भगवद्गीता की समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance of Bhagavad Gita) | Current Affairs | Vision IAS

Upgrade to Premium Today

Start Now
मेनू
होम

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के लिए प्रासंगिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास पर समय-समय पर तैयार किए गए लेख और अपडेट।

त्वरित लिंक

High-quality MCQs and Mains Answer Writing to sharpen skills and reinforce learning every day.

महत्वपूर्ण यूपीएससी विषयों पर डीप डाइव, मास्टर क्लासेस आदि जैसी पहलों के तहत व्याख्यात्मक और विषयगत अवधारणा-निर्माण वीडियो देखें।

करंट अफेयर्स कार्यक्रम

यूपीएससी की तैयारी के लिए हमारे सभी प्रमुख, आधार और उन्नत पाठ्यक्रमों का एक व्यापक अवलोकन।

अपना ज्ञान परखें

आर्थिक अवधारणाओं में महारत हासिल करने और नवीनतम आर्थिक रुझानों के साथ अपडेट रहने के लिए गतिशील और इंटरैक्टिव सत्र।

ESC

भगवद्गीता की समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance of Bhagavad Gita)

28 Jan 2026
1 min

In Summary

  • भगवद् गीता तनाव प्रबंधन, निस्वार्थ कर्म (निष्काम कर्म) और स्थिर ज्ञान (स्थितप्रजन) के लिए शाश्वत सिद्धांत प्रदान करती है।
  • इसकी शिक्षाएं प्रशासकों को योग्यता, सार्वजनिक सेवा नैतिकता (कर्म फल त्याग), सहानुभूति और निर्णय लेने के बारे में मार्गदर्शन करती हैं।
  • गीता की अवधारणाएं जैसे लोकसंग्रह और लोभ पर नियंत्रण, सीएसआर, सतत जीवन और सामाजिक सद्भाव का समर्थन करती हैं।

In Summary

परिचय 

हाल ही में, भारत के उपराष्ट्रपति ने भगवद्गीता को एक सार्वभौमिक मार्गदर्शक बताया। उनके अनुसार यह तीव्र परिवर्तन के समय में नैतिक स्पष्टता और दिशा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि गीता की शिक्षाएं धार्मिक आचरण, उद्देश्यपूर्ण कार्य और मजबूत चरित्र निर्माण पर बल देती हैं। 

गीता के सिद्धांत समकालीन युग में व्यक्तियों और समाजों के लिए प्रासंगिक बने हुए हैं। वर्तमान समय में, दुनिया भर में युद्ध, असहिष्णुता और पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

भगवद्गीता के प्रमुख सिद्धांत और उनकी समकालीन प्रासंगिकता

व्यक्तियों के लिए 

  • तनाव प्रबंधन:
    • स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) की अवधारणा भावनात्मक स्थिरता और समभाव सिखाती है। 
    • समत्व (मन की समता) का अभ्यास करके व्यक्ति जीवन के द्वंद्वों के बीच संतुलित बना रह सकता है। इनमें सफलता और विफलता या सुख और दुख जैसे द्वंद्व शामिल हैं। 
  • कार्य और प्रेरणा: निष्काम कर्म (स्वार्थरहित क्रिया) का सिद्धांत व्यक्तियों को परिणामों के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देता है।
    • यह दृष्टिकोण प्रदर्शन की चिंता को कम करता है। साथ ही, यह आंतरिक प्रेरणा को बढ़ावा देता है जो तत्काल बाह्य पुरस्कारों के बजाय प्रक्रिया को प्राथमिकता देती है।

प्रशासकों और सिविल सेवकों के लिए 

  • क्षमता ढांचा: भारत में, सिविल सेवकों को गीता के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए प्रशिक्षित करने के लिए "कर्मयोगी क्षमता ढांचा" शुरू किया गया है।
    • यह स्वदेशी मॉड्यूल चार मुख्य गुणों पर बल देता है: स्वाध्याय (आत्म-जागरूकता), सहकार्यता (सहयोग), राज्य कर्म (कुशल वितरण), और स्वधर्म (नागरिकों की सेवा)।
  • लोक सेवा नैतिकता: प्रशासकों के लिए गीता की कर्म फल त्याग (कर्म के फलों का परित्याग) की शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
    • यह सेवा की भावना (कर्म योग) के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रोत्साहित करती है।  
      • यह प्रसिद्धि या धन जैसे पुरस्कारों की इच्छा के बिना कार्य करने की प्रेरणा देती है। 
  • समानुभूति और मृदु कौशल: प्रशासकों से शीलम् परम् भूषणम् (चरित्र ही सर्वोच्च गुण है) को विकसित करने का आग्रह किया जाता है। 
    • इसका तात्पर्य है कि वे समानुभूति विकसित करें और जिन लोगों की वे सेवा करते हैं, उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनने की क्षमता अर्जित करें। भावनात्मक दूरी को कम करते हुए दूसरों के कष्टों के प्रति वास्तविक संवेदनशीलता और जागरूकता विकसित करें।

व्यावसायिक नेताओं के लिए

  • निर्णय-निर्माण: यह नेताओं को तर्कसंगत और निष्पक्ष निर्णय निर्माण की सलाह देता है। इसके लिए उन्हें सफलता और विफलता के द्वंद्व से ऊपर उठना चाहिए।
  • कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR): लोकसंग्रह (विश्व के कल्याण के लिए कार्य करना) की अवधारणा आधुनिक CSR पहलों के अनुरूप है।
    • नेताओं को उन संरक्षकों के रूप में देखा जाता है जिन्हें समाज के लिए धन सृजन हेतु कार्य करना चाहिए। साथ ही उन्हें सभी हितधारकों का कल्याण सुनिश्चित करना चाहिए। 
  • नेतृत्व: यह ग्रंथ नेतृत्व के प्रति एक "इनसाइड-आउट" दृष्टिकोण की वकालत करता है। बाह्य चुनौतियों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए अपने अंतर्मन पर नियंत्रण करना अनिवार्य है। साथ ही अहंकार और क्रोध पर नियंत्रण पाना एक पूर्व शर्त है।

समाज और विश्व 

  • न्यायसंगत युद्ध और न्याय: गीता "न्यायसंगत युद्ध" सिद्धांत में योगदान देती है। यह तर्क देती है कि यद्यपि शांति बेहतर है, लेकिन "नैतिक परजीवियों" के विरुद्ध लड़ना आवश्यक है। ये वे लोग हैं जो नुकसान पहुँचाने के लिए पारंपरिक नैतिकता का दुरुपयोग करते हैं।
  • सामाजिक समरसता: यह ग्रंथ सहिष्णुता और स्वीकृति के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देता है। यह सभी प्राणियों को एक सार्वभौमिक चेतना के माध्यम से परस्पर संबद्ध मानता है। इससे वैश्विक एकता और आपसी सम्मान की भावना को बढ़ावा मिलता है। 
  • सतत जीवन: लालच और इच्छाओं (काम) के नियंत्रण की वकालत करके, गीता संधारणीयता के लिए एक दार्शनिक आधार प्रदान करती है। यह उस अत्यधिक उपभोग को हतोत्साहित करती है जो पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न करता है। 

निष्कर्ष 

भगवद्गीता एक धार्मिक शास्त्र के रूप में अपनी पहचान से ऊपर उठकर जीवन और प्रबंधन के लिए एक व्यापक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है। इसका लक्ष्य-केंद्रित नीतिशास्त्र (परिणामों पर केंद्रित) से प्रक्रियात्मक नीतिशास्त्र (सही कार्य पर केंद्रित) की ओर बदलाव आधुनिक जटिलताओं को सुलझाने के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है। 

चाहे वह एक तनावग्रस्त व्यक्ति हो, एक लोक प्रशासक हो, या एक कॉर्पोरेट CEO हो, गीता का केंद्रीय संदेश वही रहता है: स्वयं पर विजय और कर्तव्य के प्रति निस्वार्थ समर्पण ही संतुलन, प्रभावी नेतृत्व और सामाजिक कल्याण की कुंजी है।

केस स्टडी अभ्यास प्रश्न: 

आप एक जनजातीय और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील जिले के जिला मजिस्ट्रेट हैं जहाँ राज्य सरकार द्वारा एक बड़ी खनन परियोजना को मंजूरी दी गई है। यह परियोजना रोजगार, राजस्व सृजन और अवसंरचना के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, इससे स्थानीय समुदायों का विस्थापन, वनों की कटाई और संभावित दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति भी होगी। 

स्थानीय आबादी विरोध प्रदर्शित कर रही है और आरोप लगा रही है कि यह परियोजना उनके आजीविका के अधिकार और सांस्कृतिक पहचान का उल्लंघन करती है। राजनीतिक नेतृत्व आप पर त्वरित भूमि अधिग्रहण सुनिश्चित करने के लिए दबाव डाल रहे हैं, वहीं नागरिक समाज समूह परियोजना को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। मीडिया गहन समीक्षा कर रही है और आपके द्वारा स्थिति को संभालने के तरीके से आपके करियर की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। 

आप व्यक्तिगत रूप से द्वंद्व की स्थिति में हैं। एक तरफ विकास और राष्ट्रीय आर्थिक हित महत्वपूर्ण हैं; दूसरी तरफ सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संधारणीयता और मानवीय गरिमा दांव पर है। 

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

  1. मामले में शामिल नैतिक मुद्दों की पहचान कीजिए। 
  2. जिला मजिस्ट्रेट के रूप में आपके पास क्या विकल्प उपलब्ध हैं? 
  3. भगवद्गीता के सिद्धांत आपके निर्णय-निर्माण में किस प्रकार मार्गदर्शन कर सकते हैं? 
  4. आपकी अंतिम कार्यवाही क्या होगी? नैतिक रूप से औचित्य सिद्ध कीजिए। 

 

Explore Related Content

Discover more articles, videos, and terms related to this topic

RELATED TERMS

3

प्रक्रियात्मक नीतिशास्त्र (Process-oriented Ethics)

An ethical approach that emphasizes the rightness or morality of the action itself, irrespective of its consequences. This aligns with principles like Karma Yoga, where the focus is on performing duties correctly.

लक्ष्य-केंद्रित नीतिशास्त्र (Goal-centric Ethics)

An ethical approach that prioritizes the outcomes or results of actions. This contrasts with process-oriented ethics, where the focus is on the righteousness of the action itself, regardless of the outcome.

न्यायसंगत युद्ध (Dharma Yuddha)

A concept referring to a 'just war' or 'righteous war' as discussed in the Bhagavad Gita. It argues that while peace is preferable, fighting against 'moral parasites' who exploit traditional ethics to cause harm is sometimes necessary.

Title is required. Maximum 500 characters.

Search Notes

Filter Notes

Loading your notes...
Searching your notes...
Loading more notes...
You've reached the end of your notes

No notes yet

Create your first note to get started.

No notes found

Try adjusting your search criteria or clear the search.

Saving...
Saved

Please select a subject.

Referenced Articles

linked

No references added yet