सुर्ख़ियों में क्यों?
संघ सरकार ने मोबाइल फोन में संचार साथी ऐप को पहले से अनिवार्य रूप से इंस्टॉल करने का आदेश जारी किया था। हालांकि, बाद में इस आदेश को वापस ले लिया गया। इस आदेश ने कई तरह की चिंताएं उत्पन्न कर दी थीं। बिना अनुमति लिए ऐप इंस्टॉल होने, उन पर निगरानी रखे जाने, व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और सरकार की जरूरत से ज़्यादा दखलअंदाजी को लेकर लोगों में भय व्याप्त हो गया था।
डिजिटल संविधानवाद क्या है?
- डिजिटल संविधानवाद का अर्थ डिजिटल क्षेत्र में स्वतंत्रता, गरिमा, समानता, गैर-मनमानी, निजता का संरक्षण, जवाबदेही और विधि का शासन जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को लागू करना है। डिजिटल क्षेत्र में डेटा संग्रह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), एल्गोरिदम और निगरानी प्रणालियों को भी शामिल किया गया है।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल शक्तियां भी उन्हीं संवैधानिक मूल्यों के दायरे में रहते हुए कार्य करें जिनके दायरे में राज्य यानी सरकार की संस्थाएं कार्य करती हैं।
डिजिटल संविधानवाद की भावना के उदय के कारण
- सरकार की डिजिटल शक्ति में वृद्धि: आधुनिक राज्यों या सरकारों में डिजिटल माध्यमों से अपनी शक्ति का उपयोग करने की प्रवृति बढ़ती जा रही है। अपराध रोकने के लिए डेटा का इस्तेमाल, चेहरा पहचानने की तकनीक, बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह, आदि इनके कुछ उदाहरण हैं।
- यदि सरकार की इस डिजिटल शक्ति पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 (निजता के अधिकार का संरक्षण और गरिमा के साथ जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन कर सकती है। इसलिए साइबरस्पेस की भी संवैधानिक सीमाएं तय करना जरूरी है।
- बिग-टेक कंपनियों का अर्ध-संप्रभु शक्ति के रूप में उदय: निजी क्षेत्र के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अब किसी 'सरकार' की तरह कार्य करने लगे हैं निजी क्षेत्र के डिजिटल प्लेटफॉर्म अब ऐसे कार्य भी करने लगे हैं जो परंपरागत रूप से राज्य अथवा सरकार से जुड़े हुए हैं, जैसे-
- ये डिजिटल प्लेटफॉर्म्स:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना (कंटेंट में सुधार करके या हटाकर),
- आर्थिक पहुंच का निर्धारण करना (ऐप स्टोर और गिग प्लेटफॉर्म के माध्यम से), और
- सूचना के प्रसार को नियंत्रित करना (सर्च इंजन और सोशल मीडिया के माध्यम से)।
- दरअसल, ये प्लेटफॉर्म्स जटिल और अस्पष्ट एल्गोरिदम के माध्यम से कार्य करते हैं। इनमें लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं होती। इससे एक तरह की निजी संवैधानिक व्यवस्था बनती जा रही है।
- जब निजी प्लेटफॉर्म बड़े स्तर पर लोक अधिकारों को प्रभावित करते हैं, तब संवैधानिक सिद्धांत केवल राज्य (सरकार) ही नहीं बल्कि प्रभावशाली डिजिटल मध्यवर्तियों पर भी लागू होने चाहिए।
- ये डिजिटल प्लेटफॉर्म्स:
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरा: डिजिटल प्लेटफॉर्म गलत जानकारी और डीपफेक के जरिए लोगों की राय, चुनाव और राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित कर सकते हैं। ये सूक्ष्म स्तर पर लक्षित राजनीतिक विज्ञापनों के माध्यम से मतदाताओं की पसंद को भी प्रभावित कर सकते हैं।
- इसके अलावा, इको चैम्बर्स और एल्गोरिदम से बढ़ता ध्रुवीकरण विचार-विमर्श वाली लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर करते हैं। इसलिए संवैधानिक लोकतंत्र की डिजिटल बुनियाद यानी डिजिटल संविधानवाद की रक्षा करना जरूरी हो जाता है।
- डिजिटल अधिकारों को न्यायिक स्तर पर मान्यता: विश्व भर के न्यायालयों ने अब डिजिटल अधिकारों को मान्यता देना शुरू कर दिया है।
- उदाहरण के लिए: अनुराधा भसीन वाद (2020) में उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि इंटरनेट के माध्यम से अपनी बात रखना अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' में शामिल है।
डिजिटल जगत में संवैधानिक सिद्धांतों के समक्ष चुनौतियां
- बिना नियंत्रण की निगरानी: मेटाडाटा, अवस्थिति (लोकेशन) की ट्रैकिंग, बायोमेट्रिक्स और चेहरा पहचानने वाली तकनीक के जरिए लगातार होने वाली निगरानी लोगों के मन में डर पैदा करती है। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या असहमति व्यक्त करने जैसे अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
- निजता के संरक्षण के अधिकार का हनन: जरूरत से अधिक डेटा संग्रह करना और उसे दीर्घकाल तक भंडारित रखने हेतु सहमति प्राप्त करना वास्तव में केवल "क्लिक करने की औपचारिकता" बन गई है। ये व्यक्ति का अपने निजी डेटा पर वास्तविक नियंत्रण खत्म करते हैं।
- अस्पष्ट एल्गोरिदम: सरकारी योजनाओं, पुलिसिंग और नौकरियों में जब निर्णय स्वचालित प्रणालियों द्वारा लिए जाते हैं और यह नहीं बताया जाता कि निर्णय क्यों लिया गया, तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
- डिजिटल शक्ति का संकेन्द्रण: सारी शक्तियां सरकारी संगठनों, विधि लागू करने वाली एजेंसियों और बिग-टेक कंपनियों के पास सिमट गई है। इससे आम नागरिक केवल "डेटा का एक हिस्सा" बनकर रह गया है और उसके पास अपने अधिकारों का उपयोग करने की शक्ति कम हो गई है।
- पूर्वाग्रह और भेदभाव: AI और चेहरे की पहचान करने वाली तकनीकें अक्सर लैंगिक, नृजातीय और सामाजिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं। इससे सुभेद्य वर्गों (वंचित समुदाय) के लोगों को गलत तरीके से निशाना बनाया जा सकता है या उन्हें सुविधाओं से वंचित कर दिया जा सकता है।
- निगरानी तंत्र कमजोर होना: निगरानी प्रणालियों और एल्गोरिदम की जांच करने के लिए स्वतंत्र ऑडिट या न्यायिक नियंत्रण के अभाव के कारण जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पाती है।
डिजिटल जगत में अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारत के सांविधिक तंत्र
- न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017): इस ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने 'निजता के संरक्षण के अधिकार' (Right to Privacy) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार माना।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023: यह अधिनियम व्यक्तिगत डेटा प्राप्त करने, उनका उपयोग करने और सुरक्षित रखने के लिए सांविधिक रूपरेखा तय करता है। यह अधिनियम डेटा प्रिंसिपल (डेटा देने वाले नागरिकों) और डेटा फिड्यूशरी (डेटा रखने वाली कंपनियों) के अधिकार और कर्तव्य भी निर्धारित करता है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000: यह अधिनियम डिजिटल प्लेटफॉर्म, साइबर अपराध और सोशल मीडिया जैसे मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म के दायित्वों का विनियमन करता है।
- क्षेत्रक-विशिष्ट नियमावलियां और नीतियां: इनमें साइबर सुरक्षा के लिए भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (Indian Computer Emergency Response Team: CERT-In) के दिशा-निर्देश, सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के लिए IT नियम 2021 तथा संचार व वित्तीय डेटा के लिए टेलीकॉम और फिनटेक विनियम शामिल हैं।
- नेट न्यूट्रैलिटी विनियम: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) की सिफारिशों पर, दूरसंचार विभाग ने टेलीकॉम ऑपरेटर्स के लिए लाइसेंसिंग नियमों में बदलाव किए। इन नियमों का उद्देश्य इंटरनेट पर किसी भी कंटेंट या जानकारी के साथ भेदभाव न किया जा सके। हालांकि, इंटरनेट नेटवर्क को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए उचित ट्रैफिक प्रबंधन के कुछ सीमित मामलों में छूट दी गई है।
- नेट न्यूट्रैलिटी का अर्थ है- इंटरनेट सेवा-प्रदाताओं (Internet Service Providers: ISPs) को सभी डेटा को एक समान मानना चाहिए। वे किसी विशेष वेबसाइट या ऐप की अपलोड गति कम नहीं कर सकते (Throttling), उसे ब्लॉक नहीं कर सकते और न ही धनराशि लेकर किसी को प्राथमिकता दे सकते हैं।
डिजिटल संविधानवाद के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण:
- यूरोपीय संघ (EU): यह डिजिटल संविधानवाद का सबसे मानक रूप निर्धारित करता है। यहाँ डिजिटल अधिकारों को मूल अधिकारों का ही विस्तार माना गया है। इन अधिकारों को सामान्य डिजिटल संरक्षण विनियम (2018), डिजिटल सेवा अधिनियम, आदि के माध्यम से लागू किया गया है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: इनके डिजिटल संविधानवाद का मॉडल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मजबूती से संरक्षण, बाजार-आधारित व्यवस्था और एकाधिकार-रोधी (Anti-trust) प्रावधानों पर टिका है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं: संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकार से संबद्ध विधियों को डिजिटल जगत तक पहुंचाने की कोशिश की है। इनका मुख्य ध्यान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता का संरक्षण के अधिकार और इंटरनेट तक पहुंच सुनिश्चित करने पर है।
आगे की राह
- डिजिटल गवर्नेंस का संवैधानिकरण: विधियों में डिजिटल अधिकारों (जैसे निजता के संरक्षण का अधिकार, डेटा तक पहुंच, एल्गोरिदम की निष्पक्षता) को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। यह व्यवस्था पुट्टास्वामी वाद में निर्धारित अनुपातिकता का परीक्षण और उचित कारण के मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।
- अनुपातिकता के अनुसार उद्देश्य और उठाए गए कदम के बीच स्पष्ट एवं तार्किक संबंध होना चाहिए। इसी सिद्धांत के आधार पर न्यायालय ने कहा कि कल्याणकारी योजनाओं में आधार नंबर का उपयोग करना सही है लेकिन बैंक खातों और मोबाइल नंबर से आधार को अनिवार्य रूप से जोड़ना सही नहीं है।
- स्वतंत्र निगरानी: DPDP अधिनियम के तहत गठित होने वाले डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वायत्तता सुनिश्चित की जानी चाहिए और उसे संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
- निगरानी का विनियमन: निगरानी की अनुमति केवल राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी असाधारण परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए। इसके लिए भी न्यायिक वारंट और आनुपातिकता के परीक्षण के सिद्धांत का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए।
- एल्गोरिदम की जवाबदेही: उच्च जोखिम वाली स्वचालित प्रणालियों के लिए एल्गोरिदम आधारित प्रभाव आकलन अनिवार्य किया जाना चाहिए, विशेष रूप से लोक सेवाओं में इसका पालन जरूरी है। जहां स्वचालित निर्णय लोगों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, वहाँ निर्णय का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। लोगों को अपील करने और समाधान के तरीके भी बताए जाने चाहिए। जैसे सेवा से वंचित किए जाने या ऋण से जुड़े फैसलों के मामलों में।
- परामर्श-आधारित और समावेशी कानून बनाना: विधि-निर्माण की प्रक्रिया में नागरिक समाज, शिक्षाविदों, तकनीकी विशेषज्ञों और हाशिए पर रहने वाले समूहों के साथ व्यापक सार्वजनिक परामर्श को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
- डिजिटल साक्षरता: नागरिकों को इतना सशक्त बनाया जाए कि वे डिजिटल प्राधिकार को समझ सकें, उस पर सवाल उठा सकें और उसे चुनौती दे सकें।
- वैश्विक सहयोग: आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD), कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर वैश्विक साझेदारी (GPAI) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानक-निर्धारण निकायों में भाग लेना चाहिए। इससे अधिकारों पर आधारित डिजिटल गवर्नेंस के नियम बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही, संप्रभुता और निजता के अधिकार का सम्मान करते हुए एक देश से दूसरे देश में डेटा प्रवाह पर सहयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष
डिजिटल संविधानवाद केवल प्रौद्योगिकियों में बदलावों के कारण नहीं उभरा है, बल्कि इसलिए भी उभरी है कि राज्य (सरकार), बाजार और नागरिक समाज जैसे पारंपरिक शक्ति-केंद्रों की शक्ति पर्याप्त संवैधानिक रक्षोपाय के बिना डिजिटल ढांचों में स्थानांतरित हो गई है। जैसे-जैसे शासन व्यवस्था डेटा, एल्गोरिदम और निगरानी पर अधिक निर्भर होती जा रही है, वैसे-वैसे स्वतंत्रता, निजता का संरक्षण, समानता और जवाबदेही जैसे संवैधानिक मूल्यों को मजबूत सुरक्षा-व्यवस्थाओं के रूप में कार्य करना चाहिए। इन सिद्धांतों को डिजिटल प्रणालियों में शामिल करना, मजबूत निगरानी तंत्र, पारदर्शी प्रौद्योगिकी और जागरूक नागरिकों के सहयोग से, यह सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि तकनीकी क्षेत्र में प्रगति लोकतंत्र को कमजोर करने की बजाय उसे सशक्त बनाए।