प्रतिभूति बाजार संहिता (SMC) विधेयक, 2025 {THE SECURITIES MARKETS CODE (SMC) BILL, 2025} | Current Affairs | Vision IAS

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प्रतिभूति बाजार संहिता (SMC) विधेयक, 2025 {THE SECURITIES MARKETS CODE (SMC) BILL, 2025}

28 Jan 2026
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

प्रतिभूति बाजार संहिता (SMC) विधेयक 2025 को वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • यह विधेयक भारत के प्रतिभूति बाजारों के प्रशासन हेतु प्रचलित विभिन्न कानूनों के प्रावधानों को तर्कसंगत रूप से एकीकृत कर एक एकल 'प्रतिभूति बाज़ार संहिता' में समेकित करता है तथा कुछ अधिनियमों को निरस्त करता है, जिनमें शामिल हैं—
    • भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) अधिनियम 1992;
    • निक्षेपागार अधिनियम 1996; तथा 
    • प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम (SCRA), 1956
  • समग्र रूप से, इसका उद्देश्य भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की भूमिका को और सुव्यवस्थित करना, अनुपालन को आसान बनाना तथा भारतीय प्रतिभूति बाजार में निवेशकों के विश्वास में वृद्धि करना है।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के बारे में (मुख्यालय: मुंबई, क्षेत्रीय कार्यालय: नई दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, और अहमदाबाद) 

उत्पत्ति

  • प्रारंभिक गठन: 1988 में एक गैर-सांविधिक निकाय के रूप में।
  • सांविधिक दर्जा: हर्षद मेहता घोटाले के बाद, SEBI अधिनियम, 1992 के माध्यम से।
  • पूर्ववर्ती: पूंजीगत निर्गम नियंत्रक (CCI) को प्रतिस्थापित किया। इससे बाजार मेरिट विनिमय से प्रकटीकरण-आधारित विनिमय की ओर परिवर्तित हुआ।

उद्देश्य

  • निवेशक संरक्षण: निवेशकों को धोखाधड़ी, इनसाइडर ट्रेडिंग और अनुचित प्रथाओं से बचाना।
  • बाजार विनियमन: यह सुनिश्चित करना कि स्टॉक एक्सचेंज और मध्यवर्ती कुशलतापूर्वक एवं पारदर्शी रूप से कार्य करें।
  • निष्पक्षता: एक सुरक्षित निवेश परिवेश निर्मित करना और 'प्राइस रिगिंग' (कीमतों में हेरफेर) जैसी कुरीतियों को रोकना।
  • शिक्षा: निवेशक शिक्षा को बढ़ावा देना और मध्यवर्तियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना।

भूमिका और कार्य

  • विनियामक कार्य: मध्यवर्तियों (जैसे- ब्रोकर, म्यूचुअल फंड, मर्चेंट बैंकर, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां आदि) का पंजीकरण और विनियमन करना, तथा कंपनियों के अधिग्रहण की निगरानी करना।
  • संरक्षण कार्य: इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाना, कीमतों में हेरफेर की जांच करना और निवेशक संरक्षण एवं शिक्षा कोष (IPEF) का प्रबंधन करना।
  • विकासात्मक कार्य: बाजार के आधुनिकीकरण के लिए आधुनिक अवसंरचना (जैसे- इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग), अनुसंधान और प्रशिक्षण को बढ़ावा देना।

सेबी की शक्तियां

  • अर्ध-विधायी: नियम और विनियम बनाने की शक्ति (जैसे इनसाइडर ट्रेडिंग नियम, लिस्टिंग दायित्व आदि)।
  • अर्ध-न्यायिक: धोखाधड़ी या अनैतिक प्रथाओं के मामलों में निर्णय सुनाने, आदेश पारित करने और जुर्माना लगाने की शक्ति।
  • अर्ध-कार्यकारी: जांच करने, लेखा बहियों का निरीक्षण करने और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ विनियमों को लागू करने की शक्ति।

बाजार विनियमन में सेबी की महत्वपूर्ण उपलब्धियां

  • निपटान चक्र: जनवरी 2023 में T+1 निपटान चक्र लागू किया गया, जिससे चीन के बाद ऐसा करने वाला भारत दूसरा प्रमुख बाजार बन गया। वर्तमान में सेबी T+0 और तत्काल निपटान पर भी प्रायोगिक रूप से कार्य कर रहा है।
  • विमूर्तकरण (डिमैटेरियलाइजेशन): निक्षेपागार अधिनियम, 1996 के माध्यम से भौतिक शेयर प्रमाण-पत्रों और उनसे जुड़े जोखिमों (जैसे- चोरी, जालसाजी) को समाप्त किया गया। वर्तमान में सभी शेयर डिजिटल रूप में रखे जाते हैं।
  • IPO सुधार: एप्लीकेशन्स सपोर्टेड बाय ब्लॉक्ड अमाउंट (ASBA) की शुरुआत की गई है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि IPO के लिए आवेदन की गई राशि निवेशक के खाते से तभी कटेगी जब उसे शेयर आवंटित हो जाएंगे।
  • शिकायत निवारण: निवेशकों की शिकायतों की ऑटो-रूटिंग और त्वरित समाधान के लिए सेबी शिकायत निवारण प्रणाली (SCORES) की शुरुआत की गई है। इसे अब SCORES 2.0 में अपग्रेड कर दिया गया है।
  • एल्गो ट्रेडिंग नियम: बाजार में हेरफेर को रोकने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया गया है। इसके तहत एल्गोरिदम के लिए एक्सचेंज की अनिवार्य मंजूरी और यूनिक "एल्गो आईडी" होना आवश्यक है।
  • बाजार सुरक्षा: व्युत्पन्न (डेरिवेटिव्स) बाजार में खुदरा निवेशकों के समक्ष अत्यधिक जोखिम को नियंत्रित किया गया है। सख्त नियमों के माध्यम से फ्यूचर्स एवं ऑप्शंस (F&O) ट्रेड की मात्रा को 50% से अधिक कम किया गया है, ताकि लघु निवेशक बड़े नुकसान से बच सकें।

सेबी के समक्ष चुनौतियां

  • एल्गोरिदम और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग: एल्गोरिदम ट्रेडिंग में खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी से बाजार में हेरफेर और अस्थिरता का जोखिम बढ़ गया है।
  • क्रिप्टोकरेंसी विनियमन: क्रिप्टोकरेंसी को लेकर वर्तमान में एक 'विनियामक शून्यता' की स्थिति बनी हुई है। हालांकि, इनकी ट्रेडिंग से प्राप्त लाभ पर 30% कर आरोपित किया जाता है, किंतु सेबी द्वारा इनका औपचारिक विनियमन नहीं किया जाता। इसके कारण धन शोधन, ट्रेडिंग वॉल्यूम का विदेशी बाजारों में जाना और निवेशक सुरक्षा की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
  • निगरानी और हाई-प्रोफाइल जांच: हिंडनबर्ग-अडाणी जैसे हालिया विवादों ने सेबी की निगरानी क्षमताओं को लेकर प्रश्न खड़े किए हैं।
    • आलोचकों का तर्क है कि सेबी विदेशी निधियों के अंतिम लाभकारी स्वामियों (Ultimate Beneficial Owners) की पहचान करने और जटिल बाजार हेरफेर को पकड़ने में संघर्ष कर रहा है।
  • डेरिवेटिव्स में खुदरा निवेशकों का जोखिम: फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में खुदरा निवेशकों की भागीदारी में भारी उछाल आया है। इससे खुदरा निवेशकों को प्रतिवर्ष लगभग ₹60,000 करोड़ का भारी नुकसान हो रहा है। सख्त प्रतिबंधों के माध्यम से बाजार की स्वतंत्रता और निवेशक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
  • तकनीकी खामियां: चूंकि, बाजार पूरी तरह से तकनीक पर निर्भर है, इसलिए बाजार अवसंरचना संस्थाओं (MIIs) में होने वाली तकनीकी गड़बड़ियों का प्रबंधन करना और उनकी परिचालनात्मक लोचशीलता सुनिश्चित करना सेबी के लिए एक कठिन कार्य है।

प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • बोर्ड की सदस्य संख्या में वृद्धि: बोर्ड के सदस्यों की संख्या 9 से बढ़ाकर 15 कर दी जाएगी। इसमें अब एक अध्यक्ष, केंद्र सरकार के मंत्रालयों से 2 सदस्य, RBI द्वारा नामित 1 सदस्य और 11 अन्य सदस्य (जिनमें कम-से-कम 5 पूर्णकालिक सदस्य होंगे) शामिल होंगे।
  • प्रत्यायोजन: यह विधेयक सेबी को अपने पंजीकरण कार्यों के कुछ हिस्सों को बाजार अवसंरचना संस्थाओं (MIIs) और स्व-विनियामक संगठनों (SROs) को सौंपने की शक्ति प्रदान करता है, ताकि विनियमन अधिक प्रभावी हो सके।
  • सरलीकृत कानूनी भाषा: इसमें अप्रचलित एवं अनावश्यक प्रावधानों को हटाया गया है, दोहराव को समाप्त कर समान विनियामक प्रक्रियाओं को सुनिश्चित करता है।
  • प्रतिभूतियों की विस्तृत परिभाषा: परिभाषा का विस्तार कर इसमें स्पष्ट रूप से हाइब्रिड इंस्ट्रूमेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGR), जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल (ZCZP) इंस्ट्रूमेंट्स और बहुपक्षीय संस्थाओं द्वारा जारी ऑनशोर रुपया बॉण्ड्स को भी शामिल किया गया है।
  • हितों का टकराव: सेबी के सभी सदस्यों को अपने किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित (परिवार के सदस्यों के हितों सहित) का खुलासा करना होगा और संबंधित चर्चाओं से स्वयं को अलग रखना होगा।
    • विधेयक सेबी बोर्ड के किसी सदस्य को हटाने का अधिकार देता है, यदि वह कोई ऐसा वित्तीय या अन्य हित प्राप्त करता है, जिससे उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में पक्षपात की संभावना हो।
  • स्वतंत्र (आर्म्स-लेंथ) पृथक्करण: विधेयक जांच और न्यायनिर्णयन कार्यों के बीच वैधानिक अलगाव को अनिवार्य करता है।
    • यह वर्तमान सेबी अधिनियम की उस लंबे समय से चली आ रही आलोचना को संबोधित करता है कि जाँच और निर्णय दोनों शक्तियाँ एक ही संगठन में निहित हैं।
  • गैर-अपराधीकरण: उल्लंघनों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
    • बाजार दुरुपयोग (जैसे- इनसाइडर ट्रेडिंग, निवेशकों के साथ धोखाधड़ी) को आपराधिक दायित्व वाले अपराध के रूप में ही बनाए रखा गया है। 
    • मामूली या तकनीकी उल्लंघनों को सिविल (दीवानी) उल्लंघन के रूप में पुनर्वर्गीकृत किया गया है। इससे वे आपराधिक मुकदमे की बजाय केवल जुर्माने के माध्यम से दंडनीय होंगे।

निष्कर्ष

प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक, 2025, भारत की वित्तीय कानूनी संरचना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। तीन प्रमुख अधिनियमों को एकल संहिता में समेकित करके, इसका उद्देश्य 'व्यावसायिक सुगमता' को बढ़ावा देना, संरक्षणकर्ता (ओम्बुड्सपर्सन) के माध्यम से निवेशक संरक्षण को सुदृढ़ करना तथा भारतीय प्रतिभूति बाजार को अधिक लचीला और तकनीक संचालित बनाना है।

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संरक्षणकर्ता (Ombudsman)

यह एक निष्पक्ष अधिकारी होता है जिसे सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में शिकायतों की जांच करने और उन्हें हल करने के लिए नियुक्त किया जाता है।

सिविल (दीवानी) उल्लंघन

यह एक ऐसा उल्लंघन है जो आपराधिक श्रेणी में नहीं आता है और आमतौर पर केवल जुर्माने के माध्यम से दंडनीय होता है।

स्व-विनियामक संगठन (SROs)

ये ऐसे संगठन होते हैं जिन्हें अपने सदस्यों के आचरण को विनियमित करने का अधिकार दिया जाता है, जैसे कि स्टॉक एक्सचेंज।

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