सुर्ख़ियों में क्यों?
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 26 दिसंबर, 2025 को अपना 100वां स्थापना दिवस मनाया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के बारे में
- पृष्ठभूमि:
- भारत से बाहर स्थापना (1920): वर्ष 1920 में ताशकंद (तत्कालीन सोवियत तुर्किस्तान का हिस्सा) में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी गई थी। इसकी स्थापना 7 क्रांतिकारियों के एक समूह ने की थी। ये क्रांतिकारी ब्रिटिश शासन के विरोध में एकजुट हुए थे और 1917 की रूसी अक्टूबर क्रांति से प्रेरित थे।
- संस्थापक सदस्य: एम. एन. रॉय, ईवलिन ट्रेंट–रॉय, अबनी मुखर्जी, रोजा फिटिंगोव, मोहम्मद अली, मोहम्मद शफ़ीक (निर्वाचित सचिव) और एम. पी. टी. आचार्य।
- भारत के भीतर CPI का गठन: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की औपचारिक स्थापना कानपुर कम्युनिस्ट सम्मेलन (1925) के दौरान पारित एक संकल्प के माध्यम से की गई थी। इस सम्मेलन में ब्रिटिश भारत के हिस्सों में सक्रिय विभिन्न कम्युनिस्ट समूहों को एकजुट किया गया था।
- प्रथम अध्यक्ष: सिंगारवेलु चेट्टियार।
- प्रथम महासचिव: एस. वी. घाटे और जे. पी. बगरहट्टा।
- पार्टी के संस्थापक सदस्य: सत्यभक्त, एम. एन. रॉय, ई. टी. रॉय, अबनी मुखर्जी, मोहम्मद अली, हसरत मोहानी आदि।
- अन्य प्रमुख नेता: ए. के. गोपालन, एस. ए. डांगे, ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद, पी. सी. जोशी, अजय घोष, पी. सुंदरैया आदि।
- वैचारिक आधार: भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने मार्क्सवादी–लेनिनवादी विचारधारा को अपनाया। इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक मुक्ति भी था।
- मार्क्सवाद–लेनिनवाद एक राजनीतिक विचारधारा तथा शासन प्रणाली है, जो कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन के विचारों पर आधारित है।
- यह मार्क्सवादी समाजवाद को लेनिनवादी वैनगार्डिज्म (अग्रगामीवाद) अवधारणा के साथ जोड़ती है। यह विचारधारा इस पर ज़ोर देती है कि कम्युनिस्ट पार्टी क्रांति का नेतृत्व करे। इससे एक समाजवादी राज्य की स्थापना होगी और अंततः वर्गहीन साम्यवादी समाज का निर्माण किया जा सकेगा।
- CPI द्वारा समर्थित प्रमुख प्रकाशन: गणवाणी (बंगाली साप्ताहिक); क्रांति, जीवनमार्ग, कामगार (मराठी साप्ताहिक); मजदूर, किसान सभा पत्रिकाएं (हिंदी); प्रभातम (मलयालम); लेबर किसान गजट (यह भारत के भीतर आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त CPI का पहला प्रकाशन था) आदि।
- CPI के मुख्य लक्ष्य: बैंकों का राष्ट्रीयकरण, श्रमिकों और किसानों के अधिकारों की रक्षा, भूमि सुधार, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन, समाजवादी राज्य की स्थापना, आदि।
- CPI के इतिहास की प्रमुख घटनाएं:
- प्रतिबंध: ब्रिटिश सरकार ने 1934 में इसे अवैध घोषित कर दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नीतियों में बदलाव के कारण 1942 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया था।
- विभाजन (1964): सोवियत संघ और चीन के बीच वैचारिक मतभेद के कारण 1964 में CPI दो भागों में विभाजित हो गई थी:
- CPI (सोवियत संघ समर्थक गुट) और CPI (मार्क्सवादी) (चीन समर्थक गुट)।
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में CPI की भूमिका
- जनता को संगठित करना: CPI के नेतृत्व वाले संगठनों जैसे- ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC, 1920), अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS, 1936), अखिल भारतीय छात्र संघ (1936) तथा महिला संगठनों के जरिए जन आंदोलन को व्यापक आधार दिया गया।
- असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनों में महिलाओं, किसानों, श्रमिकों एवं मध्यम वर्ग की बड़ी भागीदारी देखी गई थी।
- पूर्ण स्वतंत्रता की मांग: CPI भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाला पहला राजनीतिक दल था। उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के अहमदाबाद अधिवेशन (1921) और गया अधिवेशन (1922) को खुले पत्र के माध्यम से पूर्ण स्वराज की मांग रखी थी।
- बाद में यही मांग 1929 के लाहौर अधिवेशन में INC द्वारा औपचारिक संकल्प के रूप में पारित की गई थी।
- सामाजिक सुधार: CPI ने दलितों की समानता, हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे मुद्दों का सक्रिय रूप से समर्थन किया था। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- उदाहरण के लिए- CPI के नेताओं ए. के. गोपालन और पी. कृष्ण पिल्लै ने केरल के गुरुवायूर मंदिर में अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह का नेतृत्व किया था।
- कम्युनिस्ट नेताओं ने महाड़ सत्याग्रह (1927) और कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन (1930) जैसे महत्वपूर्ण आंदोलनों में भी सक्रिय भागीदारी की थी।
- संविधान निर्माण में CPI की भूमिका
- वर्ष 1934 में एम. एन. रॉय ने औपचारिक रूप से संविधान निर्माण का विचार प्रस्तुत किया था।
- CPI ने देश के लिए संविधान सभा के गठन के विचार को प्रमुखता से आगे बढ़ाया था।
- वर्ष 1925 में CPI पहली ऐसी पार्टी बनी थी, जिसने सांप्रदायिक संगठनों के सदस्यों को अपनी सदस्यता से प्रतिबंधित कर दिया था।
- CPI ने पंथनिरपेक्षता, न्याय, समानता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार, जमींदारी प्रथा के उन्मूलन जैसे आदर्शों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। इन आदर्शों को बाद में भारतीय संविधान में शामिल किया गया।
- पार्टी ने "जोतने वाले को भूमि" और किसानों को भूमि का मालिकाना हक देने की मांग का नेतृत्व किया।
- वैचारिक प्रभाव: अखिल भारतीय छात्र संघ और ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों के माध्यम से कम्युनिस्टों ने क्रांतिकारी गतिविधियों द्वारा ब्रिटिश शासन के उन्मूलन के विचार का प्रचार-प्रसार किया।
- आंदोलनों को समर्थन: CPI तथा उसके नेताओं ने भारत में कई प्रमुख किसान और श्रमिक आंदोलनों को सक्रिय समर्थन दिया था (इन्फोग्राफिक देखिए)।

निष्कर्ष
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जन-आंदोलनों के व्यापक संगठन, सामाजिक सुधार आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी तथा पूर्ण स्वतंत्रता और संवैधानिक व्यवस्था के प्रारंभिक समर्थन के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।