सुर्ख़ियों में क्यों?
भारत ने जैविक हथियार अभिसमय (BWC) के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में नई दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी की। इस सम्मेलन में "वैश्विक दक्षिण के लिए जैव-सुरक्षा को मजबूत करने" पर ध्यान केंद्रित किया गया।
अन्य संबंधित तथ्य
- भारत ने उभरते जैविक खतरों से निपटने के लिए क्षमता निर्माण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता, विशेष रूप से जैविक घटनाओं के दौरान विश्वसनीय सहायता सुनिश्चित करने पर बल दिया।
- सम्मेलन में तेजी से होते तकनीकी और भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच BWC को और अधिक मजबूत करने की तात्कालिकता पर बल दिया गया ताकि यह अपने उद्देश्यों के लिए उपयुक्त बना रहे।
जैविक हथियार अभिसमय (BWC) के बारे में
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जैव-सुरक्षा के बारे में
- परिभाषा: जैव-सुरक्षा से तात्पर्य उन प्रथाओं और प्रणालियों के समूह से है जिन्हें जैविक एजेंटों, विषाक्त पदार्थों या प्रौद्योगिकियों के जानबूझकर किए जाने वाले दुरुपयोग को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है।
- दायरा: इसमें खाद्य सुरक्षा, ज़ूनोज़ से सुरक्षा, आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रबंधन और जीवित संशोधित जीवों (LMOs) का प्रयोग शामिल है।
- विशिष्ट जैव-सुरक्षा खतरे
- ज़ूनोटिक रोग (ज़ूनोज़): जैसे- एवियन इन्फ्लूएंजा (H5N1), BSE (मवेशियों से) और निपाह वायरस (सुअरों से)।
- कृषि जोखिम: विदेशी आक्रामक प्रजातियां, कृषि-आतंकवाद, और कीट वाहकों को जानबूझकर छोड़ना।
- सिंथेटिक खतरे: इंटरनेट पर स्वतंत्र रूप से उपलब्ध जीनोमिक ज्ञान और आसानी से उपलब्ध बिल्डिंग ब्लॉक्स (घटकों) का उपयोग करके बनाए गए संक्रामक एजेंट।
- भारत का मौजूदा जैव-सुरक्षा ढांचा
- प्रमुख कानून: महामारी रोग अधिनियम (1897); आपदा प्रबंधन अधिनियम (2005); पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; पशुधन आयात अधिनियम; पादप संगरोध नियामक अधिनियम; सामूहिक विनाश के हथियार और उनकी वितरण प्रणाली (अवैध गतिविधियों का निषेध) अधिनियम, 2005।
- नियामक निकाय:
- अनुसंधान शासन और सुरक्षा ढांचा: विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत कार्यरत बायोटेक्नोलॉजी विभाग।
- प्रकोप की निगरानी और प्रतिक्रिया: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत कार्यरत राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC)।
- पशुधन जैव-सुरक्षा और सीमा पार रोग: मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत कार्यरत पशुपालन और डेयरी विभाग।
- कृषि आयात और निर्यात: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत कार्यरत भारत का पादप संगरोध संगठन।
संवर्धित जैव-सुरक्षा ढांचे की आवश्यकता
- BWC (जैविक हथियार अभिसमय) की सीमाएं
- सत्यापन: BWC में अनुपालन की निगरानी के लिए किसी औपचारिक सत्यापन प्रणाली या कार्यान्वयन निकाय का अभाव है।
- सूचना साझाकरण की कमी: यह सम्मेलन राज्यों पर यह घोषित करने की बाध्यता नहीं डालता है कि वे किस प्रकार के और कितनी मात्रा में एजेंटों या संभावित हथियारों पर शोध या उत्पादन कर रहे हैं, या पहले ही कर चुके हैं।
- जैविक हथियार की अस्पष्ट परिभाषा: परिभाषा की अस्पष्ट प्रकृति समझौते को मजबूत करने के उपायों में बाधा डालती है। इससे विचार-विमर्श के दौरान अनिश्चितता पैदा होती है और सम्मेलन के अन्य हिस्सों में शामिल प्रमुख तत्वों पर असहमति बनी रहती है।
- दोहरे उपयोग (Dual-Use) की चुनौती: जीन एडिटिंग और सिंथेटिक बायोलॉजी में तेजी से हो रही प्रगति वैध शोध और हथियार के रूप में उपयोग के बीच अंतर करना कठिन बना देती है।
जैव-आतंकवाद (Bioterrorism)
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भारत के मौजूदा जैव-सुरक्षा ढांचे के साथ मुद्दे:
- संरचनात्मक मुद्दे: पुराने कानून, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और नीति निर्माण के बीच तालमेल की कमी तथा कर्मियों के प्रशिक्षण का अभाव।
- सुभेद्यता: उच्च जनसंख्या घनत्व, अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर कम खर्च के कारण भारत को जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
- कृषि और खाद्य सुरक्षा जोखिम: कृषि और पशुधन पर निर्भरता भारत को कृषि-आतंकवाद और जैविक एजेंटों के दुर्भावनापूर्ण एवं गलत उपयोग (bio-sabotage) के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- ज़ूनोटिक खतरे: लगभग 75% नए मानव रोगजनक जानवरों से उत्पन्न होते हैं; भारत के पारिस्थितिकी तंत्र में तेजी से होने वाला व्यवधान इन खतरों के प्रसार को बढ़ावा देता है।
- भू-राजनीतिक जोखिम: प्रतिद्वंद्वी देशों की मजबूत जैव-प्रौद्योगिकी क्षमता और जैविक एजेंटों तक पहुंच की सापेक्ष सुगमता उनके हथियार के रूप में उपयोग के जोखिम को बढ़ाती है।
- छिद्रिल स्थलीय सीमाएं और समुद्री सीमाएं रोगजनकों और आक्रामक प्रजातियों की सीमा पार आवाजाही का जोखिम पैदा करती हैं।
- जैव-अर्थव्यवस्था का विकास: जैसे-जैसे भारत अपने जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र का विस्तार कर रहा है,वैसे वैसे प्रयोगशाला से होने वाले आकस्मिक रिसाव या संवेदनशील जैविक डेटा की चोरी को रोकने के लिए एक मजबूत ढांचे की भी आवश्यकता है।
- गैर-राज्य अभिकर्ताओं से संबंधित खतरे: कम लागत वाले विषाक्त पदार्थों (जैसे रिसिन) तक पहुंच असममित जैविक युद्ध के जोखिम को बढ़ाती है।
आगे की राह
- नया कानून: पुराने कानूनों को बदलने, स्पष्ट शक्ति संरचना प्रदान करने और आधुनिक खतरों से निपटने के लिए एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य और जैव-सुरक्षा विधेयक का मसौदा तैयार करना।
- भारत में एक समर्पित जैव-सुरक्षा एजेंसी की आवश्यकता: यह अलग-अलग काम करने की प्रवृत्ति को समाप्त करेगी, जिससे स्वास्थ्य, कृषि और रक्षा क्षेत्रों के बीच रणनीतिक समन्वय सुनिश्चित होगा।
- वन हेल्थ एकीकरण: मानव, पशु और पादप स्वास्थ्य के जोखिमों का एक साथ आकलन करने के लिए आसूचना नेटवर्क के भीतर "वन हेल्थ" दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
- अनुसंधान और विकास: रक्षा-उन्मुख वायरोलॉजी, टीकों और जैव-खतरे के शमन पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
- AI सुरक्षा उपाय: AI-Bio अभिसरण से उत्पन्न होने वाले जैव-सुरक्षा खतरों का अध्ययन करने और प्रौद्योगिकी दूरदर्शिता संबंधी अध्ययन आयोजित करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी टास्क फोर्स तैयार की जनि चाहिए।
- राजनयिक नेतृत्व: जैव-सुरक्षा का पता लगाने और निवारण में संयुक्त रणनीतिक पहल के लिए क्वाड (Quad) और भारत-अमेरिका iCET जैसे मंचों का लाभ उठाए जाने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
जैव-सुरक्षा जैविक हथियारों पर एक संकीर्ण फोकस से विकसित होकर एक समग्र "वन बायोसिक्योरिटी" अवधारणा बन गई है, जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एकीकृत करती है। भारत के लिए, नियामक कमियों को राजनयिक ताकत में बदलना वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने और आधुनिक, लचीले जैव-सुरक्षा मानदंडों का समर्थन करने का एक अवसर प्रदान करता है।