सुर्ख़ियों में क्यों?
जुलाई 2025 में प्रधानमंत्री की नामीबिया और घाना तथा दिसंबर 2025 में इथियोपिया की यात्राओं ने अफ्रीकी क्षेत्र के देशों के साथ भारत के संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया।
यात्राओं के दौरान प्रमुख घटनाक्रम
- अदीस अबाबा यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री को इथियोपिया के सर्वोच्च सम्मान 'ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया' से सम्मानित किया गया।
- भारत और इथियोपिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को 'रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक विस्तारित किया है।
- इथियोपिया के विदेश मंत्रालय में एक डेटा सेंटर स्थापित करने और G20 कॉमन फ्रेमवर्क के तहत ऋण पुनर्गठन के लिए समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए।
भारत-अफ्रीका संबंधों का विकास
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भारत-अफ्रीका संबंधों का महत्व
भारत के लिए
- रणनीतिक और भू-राजनीतिक: अफ्रीका 'ग्लोबल साउथ' की चिंताओं को मुखर करने, संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधारों का समर्थन करने और शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने में भारत का स्वाभाविक भागीदार है।
- उदाहरण के लिए: अफ्रीकी संघ (AU) को G20 की स्थायी सदस्यता मिलना, ग्लोबल साउथ की आवाज़ के सशक्त प्रतिनिधित्व को दर्शाता है।
- रक्षा: भारत हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) और हिंद महासागर आयोग (IOC) जैसे क्षेत्रीय संगठनों तथा मिलन (MILAN) तथा कटलैस एक्सप्रेस जैसे बहुराष्ट्रीय समुद्री अभ्यासों में भागीदारी के माध्यम से सहयोग को सुदृढ़ कर रहा है।
- भारतीय नौसेना ने हाल ही में अफ्रीकी देशों के साथ एक व्यापक बहुपक्षीय समुद्री सहभागिता अभ्यास 'अफ्रीका इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट' (AIKEYME) शुरू किया है।
- आर्थिक: अफ्रीका एक युवा और तेजी से शहरीकरण वाला बाजार है। साथ ही, यह भारत के विनिर्माण और हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण खनिजों (कोबाल्ट, मैंगनीज, दुर्लभ भू तत्व) का भंडार है।
- दुनिया के कुल कोबाल्ट भंडार का 48.1% और मैंगनीज भंडार का 47.7% अफ्रीका में है।
- ऊर्जा सुरक्षा: अफ्रीका में नवीकरणीय ऊर्जा की महत्वपूर्ण क्षमता है, जिसमें 10 टेरावॉट (TW) सौर क्षमता, 100 GW पवन क्षमता और 15 GW भू-तापीय ऊर्जा शामिल है।
- भारत द्वारा सह-स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) पायलट परियोजनाओं और वित्त-पोषण तंत्र (जैसे ग्लोबल सोलर फैसिलिटी, STAR-C पहल, वर्चुअल ग्रीन हाइड्रोजन इनोवेशन सेंटर आदि) के माध्यम से अफ्रीका में मिनी-ग्रिड और वितरित सौर ऊर्जा को लक्षित करता है।
अफ्रीका के लिए
- व्यापार: वर्ष 2024-25 में भारत-अफ्रीका व्यापार 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया। भारत, यूरोपीय संघ (EU) और चीन के बाद अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।
- व्यापार परिदृश्य: भारत की ओर से मुख्य रूप से खनिज ईंधन, खाद्य उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स आदि शामिल हैं; जबकि अफ्रीका की ओर से भारत को कच्चे तेल, हीरे, तांबा आदि का निर्यात किया जाता है।
- भारत अफ्रीका में शीर्ष पांच निवेशकों में से एक है, जो घनिष्ठ आर्थिक संबंधों को दर्शाता है।
- अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियान (PKOs): स्वतंत्रता के बाद से 'ब्लू हेलमेट' (शांति सैनिकों) में शामिल होने वाले 2,00,000 सैनिकों और पुलिस अधिकारियों के साथ, भारत PKO में अफ्रीका का चौथा सबसे बड़ा सैनिक योगदानकर्ता है।
- प्रवासी: 30 लाख से अधिक मजबूत भारतीय प्रवासी समुदाय अफ्रीका के आर्थिक विकास में मदद कर रहा है।
- 1830 के दशक में गुलामी के उन्मूलन के बाद, ब्रिटिश सरकार ने मॉरीशस और नेटाल में चीनी बागानों और पूर्वी अफ्रीका में रेलवे परियोजनाओं पर काम करने के लिए 10 लाख से अधिक भारतीयों को 'गिरमिटिया' (अनुबंधित) श्रमिकों के रूप में अफ्रीका पहुँचाया, जिससे एक मजबूत प्रवासी आधार तैयार हुआ।
- जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण: "सोलर ममास" (सौर माताएं) जैसी पहल ग्रामीण अफ्रीकी समुदायों की महिलाओं को भारत में सौर इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षित करती है।
- गैर-आदेशात्मक सहायता: भारत का विकास सहयोग मांग-आधारित है और शर्तों से मुक्त है। यह "कम्पाला सिद्धांतों" के अनुरूप है, जो यह स्पष्ट करते हैं कि सहयोग अफ्रीकी प्राथमिकताओं द्वारा निर्देशित होगा।
- कम्पाला सिद्धांत (2018): भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत-अफ्रीका साझेदारी के लिए 10 मार्गदर्शक सिद्धांत रेखांकित किए हैं, जिनमें समान रूप से साथ मिलकर विकास करना, स्थानीय साझेदारी आदि शामिल हैं।
- सैन्य प्रशिक्षण और हार्डवेयर: भारत सेशेल्स, मॉरीशस और मोजाम्बिक जैसे अफ्रीकी रक्षा बलों को लागत प्रभावी सैन्य हार्डवेयर (इंटरसेप्टर, बख्तरबंद वाहन, हेलीकॉप्टर) और प्रशिक्षण प्रदान करता है।
भारत-अफ्रीका संबंधों के उभरते पहलू: डिजिटल साझेदारी
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भारत-अफ्रीका संबंधों में बाधाएं
- चीन कारक: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) तथा व्यापक निवेशों के माध्यम से अफ्रीका में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के हितों के लिए चुनौती प्रस्तुत करता है, क्योंकि भारत चीन की गति, पैमाने और वित्तीय क्षमता की बराबरी करने में कठिनाई का अनुभव करता है।
- व्यापार एकाग्रता का जोखिम: भारत का निर्यात दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, मिस्र और केन्या जैसी कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अत्यधिक संकेंद्रित है। महाद्वीप को होने वाले कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इन्हीं देशों से आता है।
- परियोजना निष्पादन और वितरण में देरी: भारत द्वारा वित्तपोषित अनेक अवसंरचना एवं क्षमता-निर्माण परियोजनाएँ प्रक्रियागत अवरोधों, वित्तीय वितरण में विलंब तथा अफ्रीका के दूरस्थ क्षेत्रों में रसद संबंधी चुनौतियों के कारण समय पर पूर्ण नहीं हो पाई है।
- वैश्विक शासन में कम प्रतिनिधित्व: अफ्रीकी देशों के पास अभी भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य वैश्विक निर्णय लेने वाले मंचों में स्थायी प्रतिनिधित्व का अभाव है।
- सुरक्षा और राजनीतिक अस्थिरता: अफ्रीका के कुछ हिस्सों, विशेष रूप से साहेल और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में राजनीतिक अशांति, संघर्ष और आतंकवाद, भारतीय श्रमिकों और निवेशों के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताएं उत्पन्न करते हैं।
- भू-राजनीतिक और रणनीतिक विरोधाभास: भारत की नीति में एक "रणनीतिक विरोधाभास" दिखाई देता है, जहाँ दक्षिण-दक्षिण सहयोग की परोपकारी बयानबाजी, शक्ति के अधिकतम विस्तार और संसाधन निष्कर्षण के प्रयासों के साथ टकराती है।
अफ्रीका के लिए भारतीय पहलें
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आगे की राह
- आर्थिक एकीकरण: भारत को अपनी व्यापार रणनीति को अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA) के अनुरूप बनाते हुए क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं को समर्थन देना चाहिए।
- व्यापार विविधीकरण: भारत को अपने पारंपरिक निर्यात बाजारों (दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, मिस्र) से आगे बढ़कर अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों में भी व्यापारिक विस्तार करना चाहिए, ताकि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक दोगुना करने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
- "मिनरल-टू-मार्केट" रणनीति: भारत को केवल कच्चे अयस्क के दोहन के बजाय अफ्रीका में स्थानीय प्रसंस्करण में निवेश करना चाहिए, जिससे अफ्रीकी देश मूल्य संवर्धन बनाए रख सकें और भारत को परिष्कृत कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
- नियमित शिखर सम्मेलन: भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन (IAFS), जो 2015 के बाद से आयोजित नहीं हुआ है (2020 का सम्मेलन स्थगित हो गया था), उसे नियमित रूप से, आदर्श रूप से प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार आयोजित करने की आवश्यकता है।
- त्रिकोणीय सहयोग: भारत को जापान (एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे तीसरे पक्षों के साथ साझेदारी का लाभ उठाना चाहिए ताकि अफ्रीकी परियोजनाओं के लिए संसाधनों का संचयन किया जा सके और चीन की तुलना में वित्तीय सीमाओं को कम किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत-अफ्रीका साझेदारी विश्वास, क्षमता निर्माण और साझा विकास पर आधारित है, जो दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से समावेशी विकास को बढ़ावा देती है। जैसा कि एस. जयशंकर ने कहा है: "अफ्रीका के साथ हमारी साझेदारी केवल रणनीतिक चिंताओं और आर्थिक लाभों तक सीमित नहीं है। यह उन भावनात्मक संबंधों और उस एकजुटता पर आधारित है, जिन्हें हम साझा करते हैं।"