभाव होता है। इसका अर्थ है कि यह किसी भी अन्य रक्त समूह के प्राप्तकर्ता में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करेगा।
O- रक्त समूह वाले व्यक्ति को लाल रक्त कोशिकाओं के लिए सार्वभौमिक दाता माना जाता है क्योंकि उनकी लाल रक्त कोशिकाओं में A, B और Rh (D) एंटीजन नहीं होते हैं, जिससे वे किसी भी रक्त समूह के प्राप्तकर्ता को प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न किए बिना रक्त दान कर सकते हैं।
सार्वभौमिक ग्राही (Universal Recipient)
AB+ रक्त समूह वाले व्यक्ति को सार्वभौमिक ग्राही कहा जाता है क्योंकि उनकी लाल रक्त कोशिकाओं में A, B और Rh तीनों एंटीजन होते हैं, और उनमें एंटी-A, एंटी-B या एंटी-Rh एंटीबॉडी नहीं होते हैं, जिससे वे किसी भी रक्त समूह से रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
ABO और Rh प्रणाली
ये लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर पाए जाने वाले एंटीजन (प्रतिजन) के आधार पर रक्त समूहों को वर्गीकृत करने की प्रणाली हैं। ABO प्रणाली में A और B एंटीजन शामिल हैं, जबकि Rh प्रणाली में D एंटीजन (Rh फैक्टर) शामिल है।
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