सुर्ख़ियों में क्यों?
महाराष्ट्र ने बढ़ते साइबर अपराधों से निपटने की अपनी क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए MahaCrimeOS AI का शुभारंभ किया है। यह भारत में कानून-प्रवर्तन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग को रेखांकित करता है।
MahaCrimeOS AI के बारे में
- यह एक उन्नत AI को-पायलट सिस्टम है, जिसे माइक्रोसॉफ्ट के पार्टनर साइबरआई (CyberEye), महाराष्ट्र सरकार के स्पेशल पर्पज व्हीकल मार्वल (MARVEL) और माइक्रोसॉफ्ट इंडिया डेवलपमेंट सेंटर (IDC) द्वारा विकसित किया गया है।
- कार्य: यह निष्पादन और विश्लेषण को स्वचालित करेगा; मामलों के त्वरित पंजीकरण में सक्षम बनाएगा; केस डायरी एवं रिपोर्ट का स्वचालित निर्माण करेगा; अनुकूलन योग्य जांच पथ का सुझाव देगा; और संदिग्ध व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग तैयार करेगा।
कानून प्रवर्तन में AI के अनुप्रयोग
- प्रिडिक्टिव पुलिसिंग: AI मॉडल्स अपराध के पैटर्न, उच्च अपराध जोखिम वाले क्षेत्रों और आपराधिक व्यवहार का विश्लेषण प्रदान करते हैं। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियां सक्रिय कदम उठा पाती हैं।
- उदाहरण: अमेरिका का क्लियरव्यू AI बाल शोषण के मामलों में खतरों का तेजी से पता लगाने और रोकथाम में सक्षम है।
- निगरानी और जांच:
- अपराध स्थल की निगरानी और संदिग्धों की ट्रैकिंग के लिए स्वचालित ड्रोन।
- साक्ष्यों और डिजिटल अपराध के साक्ष्यों की जांच के लिए राष्ट्रीय आपराधिक डेटाबेस और फोरेंसिक विश्लेषण के साथ एकीकृत फेशियल रिकग्निशन सिस्टम।
- रंग, मॉडल और विशिष्ट ड्राइविंग पैटर्न के आधार पर वाहनों की पहचान करने के लिए ऑटोमेटेड नंबर-प्लेट रिकग्निशन (ANPR)।
- FIR दर्ज करना और न्यायिक कार्यवाही: AI-आधारित स्पीच-टू-टेक्स्ट उपकरण रियल टाइम में FIR दर्ज करने और केस से संबंधित दस्तावेज तैयार करने में सहायता करते हैं। साथ ही, ये गवाहों के बयानों के विश्लेषण और अदालती साक्ष्यों के मूल्यांकन में भी सुधार करते हैं।
- डेटा-संचालित अपराध ट्रैकिंग और इंटेलिजेंस सिस्टम: AI ई-प्रिजन और ई-फोरेंसिक डेटाबेस को एकीकृत करके अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (CCTNS) को बेहतर बनाता है।
- जटिल डेटा विश्लेषण: फोन कॉल रिकॉर्ड, वित्तीय लेन-देन और डिजिटल साक्ष्यों जैसे जटिल डेटा का विश्लेषण कर अंतरराष्ट्रीय मामलों को परस्पर जोड़ने और रियल टाइम में पैटर्न पहचानने में AI सहायक सिद्ध होता है।
- उदाहरण: फ्रांसीसी और डच कानून प्रवर्तन एजेंसियों और यूरोपोल ने 'एनक्रोचैट' नेटवर्क (अपराधियों द्वारा उपयोग किया जाने वाला प्लेटफॉर्म) को ध्वस्त कर दिया। इसके तहत AI ने 11.5 करोड़ से अधिक आपराधिक चैट को प्रोसेस करने में मदद की थी।
- डिजिटल खतरों की पहचान: डीपफेक (हेरफेर किए गए मीडिया), मॉर्फ्ड यानी विकृत कंटेंट और धोखाधड़ी वाले फिशिंग लिंक, जिनका उपयोग दुष्प्रचार या उत्पीड़न के लिए किया जाता है, की पहचान में AI अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- महत्वपूर्ण स्थानों का पूर्वानुमान: AI ऐतिहासिक अपराध रिकॉर्ड और पर्यावरणीय कारकों (जैसे मौसम या विशेष समय/अवसर) का विश्लेषण करके अपराध के सम्भावित स्थलों(हीट मैप) को चिन्हित कर सकता है। इससे पुलिस को यह निर्धारित करने में सहायता मिलती है कि गश्त या भीड़-नियंत्रण प्रबंधन के लिए कहाँ और कब ध्यान केंद्रित किया जाए।
कानून प्रवर्तन में AI से जुड़े मुद्दे
- गोपनीयता और सामूहिक निगरानी: AI-सक्षम सेंसर्स और कैमरों के व्यापक उपयोग से स्थायी निगरानी की स्थिति उत्पन्न होने का जोखिम है। इसका मौलिक स्वतंत्रता पर "नकारात्मक प्रभाव" पड़ता है।
- पुट्टास्वामी वाद के निर्णय (2017) में उच्चतम न्यायालय ने निजता के अधिकार को भारत के संविधान (अनुच्छेद 21) के तहत एक मूल अधिकार घोषित किया था।
- एल्गोरिथमिक संबंधी पूर्वाग्रह/भेदभाव: ऐतिहासिक डेटा पर प्रशिक्षित AI सिस्टम, जो अक्सर पुराने पूर्वाग्रहों को दर्शाते हैं, सामाजिक भेदभाव को स्थायी बना सकते हैं और उसे बढ़ा सकते हैं।
- उदाहरण: फेशियल रिकग्निशन जैसी तकनीकों में नस्लीय और लैंगिक पूर्वाग्रह पाए गए है, जो अक्सर नृजातीय अल्पसंख्यकों के लिए अधिक त्रुटि दर प्रदर्शित करते हैं।
- पारदर्शिता की कमी: डीप लर्निंग या न्यूरल नेटवर्क पर आधारित उन्नत AI प्रणालियां अक्सर "ब्लैक बॉक्स" मानी जाती हैं, क्योंकि उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली मनुष्यों के लिए समझना अत्यंत जटिल होता है।
- उदाहरण: नीदरलैंड का टोसलागेनाफेयर (चाइल्डकेयर लाभ घोटाला), जहाँ एक AI सिस्टम ने परिवारों पर गलत तरीके से बाल देखभाल के लिए धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया था।
- स्वचालन संबंधी पूर्वाग्रह: मानवों में AI के निष्कर्षों पर अत्यधिक निर्भर होने की प्रवृत्ति होती है, यह मानते हुए कि वे निष्पक्ष और त्रुटिरहित हैं। इससे अधिकारी अपने पेशेवर विवेक की अनदेखी कर सकते हैं।
- त्रुटियों का व्यापक विस्तार: मानवीय त्रुटियाँ सामान्यतः सीमित होती हैं, जबकि किसी त्रुटिपूर्ण AI प्रणाली की गलतियाँ बड़े पैमाने और तीव्र गति से दोहराई जा सकती हैं।
- उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया की 'रोबोडेट' योजना, जिसमें स्वचालित "आय औसत" एल्गोरिद्म के आधार पर 4,70,000 गलत ऋण नोटिस जारी किए गए।
- अन्य मुद्दे: भारत में समर्पित AI कानून का अभाव; AI-विश्लेषित साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष सुनवाई से संबंधित चिंताएँ; बड़े डेटाबेस की डेटा सुरक्षा से जुड़े जोखिम आदि।
कानून प्रवर्तन में AI को एकीकृत करने की पहलें
- भारत
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): इसे ऑटोमेटेड फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (AFRS) लागू करने के लिए अधिकृत किया गया है।
- फेकचेक सॉफ्टवेयर: आईटी मंत्रालय द्वारा सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) के माध्यम से हेरफेर किए गए वीडियो और छवियों (डीपफेक) का पता लगाने और उन्हें चिन्हित करने के लिए विकसित किया गया।
- भाषिणी प्लेटफॉर्म: राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत बहुभाषी आपराधिक डेटा के प्रसंस्करण में सहायता करने और पुलिस के लिए वॉयस असिस्टेंट विकसित करने हेतु।
- सेफ सिटी प्रोजेक्ट: पुलिस कंट्रोल रूम को अलर्ट करने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा 2026 तक फेशियल रिकग्निशन और संकट का पता लगाने वाली तकनीकों से लैस 10,000 AI-सक्षम कैमरे लगाने की योजना है।
- आंध्र प्रदेश का ई-प्रगति प्लेटफॉर्म: यह विभिन्न सरकारी विभागों की सूचनाओं का एकीकरण करता है, जिससे कानून-प्रवर्तन और प्रशासनिक दक्षता को समर्थन मिलता है।
- बेंगलुरु पुलिस ने एक AI सिस्टम तैनात किया: त्योहारों के दौरान लाइव CCTV फीड की निगरानी हेतु AI प्रणाली तैनात की गई। इसने चमक और धुएँ की पहचान कर पटाखों पर प्रतिबंध के 2,000 से अधिक उल्लंघनों की पहचान की।
- विश्व
- यूरोपोल का टूल रिपॉजिटरी (ETR): यह एक सहभागी मंच है जिसमें संपूर्ण यूरोप की कानून प्रवर्तन एजेंसियां मानव तस्करी के पीड़ितों को बचाने के लिए सॉफ्टवेयर और AI उपकरण साझा करती हैं।
- क्राइम एंटीसिपेशन सिस्टम (नीदरलैंड): यह एक साप्ताहिक विश्लेषणात्मक उपकरण है जो अपराध के मुख्य स्थलों का पूर्वानुमान लगाने के लिए स्थानीय डेटा और पर्यावरणीय कारकों का उपयोग करता है। इससे कुशल संसाधन आवंटन संभव होता है।
- RADAR-iTE (जर्मनी): यह पुलिस द्वारा प्रयुक्त एक मानकीकृत एल्गोरिद्मिक उपकरण है, जो उग्रवादी-सलाफी विचारधारा से जुड़े ज्ञात व्यक्तियों द्वारा हिंसक कृत्यों के जोखिम का मूल्यांकन करता है।
- इंटरपोल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूलकिट: इसे संयुक्त राष्ट्र अंतर-क्षेत्रीय अपराध एवं न्याय अनुसंधान संस्थान (UNICRI) के सहयोग से विकसित किया गया है। यह AI के उपयोग से संबंधित प्रमुख चुनौतियों से निपटने में कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की सहायता करता है।
- इंटरपोल रिस्पॉन्सिबल AI लैब (I-RAIL): इसका उद्देश्य पुलिसिंग में AI के जिम्मेदार उपयोग से संबंधित मामलों पर सभी सदस्य देशों के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करना है।
आगे की राह
- आवश्यक कानूनी और नैतिक सुरक्षा उपाय: ऑटोमेटेड फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (AFRS) को विनियमित करने के लिए एक औपचारिक कानून की आवश्यकता है। इससे निजता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने और जनता का विश्वास बनाए रखने में मदद मिलेगी।
- मानवाधिकार प्रभाव मूल्यांकन: किसी भी AI प्रणाली के परिनियोजन से पूर्व मानवाधिकारों का मूल्यांकन करने के लिए भारत को एक विधिक ढाँचा स्थापित करना चाहिए। साथ ही, उपयोगकर्ता एजेंसियों को प्रणाली की सीमाओं के प्रति पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित और जागरूक किया जाना चाहिए।
- ह्यूमन-इन-द-लूप प्रणाली से संबंधी आवश्यकताएं: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि AI द्वारा दिए गए जोखिम-स्कोर गिरफ्तारी या दंड निर्धारण में निर्णायक कारक न बनें; प्रत्येक चरण में मानवीय निगरानी अनिवार्य बनी रहनी चाहिए।
- क्षमता निर्माण और ज्ञान साझा करना: नेशनल साइबर क्राइम रिसर्च एंड इनोवेशन सेंटर (NCR&IC) मानक संचालन प्रक्रियाएं (SoPs) विकसित करने के साथ-साथ कानून प्रवर्तन कर्मियों को AI अपनाने के लिए प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित कर सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान, संयुक्त परियोजनाओं में निवेश तथा इंटरपोल जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सहयोग लेकर वैश्विक स्तर पर समन्वय बढ़ाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
MahaCrimeOS AI जैसे AI सिस्टम की तैनाती डेटा-संचालित, तेज और अधिक प्रभावी कानून प्रवर्तन की दिशा में भारत के कदम को दर्शाती है, विशेष रूप से जटिल साइबर और डिजिटल अपराधों से निपटने में। हालांकि, तकनीकी दक्षता को निजता, निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों के साथ संतुलित करने के लिए मजबूत कानूनी सुरक्षा उपाय, पारदर्शिता और मानवीय निगरानी सुनिश्चित करना आवश्यक है।