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अरावली (ARAVALLIS)

28 Jan 2026
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

उच्चतम न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा पर अपने पिछले निर्णय पर रोक लगा दी।

अरावली मुद्दे की पृष्ठभूमि: 

  • विशेषज्ञ समिति का गठन (मई 2024): उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा तय करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
  • परिभाषा को अपनाया गया (नवंबर 2025): टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाड वाद (1995) में सुनवाई करते समय उच्चतम न्यायालय ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और नई खनन पट्टा (लीज) देने पर रोक लगा दी।
  • परिभाषा: 
    • 'अरावली पहाड़ी': चिन्हित जिलों में 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियां
    • 'अरावली श्रेणी (रेंज)500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित दो या उससे अधिक पहाड़ियाँ।
    • उच्चतम न्यायालय ने सरकार को सारंडा खनन योजना की तर्ज पर संधारणीय खनन प्रबंधन योजना बनाने को कहा।
  • सरकार द्वारा खनन पर प्रतिबंध (दिसंबर 2025): MoEF&CC ने राज्यों को नया खनन पट्टा देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए। हालांकि, केवल अति-महत्वपूर्ण (क्रिटिकल), रणनीतिक (स्ट्रेटेजिक) और परमाणु खनिजों के मामले में छूट प्रदान की गई। 
  • न्यायालय द्वारा रोक और पुनरीक्षण (दिसंबर 2025): लोगों के विरोध के बाद उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2025 में जारी अपने निर्देशों पर रोक लगा दी। साथ ही, न्यायालय ने एक उच्च-स्तरीय समिति से नए तरीके से और स्वतंत्र रूप से समीक्षा कराने का प्रस्ताव रखा।
  • लोगों के विरोध के कारण: अरावली की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचने का खतरा, मरुस्थलीकरण के विस्तार की आशंका, भौमजल संकट क्योंकि अरावली क्षेत्र भूजल पुनर्भरण का मुख्य क्षेत्र है।  

सारंडा वन मामला (2025) और खनन योजना

  • उच्चतम न्यायालय ने झारखंड सरकार को सारंडा वन को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का आदेश दिया।
  • न्यायालय ने कहा कि पूरी तरह खनन पर रोक से अवैध खनन बढ़ सकता है। इसलिए भू-संदर्भ (Geo-referenced) आधारित पारिस्थितिकी के आकलन के आधार पर खनन योजना बनाने को कहा गया।
  • क्षेत्र को 'अनुमत क्षेत्र (गो ज़ोन)" और "निषिद्ध क्षेत्र (नो-गो जोन)" में बांटने का निर्देश दिया गया।
  • यह मामला दर्शाता है कि उच्चतम न्यायालय पारिस्थितिकी के संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।

 

 

अरावली के बारे में

  • अरावली विश्व की सबसे पुरानी वलित पर्वतमालाओं में से एक है। यह प्राक्-कैम्ब्रियन काल की है और हिमालय पर्वतमाला के निर्माण से भी पहले अस्तित्व में आ गई थी।
  • अवस्थिति: उत्तर–पश्चिम भारत में लगभग 692 किलोमीटर तक दक्षिण-पश्चिम दिशा में  फैली हुई है। यह दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक जाती है। 
  • सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू) 
  • अरावली से उद्गम होने वाली नदियाँ: 
    • पश्चिम की ओर बहने वाली: लूनी और, साबरमती।  
    • पूर्व की ओर बहने वाली: बनास।  
    • उत्तर की ओर बहने वाली: साहिबी। 

अरावली का महत्व

  • पारिस्थितिकी और भौगोलिक दृष्टि से महत्व: अरावली भारत की जलवायु, तापमान और मानसून चक्र को संतुलित करने में योगदान देती है। उदाहरण के लिए-यह वायु की दिशा को प्रभावित करती है और मृदा को स्थिर रखती है, जिससे धूल भरी आंधियां कम उत्पन्न होती हैं।
    • थार मरुस्थल को पूर्व की ओर सिंधु-गंगा मैदान में विस्तृत होने से रोकने में यह एक प्राकृतिक अवरोधक की तरह कार्य करती है।
    • वन्यजीवों के लिए आवागमन गलियारे प्रदान करके जैव-विविधता का संरक्षण करती है।
    • यह जलभृत्तों के लिए महत्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण क्षेत्र है। इससे कृषि, मानव बस्तियों और उद्योगों के लिए निरंतर जल उपलब्ध हो पाता है। जैसे: चंबल, साबरमती और लूनी नदियां प्राकृतिक अपवाह बनाए रखने के लिए अरावली पर निर्भर हैं।
  • खनन और पत्थर उद्योग: अरावली क्षेत्र में चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, तांबा, जस्ता और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए: खेतड़ी तांबा खदानें।
  • सांस्कृतिक महत्व: भील और मीणा जैसी जनजातियों का अरावली से गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध है। मीणा समुदाय की मांडणा कला अरावली की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से प्रेरित है।
    • अरावली में कई ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासतें भी हैं। जैसे: दिलवाड़ा जैन मंदिर और कुंभलगढ़ किला। इन्हें रक्षा उद्देश्यों से दुर्गम भूभाग पर बनाया गया।
  • ऐतिहासिक महत्व: अरावली क्षेत्र में पाषाण युग  (मंगर बानी) से ही मानव बस्तियों की निरंतरता के साक्ष्य मिलते हैं। ताम्र-पाषाण काल (3000–1500 ईसा पूर्व) में यहां आहड़-बनास संस्कृति विकसित हुई। 

अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए की गई शुरू की गईं पहलें

  • मातृ वन पहल: यह गुरुग्राम में शुरू की गई। इसके तहत अरावली क्षेत्र में 750 एकड़ का शहरी वन विकसित किया जा रहा है। यह 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान का हिस्सा है।
  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: यह अरावली पर्वतमाला के चारों ओर 5 किलोमीटर का हरित बफर ज़ोन विकसित करने की पहल है। इसका उद्देश्य अरावली पर्वतमाला वाले चार राज्यों में हरियाली बढ़ाना और मरुस्थलीकरण का विस्तार रोकना है।
  • राज्य सरकार के प्रयास: हरियाणा सरकार ने 2016 में अरावली के हिस्से मंगर बानी क्षेत्र को 'गैर-निर्माण क्षेत्र' घोषित किया। 
  • एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ वाद (2002): उच्चतम न्यायालय ने इस वाद के तहत अपने कई निर्णयों में अरावली के महत्व को स्वीकार किया और इसके संरक्षण पर ज़ोर दिया। 

अरावली बचाओ आंदोलन: एक सामाजिक आंदोलन 

  • परिचय: अरावली बचाओ आंदोलन जमीनी पर्यावरणीय आंदोलन है। यह अवैध खनन, वनों की कटाई और रियल एस्टेट विकास के खिलाफ शुरू हुआ।
  • इतिहास: राजस्थान के सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के आसपास चूना पत्थर के खनन से भौमजल स्तर गिरने लगा।
  • कार्यवाही: तरुण भारत संघ नामक एनजीओ ने, राजेन्द्र सिंह (भारत का वाटरमैन ) के नेतृत्व में, 1988 में अरावली क्षेत्र में लगभग 28,000 वैध और अवैध खदानों को बंद कराने के प्रयास शुरू किए।
  • परिणाम: 1990 में उच्चतम न्यायालय ने सरिस्का क्षेत्र में खनन पर रोक लगा दी।
  • आंदोलन की विशेषताएं:
    • व्यापक जनभागीदारी: देशज और जनजातीय समुदाय (भील, मीणा, गरासिया); शहरी नागरिक, विधि विशेषज्ञ और वैज्ञानिक। 
    • अपनाए गए तरीके: कानूनी सक्रियता-इसके तहत एहतियाती सिद्धांतप्रदूषक द्वारा भुगतान सिद्धांत को लागू करने का आह्वान किया गया। 
    • जन-जागरूकता अभियान और रैलियां; सोशल मीडिया अभियान (#SaveAravall)i; वैज्ञानिक तरीके से लेखा-परीक्षा और स्थानिक स्थिति का विश्लेषण। 
    • संकल्पनाएं: पर्यावरणवाद, यानी मनुष्य की यह जिम्मेदारी है कि वह प्रकृति का सम्मान करे, उसकी रक्षा करे और उसे मानव-जनित खतरों से बचाए।
      • अरावली को "एकल जीवंत पारितंत्र" के रूप में देखना,
      • लोक न्यास का सिद्धांत: राज्य प्राकृतिक संसाधनों का मालिक नहीं है, बल्कि जनता और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षक मात्र है।
      • पीढ़ीगत समानता: भविष्य की पीढ़ियों को मरुस्थलीकरण और पारिस्थितिकी के विनाश से बचाने के लिए अरावली को "पृथ्वी की विरासत" के रूप में संरक्षित करना। 

 

निष्कर्ष 

अरावली पर्वतमाला का संधारणीय तरीके से प्रबंधन तभी संभव है, जब इसे एकीकृत और अविरल भूवैज्ञानिक कटक (रिज) के रूप में देखा जाए। इसके लिए पारदर्शी डेटा, सभी हितधारकों से परामर्श, और संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर सख्त प्रतिबंध का कड़ाई से पालन आवश्यक है।

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भूवैज्ञानिक कटक (रिज)

एक लंबी, संकीर्ण उच्चभूमि जो आमतौर पर पहाड़ी या पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

पीढ़ीगत समानता (Intergenerational Equity)

यह सुनिश्चित करना कि वर्तमान पीढ़ी के कार्य भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता न करें, विशेषकर प्राकृतिक संसाधनों के संबंध में।

लोक न्यास का सिद्धांत (Public Trust Doctrine)

यह सिद्धांत मानता है कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जल, हवा, वन) का मालिक नहीं है, बल्कि जनता और भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनका संरक्षक (trustee) है।

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