सुर्ख़ियों में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा पर अपने पिछले निर्णय पर रोक लगा दी।
अरावली मुद्दे की पृष्ठभूमि:
- विशेषज्ञ समिति का गठन (मई 2024): उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा तय करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
- परिभाषा को अपनाया गया (नवंबर 2025): टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाड वाद (1995) में सुनवाई करते समय उच्चतम न्यायालय ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और नई खनन पट्टा (लीज) देने पर रोक लगा दी।
- परिभाषा:
- 'अरावली पहाड़ी': चिन्हित जिलों में 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियां।
- 'अरावली श्रेणी (रेंज): 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित दो या उससे अधिक पहाड़ियाँ।
- उच्चतम न्यायालय ने सरकार को सारंडा खनन योजना की तर्ज पर संधारणीय खनन प्रबंधन योजना बनाने को कहा।
- सरकार द्वारा खनन पर प्रतिबंध (दिसंबर 2025): MoEF&CC ने राज्यों को नया खनन पट्टा देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए। हालांकि, केवल अति-महत्वपूर्ण (क्रिटिकल), रणनीतिक (स्ट्रेटेजिक) और परमाणु खनिजों के मामले में छूट प्रदान की गई।
- न्यायालय द्वारा रोक और पुनरीक्षण (दिसंबर 2025): लोगों के विरोध के बाद उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2025 में जारी अपने निर्देशों पर रोक लगा दी। साथ ही, न्यायालय ने एक उच्च-स्तरीय समिति से नए तरीके से और स्वतंत्र रूप से समीक्षा कराने का प्रस्ताव रखा।
- लोगों के विरोध के कारण: अरावली की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचने का खतरा, मरुस्थलीकरण के विस्तार की आशंका, भौमजल संकट क्योंकि अरावली क्षेत्र भूजल पुनर्भरण का मुख्य क्षेत्र है।
सारंडा वन मामला (2025) और खनन योजना
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अरावली के बारे में
- अरावली विश्व की सबसे पुरानी वलित पर्वतमालाओं में से एक है। यह प्राक्-कैम्ब्रियन काल की है और हिमालय पर्वतमाला के निर्माण से भी पहले अस्तित्व में आ गई थी।
- अवस्थिति: उत्तर–पश्चिम भारत में लगभग 692 किलोमीटर तक दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली हुई है। यह दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक जाती है।
- सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू)
- अरावली से उद्गम होने वाली नदियाँ:
- पश्चिम की ओर बहने वाली: लूनी और, साबरमती।
- पूर्व की ओर बहने वाली: बनास।
- उत्तर की ओर बहने वाली: साहिबी।
अरावली का महत्व
- पारिस्थितिकी और भौगोलिक दृष्टि से महत्व: अरावली भारत की जलवायु, तापमान और मानसून चक्र को संतुलित करने में योगदान देती है। उदाहरण के लिए-यह वायु की दिशा को प्रभावित करती है और मृदा को स्थिर रखती है, जिससे धूल भरी आंधियां कम उत्पन्न होती हैं।
- थार मरुस्थल को पूर्व की ओर सिंधु-गंगा मैदान में विस्तृत होने से रोकने में यह एक प्राकृतिक अवरोधक की तरह कार्य करती है।
- वन्यजीवों के लिए आवागमन गलियारे प्रदान करके जैव-विविधता का संरक्षण करती है।
- यह जलभृत्तों के लिए महत्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण क्षेत्र है। इससे कृषि, मानव बस्तियों और उद्योगों के लिए निरंतर जल उपलब्ध हो पाता है। जैसे: चंबल, साबरमती और लूनी नदियां प्राकृतिक अपवाह बनाए रखने के लिए अरावली पर निर्भर हैं।
- खनन और पत्थर उद्योग: अरावली क्षेत्र में चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, तांबा, जस्ता और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए: खेतड़ी तांबा खदानें।
- सांस्कृतिक महत्व: भील और मीणा जैसी जनजातियों का अरावली से गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध है। मीणा समुदाय की मांडणा कला अरावली की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से प्रेरित है।
- अरावली में कई ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासतें भी हैं। जैसे: दिलवाड़ा जैन मंदिर और कुंभलगढ़ किला। इन्हें रक्षा उद्देश्यों से दुर्गम भूभाग पर बनाया गया।
- ऐतिहासिक महत्व: अरावली क्षेत्र में पाषाण युग (मंगर बानी) से ही मानव बस्तियों की निरंतरता के साक्ष्य मिलते हैं। ताम्र-पाषाण काल (3000–1500 ईसा पूर्व) में यहां आहड़-बनास संस्कृति विकसित हुई।

अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए की गई शुरू की गईं पहलें
- मातृ वन पहल: यह गुरुग्राम में शुरू की गई। इसके तहत अरावली क्षेत्र में 750 एकड़ का शहरी वन विकसित किया जा रहा है। यह 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान का हिस्सा है।
- अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: यह अरावली पर्वतमाला के चारों ओर 5 किलोमीटर का हरित बफर ज़ोन विकसित करने की पहल है। इसका उद्देश्य अरावली पर्वतमाला वाले चार राज्यों में हरियाली बढ़ाना और मरुस्थलीकरण का विस्तार रोकना है।
- राज्य सरकार के प्रयास: हरियाणा सरकार ने 2016 में अरावली के हिस्से मंगर बानी क्षेत्र को 'गैर-निर्माण क्षेत्र' घोषित किया।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ वाद (2002): उच्चतम न्यायालय ने इस वाद के तहत अपने कई निर्णयों में अरावली के महत्व को स्वीकार किया और इसके संरक्षण पर ज़ोर दिया।
अरावली बचाओ आंदोलन: एक सामाजिक आंदोलन
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निष्कर्ष
अरावली पर्वतमाला का संधारणीय तरीके से प्रबंधन तभी संभव है, जब इसे एकीकृत और अविरल भूवैज्ञानिक कटक (रिज) के रूप में देखा जाए। इसके लिए पारदर्शी डेटा, सभी हितधारकों से परामर्श, और संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर सख्त प्रतिबंध का कड़ाई से पालन आवश्यक है।