सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, ऑस्ट्रेलिया ऑनलाइन सेफ्टी अमेंडमेंट (सोशल मीडिया मिनिमम एज) एक्ट 2024 के तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए देश भर में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू करने वाला पहला देश बन गया है।
अन्य संबंधित तथ्य
- प्रारंभिक रूप से यह प्रतिबंध 10 प्लेटफॉर्म्स पर लागू होगा, इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, थ्रेड्स, टिकटॉक, एक्स, यूट्यूब, रेडिट और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म किक और ट्विच शामिल हैं।
- आयु-प्रतिबंधित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म (ARSMP) ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सेवा मंच होंगे, जो दो या अधिक अंतिम उपयोगकर्ताओं के बीच ऑनलाइन सामाजिक संपर्क की सुविधा देते हैं। साथ ही इन प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिग उपयोगकर्ताओं को खाता बनाने या उसे बनाए रखने से रोकना अनिवार्य है।
- कंपनियों की यह जिम्मेदारी होगी कि निर्धारित न्यूनतम आयु से कम आयु के बच्चे उनके प्लेटफॉर्म तक न पहुंच सकें।
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की आवश्यकता
- संज्ञानात्मक विकास: सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों की एकाग्रता, सीखने और जानकारी को याद रखने की क्षमता को कमजोर करता है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित होता है।
- मानसिक स्वास्थ्य: सोशल मीडिया की लत से बच्चों में चिंता, अवसाद, आत्मसम्मान और भावनात्मक आत्म-प्रभावकारिता में कमी तथा ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार (ADHD) जो एक तंत्रिका-विकास संबंधी विकार है, के मामले बढ़ जाते हैं।
- शारीरिक स्वास्थ्य: कुछ प्रकार की सामग्री बच्चों में निष्क्रिय जीवनशैली, खान-पान संबंधी विकार और अवास्तविक सौंदर्य मानकों को बढ़ावा देती है, जिससे नींद के पैटर्न में बाधा एवं मोटापा जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- सामाजिक विकास: वर्चुअल प्लेटफॉर्म के अधिक उपयोग से आमने-सामने की बातचीत कम हो जाती है, जिससे सामाजिक अलगाव, पारिवारिक संबंधों में तनाव और भावनात्मक नियंत्रण की कमी देखी जाती है।
- ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी चिंताएं: सोशल मीडिया बच्चों को साइबर-बुलिंग, शोषण, हानिकारक सामग्री और ऑनलाइन यौन अपराधियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है।
- खतरनाक वायरल ट्रेंड: सोशल मीडिया पर "ब्लैकआउट चैलेंज" (सांस रोकना) और "डेवियस लिक" (चोरी करना) जैसे जोखिमपूर्ण ट्रेंड्स बच्चों और किशोरों में चोट, विधिक समस्या और अनुशासनात्मक कार्रवाई का कारण बन सकते हैं।
- अभिभावकीय निगरानी में कमी: शहरी क्षेत्रों में माता-पिता दोनों के कामकाजी होने, समय की कमी और सीमित निगरानी के कारण बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ गया है, इसे प्रायः"आइपैड किड" की प्रवृत्ति कहा जाता है।
- एल्गोरिदमिक नियंत्रण: उपयोगकर्ता की भागीदारी बढ़ाने वाले एल्गोरिदम बच्चों के लिए व्यक्तिगत कंटेंट दिखाते हैं, जिससे वे आसानी से अलग नहीं हो पाते और अत्यधिक उपयोग का खतरा बढ़ जाता है।
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से जुड़ी चिंताएं
- आयु सत्यापन और निजता का जोखिम: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने उपयोगकर्ताओं की आयु सत्यापित करने के विश्वसनीय तरीकों को स्पष्ट नहीं किया है। इससे कम आयु के बच्चों द्वारा वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) जैसे उपायों के माध्यम से नियमों को दरकिनार करने की आशंका बनी रहती है।
- इसके अलावा,सरकार द्वारा जारी पहचान पत्र, चेहरे या आवाज की पहचान, अथवा आयु अनुमान (age inference) जैसे प्रस्तावित सत्यापन उपकरण उपयोगकर्ता की निजता और डेटा संरक्षण के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।
- अत्यधिक विनियमन का जोखिम: रोब्लॉक्स एवं डिस्कोर्ड जैसे गेमिंग और संचार प्लेटफॉर्म्स को लक्षित किए जाने की आशंका है, जिससे अत्यधिक प्रतिबंधात्मक उपाय लागू हो सकते हैं और वैध उपयोगकर्ता प्रभावित हो सकते हैं।
- असुरक्षित ऑनलाइन साइट्स की ओर झुकाव: सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को लागू करना कठिन है और इससे बच्चे इंटरनेट के अधिक असुरक्षित हिस्सों, जैसे डार्क वेब, की ओर जा सकते हैं।
- मानवाधिकारों का उल्लंघन और बहिष्करण: सोशल मीडिया पर प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना तक पहुँच को सीमित कर सकता है। इससे LGBTQIA+ युवाओं जैसे संवेदनशील समूह, जो ऑनलाइन समुदायों पर निर्भर रहते हैं, अलग-थलग पड़ सकते हैं।
- डिजिटल कौशल विकास में बाधा: यह सोशल मीडिया के उपयोग के सकारात्मक प्रभावों जैसे कि रचनात्मक अभिव्यक्ति, शैक्षिक सामग्री के माध्यम से सहयोगात्मक शिक्षण, रुचि-आधारित नेटवर्किंग आदि को भी सीमित कर सकता है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा हेतु भारत की पहल
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आगे की राह
- बाल-केंद्रित डिजिटल शासन: सरकारों, विनियामकों, तकनीकी कंपनियों और अभिभावकों को मिलकर सुरक्षित, समावेशी डिजिटल वातावरण निर्मित करना चाहिए, बाल सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसे मंचों को पुनः डिजाइन करना चाहिए। साथ ही आयु-उपयुक्त डिजाइन, डिफ़ॉल्ट रूप से गोपनीयता और एल्गोरिदम जवाबदेही जैसे सुरक्षा उपायों को लागू करना चाहिए।
- उदाहरण के लिए, यूके आयु-उपयुक्त डिजाइन संहिता।
- शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ करना: चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 को सशक्त बनाना, राज्य पुलिस में तकनीकी रूप से प्रशिक्षित साइबर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करना, और बच्चों के लिए ऑनलाइन खतरों की त्वरित रिपोर्टिंग और प्रवर्तन के लिए POCSO ई-बॉक्स जैसे पैनिक-बटन उपकरण विकसित करना।
- डिजिटल कौशल और शिक्षा में सुधार: बच्चों और अभिभावकों को जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार, डिजिटल साक्षरता और आत्म-नियमन के बारे में शिक्षित करना।
- उदाहरण के लिए, केरल के डिजिटल डी-एडिक्शन (D-DAD) केंद्र डिजिटल लत से जूझ रहे बच्चों को निःशुल्क सहायता प्रदान करते हैं।
- जागरूकता: निपुण भारत, डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के तहत, स्कूलों और समुदायों में चलाए जाने वाले डिजिटल साक्षरता अभियान बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को ऑनलाइन जोखिमों को पहचानने और कम करने के लिए सशक्त बनाते हैं।
- अभिभावकीय सहभागिता और नियंत्रण: माता-पिता को बच्चों के साथ मिलकर सोशल मीडिया अकाउंट बनाने चाहिए ताकि मजबूत गोपनीयता सेटिंग्स, पासवर्ड सुनिश्चित किए जा सकें और गूगल फैमिली लिंक जैसे स्क्रीन-टाइम प्रबंधन टूल का उपयोग करके सीमाएं निर्धारित की जा सकें एवं विभिन्न उपकरणों पर डिजिटल आदतों की निगरानी की जा सके।
- तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही: प्रतिबंध लगाने के बजाय, तकनीकी कंपनियों को बच्चों के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण बनाने हेतु जवाबदेह ठहराया जा सकता है। मेटा जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आयु सीमा (13+) निर्धारित करते हैं।
निष्कर्ष
अनियंत्रित सोशल मीडिया से बच्चों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। आगे की राह एक संतुलित दृष्टिकोण में निहित है, जिसमें बाल-केंद्रित डिजिटल प्रशासन, सशक्त विनियामक निरीक्षण, अभिभावकीय सहभागिता और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही शामिल हो। आयु-अनुकूल डिज़ाइन, डिजिटल साक्षरता और सुरक्षित ऑनलाइन माहौल को प्राथमिकता देकर हम बच्चों को जोखिमों से बचाते हुए डिजिटल विश्व के सकारात्मक और सशक्त पहलुओं से भी जोड़ सकते हैं।