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भारत में बाल विवाह (Child Marriage in India)

28 Jan 2026
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

केंद्र सरकार ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान की पहली वर्षगांठ के अवसर पर देश को बाल विवाह मुक्त करने के उद्देश्य से 100-दिवसीय जागरूकता अभियान की शुरुआत की है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • बाल विवाह मुक्त भारत अभियान महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) द्वारा शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य 2026 तक बाल विवाह की प्रचलन दर में 10% की कमी लाना तथा वर्ष 2030 तक भारत को बाल विवाह मुक्त बनाना है।
  • यह अभियान वर्ष 2030 तक बाल विवाह को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

बाल विवाह क्या है?

  • बाल विवाह (निषेध) अधिनियम के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु की लड़की तथा 21 वर्ष से कम आयु के लड़के के बीच किया गया विवाह बाल विवाह कहलाता है।
  • बाल विवाह महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW) तथा बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (CRC) के महत्वपूर्ण प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
    • यह विशेष रूप से ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में निर्धनता, लैंगिक असमानता और स्वास्थ्य जोखिमों के दुष्चक्र को बनाए रखता है।

भारत में बाल विवाह की स्थिति (NFHS-5)

  • समग्र कमी: बाल विवाह की दर 47.4% (2005-06) से घटकर 23.3% (2019-21) हो गई है। यह पिछले 15 वर्षों में हुई उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है।
  • धीमी प्रगति: 2015-16 और 2019-21 के बीच, बाल विवाह में गिरावट की दर केवल 3.5 प्रतिशत रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त करना अब भी चुनौतीपूर्ण है।
  • क्षेत्रीय असमानताएं: 18–29 वर्ष की महिलाओं में बाल विवाह की सर्वाधिक दर पश्चिम बंगाल (42%), बिहार (40%) और त्रिपुरा (39%) में पाई गई है।
    • लक्षद्वीप (4%), जम्मू और कश्मीर (6%), लद्दाख (6%), हिमाचल प्रदेश, गोवा और नागालैंड (प्रत्येक 7%) में महिलाओं में बाल विवाह की सबसे कम हैं।

भारत में बाल विवाह के प्रचलन के कारण

  • विधिक और नीतिगत कारण:
    • मौजूदा विधियों का अनुचित कार्यान्वयन: PCMA और POCSO जैसे विधिक  प्रावधानों के बावजूद, प्रवर्तन कमजोर बना हुआ है, जिससे विधियां काफी हद तक अप्रभावी हो जाते हैं।
    • जागरूकता की कमी और अपर्याप्त निगरानी: विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बाल विवाह की समस्या बनी हुई है। उदाहरण, बाल विवाह के मामलों में सजा और रिपोर्टिंग की दर अत्यंत कम है।
    • शिक्षा की कमी: अशिक्षित लड़कियों में से 48% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है, जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों में यह दर मात्र 4% है। इस प्रकार शिक्षा एक प्रमुख सुरक्षात्मक कारक है।
  • आर्थिक कारण:
    • आर्थिक असमानता: सबसे कम संपत्ति वाले वर्ग की 40% लड़कियों का बाल विवाह हुआ है, जबकि सबसे अधिक संपत्ति वाले वर्ग की केवल 8% लड़कियों का ही बाल विवाह हुआ है। यह आंकड़ा गरीबी की भूमिका को उजागर करता है।
    • आर्थिक लेन–देन के रूप में विवाह: कई बार कम आयु की लड़कियों को ऋण चुकाने, धन संरक्षित करने या आर्थिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए "बेच" दिया जाता है।
    • केवल गरीब परिवारों तक सीमित नहीं: धनी परिवार भी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए कभी-कभी लड़कियों का विवाह कम आयु में कर देते हैं।
  • सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारण
    • सामाजिक पिछड़ापन: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) समुदायों में बाल विवाह की अधिक व्यापकता पाई जाती है, यहां 26% लड़कियों का विवाह निर्धारित विधिक आयु से पहले हो जाता है। 
    • परिवार के सम्मान की रक्षा: कौमार्य, पारिवारिक प्रतिष्ठा और नैतिक मान्यताओं पर अत्यधिक बल, कम आयु में विवाह को बढ़ावा देता है।
    • पारंपरिक और पितृसत्तात्मक प्रथाएं: सांस्कृतिक मान्यताएं अधिक आयु के पति को 'संरक्षक' मानती हैं और अविवाहित लड़कियों को बोझ के रूप में देखती हैं।
    • सामाजिक दबाव और लैंगिक मानदंड: पुरुषों पर महिलाओं की निर्भरता, शीघ्र मातृत्व की अपेक्षा और अधिक बच्चों को समृद्धि का प्रतीक मानने की सामाजिक धारणाएं बाल विवाह को बढ़ावा देती हैं।
    • क्षेत्रीय और सामुदायिक प्रथाएं: कुछ समुदायों में सख्त सांस्कृतिक मानदंडों के कारण, कानून या आर्थिक स्थिति की परवाह न करते हुए यह प्रथा जारी है।
  • राज्यवार अंतर: आठ भारतीय राज्यों में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा शीर्ष पर हैं, जहां 20-24 वर्ष की आयु की 40% से अधिक महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो गया था।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • बाल-विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006: यह 18 वर्ष से कम आयु की लड़कियों और 21 वर्ष से कम आयु के लड़कों के विवाह पर रोक लगाता है। अधिनियम की धारा 16 राज्य सरकार को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) नियुक्त करने का अधिकार है।
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012: यह बालकों को लैंगिक शोषण से बचाकर बाल विवाह को रोकने में मदद करता है।
  • किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015: इसमें उन बालकों की देखभाल और संरक्षण के प्रावधान हैं, जिन पर कम आयु में विवाह का खतरा है; यह कार्य बाल कल्याण समितियों के माध्यम से किया जाता है।
  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना (2015): यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जा रही है। इसका उद्देश्य लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ना और पुत्र-केंद्रित रीति-रिवाजों को चुनौती देना है।
  • राज्य सरकार की पहल:
    • पश्चिम बंगाल की कन्याश्री योजना: 13–18 वर्ष आयु की बालिकाओं को वार्षिक ₹1,000 की सहायता तथा 18–19 वर्ष की आयु की बालिकाओं को निरंतर शिक्षा और विवाह में विलंब की शर्त पर एकमुश्त ₹25,000 की अनुदान राशि प्रदान की जाती है।
    • सामुदायिक सहभागिता और जागरूकता: सरकार, समुदाय की निरंतर भागीदारी और व्यापक जागरूकता अभियानों के परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ का बलोद जिला भारत का पहला बाल विवाह मुक्त जिला बन गया है।
    • पूर्वोत्तर जनजातियां: देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में यहाँ विवाह की औसत आयु अधिक है। जैसे मणिपुर की माओ, पाओमई नागा और तांगखुल नागा जनजातियां।

आगे की राह

  • विधायी सुधार: सभी धर्मों, क्षेत्रों आदि से संबंधित महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु के लिए एक समान कानून (Uniform Code) लागू किया जाना चाहिए।
    • डेटा का नियमित संकलन और संग्रह: बाल विवाह से संबंधित आंकड़ों का निरंतर और व्यवस्थित संग्रह किया जाना चाहिए, ताकि नीति-निर्माण और जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता मिल सके, क्योंकि ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग प्रायः कम होती है।
  • प्रवर्तन: सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम भारत संघ मामले में दिए गए उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को जिला/उप-जिला स्तर पर पूर्णकालिक समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारी (CMPOs) नियुक्त करने होंगे।
    • समन्वय, निगरानी और शिकायत निवारण के लिए विशेष बाल विवाह निषेध इकाइयां स्थापित की जानी चाहिए।
    • अक्षय तृतीया निर्देश: यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) द्वारा जारी किया गया है। इसका उद्देश्य सामूहिक विवाहों के लिए सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील उच्च जोखिम वाली अवधियों को लक्षित करना था।
  • रोकथाम: स्कूलों, आंगनबाड़ियों, गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक नेताओं को शामिल करते हुए अनिवार्य बहुक्षेत्रीय जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
    • पुलिस, न्यायपालिका, शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
    • जोखिमग्रस्त क्षेत्रों के डेटाबेस का रखरखाव किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

बाल विवाह की समस्या से निपटने के लिए बालक के पूर्ण जीवन-चक्र को ध्यान में रखते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके लिए विशेष रूप से उन हानिकारक सामाजिक मानदंडों का समाधान किया जाना चाहिए, जो भारत में बाल विवाह की उच्च दर के प्रमुख कारण हैं।

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