सुर्ख़ियों में क्यों?
प्रधानमंत्री ने पारंपरिक चिकित्सा पर पर WHO के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित किया।
अन्य संबंधित तथ्य
- यह शिखर सम्मेलन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया।
- शिखर सम्मेलन के समापन समारोह में पारंपरिक चिकित्सा पर दिल्ली घोषणा-पत्र अपनाया गया, जिसका विषय था - "संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान एवं व्यवहार (Restoring Balance: The Science and Practice of Health and Well-being"।
- इस घोषणा का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में एकीकृत करना, नियमन एवं संरक्षा मानकों को मजबूत करना, अनुसंधान में निवेश बढ़ाना तथा परिणामों की निगरानी के लिए एकीकृत डेटा प्रणालियां विकसित करना है।
- शिखर सम्मेलन की प्रमुख उपलब्धियां
> पारंपरिक-चिकित्सा वैश्विक पुस्तकालय का शुभारंभ: यह पुस्तकालय विश्व के सभी लोगों को पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर वैज्ञानिक डेटा, नीतिगत दस्तावेज और प्रमाणित ज्ञान समान रूप से उपलब्ध कराएगा।
> WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय (SEARO) भवन का उद्घाटन नई दिल्ली में किया गया।

पारंपरिक चिकित्सा (TM) का महत्व
- प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल: अनुमान है कि विश्व की लगभग 80% जनसंख्या अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर है।
- वसुधैव कुटुम्बकम: "पूरा विश्व एक परिवार है" का दर्शन वैश्विक स्वास्थ्य और सामंजस्यपूर्ण कल्याण के लिए पारंपरिक चिकित्सा साझा करने की भावना को प्रेरित करता है।
- वन हेल्थ दृष्टिकोण: पारंपरिक चिकित्सा मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की परस्पर निर्भरता को स्वीकार करती है।
- आर्थिक पक्ष: भारत का आयुष क्षेत्र लगभग 43.4 अरब अमेरिकी डॉलर का है और पिछले एक दशक में इसमें लगभग आठ गुना वृद्धि हुई है।
- सॉफ्ट पावर: भारत के लिए आयुर्वेद और योग वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक कूटनीति और सॉफ्ट पावर के महत्वपूर्ण साधन हैं।
- सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से संबंध:
- SDG 3 (अच्छा स्वास्थ्य): स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाना।
- SDG 15 (स्थल पर जीवन): औषधीय पौधों की मांग के माध्यम से जैव विविधता को पहचानना और उसका महत्व समझना।
- SDG 17 (साझेदारी): प्राचीन ज्ञान के आदान-प्रदान से वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना।
पारंपरिक चिकित्सा के प्रचार में चुनौतियां
- मानकीकरण की कमी: वैश्विक स्तर पर एक समान नियामक ढांचे के अभाव में गुणवत्ता में अंतर।
- उदाहरण: अश्वगंधा या त्रिफला जैसे आयुर्वेदिक उत्पादों में निर्माण प्रक्रिया के कारण सक्रिय तत्वों में भिन्नता।
- जैव विविधता को खतरा: हर्बल औषधियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पारिस्थितिक संतुलन और दुर्लभ चिकित्सा औषधीय प्रजातियों के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है।
- उदाहरण: सर्पगंधा को IUCN रेड डाटा सूची में संकटग्रस्त (Endangered) घोषित किया गया है।
- वैज्ञानिक प्रमाण का अभाव: कई उपचार पद्धतियों के लिए मुख्यधारा के मेडिकल समुदाय द्वारा निर्धारित कठोर नैदानिक परीक्षण डेटा की कमी है।
- उदाहरण: सामान्य सर्दी के उपचार में प्रयुक्त एकिनेशिया पर किए गए परीक्षण निर्णायक परिणाम नहीं दिखा सके।
- बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR): मौजूदा IPR प्रणाली व्यक्तिगत/कॉर्पोरेट स्वामित्व को बढ़ावा देती है, जो पारंपरिक ज्ञान की सामूहिक, सतत प्रकृति के अनुरूप नहीं है।
- उदाहरण: अमेरिका में हल्दी के घाव भरने संबंधी गन को पेटेंट प्रदान किया गया।
आगे की राह
- वैज्ञानिक सत्यापन: पारंपरिक चिकित्सा की सुरक्षा और प्रभावशीलता के लिए साक्ष्य-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना।
- अद्वितीय (Sui Generis) IPR प्रणाली: सामूहिक पारंपरिक ज्ञान की रक्षा हेतु अलग व्यवस्था विकसित करना।
- संरक्षण: संकटग्रस्त औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए स्व-स्थाने और बाह्य-स्थाने संरक्षण लागू करना।
- समावेशी अनुसंधान: ऐसे नैतिक फ्रेमवर्क को शामिल करना जो स्थानीय लोगों के अधिकारों और उनके आत्मनिर्णय का सम्मान करते हैं।
भारत में पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने से संबंधित पहलें
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निष्कर्ष
भारतीय पारंपरिक ज्ञान यह स्मरण कराता है कि सच्चा स्वास्थ्य मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के समग्र पोषण तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य से प्राप्त होता है।