सुर्ख़ियों में क्यों?
कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 145वीं रिपोर्ट में लोकपाल के जाँच और अभियोजन शाखा (विंग) को क्रियाशील बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने का सुझाव दिया है।
लोकपाल के बारे में
- लोकपाल एक सांविधिक, स्वायत्त और स्वतंत्र भ्रष्टाचार-रोधी संस्थान है। इसकी स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत की गई थी।
- संरचना: इसमें एक अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य (4 न्यायिक और 4 गैर-न्यायिक) होते हैं।
- कुल सदस्यों में से कम-से-कम 50% सदस्य SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग से होने चाहिए।
- नियुक्ति: अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर की जाती है। चयन समिति में निम्नलिखित शामिल होते हैं:
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित न्यायविद।
- अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल: अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) होता है।
- जांच के संबंध में अधिकारिता (क्षेत्राधिकार): इसके दायरे में प्रधानमंत्री, मंत्री, संसद सदस्य, समूह A, B, C और D के अधिकारी तथा केंद्र सरकार के कर्मचारी शामिल होते हैं।
- लोकपाल प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के उन आरोपों की जांच नहीं करेगा जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों, बाह्य और आंतरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष से संबंधित हों।
- जांच शाखा (विंग): लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 11(1) के तहत, लोकपाल को जांच निदेशक (Director of Inquiry) के नेतृत्व में एक जांच विंग गठित करना अनिवार्य है। यह विंग भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act), 1988 के अंतर्गत दंडनीय अपराधों की प्रारंभिक जांच करने के लिए जिम्मेदार होती है।
- अभियोजन शाखा (विंग): लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 12(1) के तहत, लोकपाल लोक सेवकों के अभियोजन (मुकदमा चलाने) के उद्देश्य से अधिसूचना द्वारा एक अभियोजन शाखा का गठन करने का प्रावधान किया गया है। इसके प्रमुख 'अभियोजन निदेशक' होंगे।
- लोकपाल की शक्तियां और कार्य:
- प्रारंभिक जांच या अन्वेषण के लिए भेजे गए मामलों के संबंध में दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (DSPE/CBI) पर अधीक्षण की शक्ति।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट लोकपाल को देनी होगी।
- प्रारंभिक जांच के उद्देश्य से जांच विंग के पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक दीवानी न्यायालय (सिविल कोर्ट) की शक्तियाँ होती हैं।
लोकपाल के कामकाज में समस्याएँ

- जांच शाखा: इसका औपचारिक गठन 2024 में किया गया था, लेकिन यह "व्यवहारतः" क्रियाशील नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकपाल तब तक नियमित नियुक्तियां शुरू नहीं कर सकता जब तक कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा "लोकपाल अधिकारी और कर्मचारी (सेवा की शर्तें) विनियम, 2024" को मंजूरी नहीं मिल जाती।
- अभियोजन शाखा: मामलों की कम संख्या (केवल 7 मामले जिनमें 13 लोक सेवक संलिप्त हैं) के कारण यह लंबित है।
- वर्तमान में, अभियोजन से संबंधित कार्य लोकपाल की पूर्ण पीठ द्वारा संबंधित मामले के जांच अधिकारी को स्थिति की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश देकर किया जा रहा है।
- समर्पित विशेष न्यायालयों का अभाव: लोकपाल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत आने वाले मामलों को प्राथमिकता देने के लिए दिल्ली में एक विशेष न्यायालय स्थापित करने का अनुरोध किया है। हालांकि, यह अनुरोध कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पास लंबित है।
- निधियों का अल्प उपयोग: वित्तीय वर्ष 2024-25 में, लोकपाल ने 67.65 करोड़ रुपये के अपने संशोधित अनुमानित आवंटन का केवल 84.86% (57.41 करोड़ रुपये) ही उपयोग किया।
- अधिनियम में अन्य कमियां:
- संस्था को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है।
- सरकारी विभागों और राज्य जाँच एजेंसियों से पर्याप्त सूचना प्राप्ति में विलंब।
- 7 वर्ष की अवधि बीत जाने के पश्चात भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती।
- न्यायपालिका को लोकपाल के क्षेत्राधिकार से बाहर रखा गया है।
लोकपाल के कामकाज को सुदृढ़ करने की राह
- संसदीय समिति की सिफारिशें:
- शाखाओं का संचालन: समिति इस बात पर बल देती है कि 'जांच' और 'अभियोजन' दोनों शाखाओं का गठन 6 माह के भीतर पूर्ण कर लिया जाना चाहिए। इन शाखाओं की संरचना, कर्मचारी-व्यवस्था (स्टाफिंग) और क्षेत्राधिकार को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
- जब तक ये शाखाएं पूर्णतः क्रियाशील नहीं हो जाती, तब तक चल रहे मामलों को सुव्यवस्थित करने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के साथ एक समर्पित समन्वय तंत्र स्थापित किया जा सकता है।
- विशेष न्यायालयों की स्थापना: समिति लोकपाल के उस अनुरोध का समर्थन करती है जिसमें 2013 के अधिनियम के तहत उत्पन्न मामलों को प्राथमिकता देने हेतु दिल्ली में कम-से-कम एक विशेष न्यायालय को अधिसूचित करने की मांग की गई है। इस मांग का उद्देश्य मुकदमों को एक वर्ष की वैधानिक समय सीमा के भीतर पूरा करना है।
- प्रतिक्रियाओं के लिए अनिवार्य समय सीमा: प्रक्रियागत विलंब को रोकने के लिए समिति यह अनुशंसा करती है कि जांच के दौरान लोक सेवकों द्वारा अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने हेतु एक निश्चित समय-सीमा लागू की जाए। साथ ही, अनुपालन न होने की स्थिति में 'स्वचालित वृद्धि तंत्र' (Automatic escalation mechanism) की व्यवस्था हो।
- डिजिटल अवसंरचना: प्रक्रियागत विलंब को न्यूनतम करने के लिए टिप्पणियों को सुरक्षित और रियल-टाइम (तत्काल) प्रस्तुत करने हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित किए जाने चाहिए।
- उदाहरणार्थ: दक्ष डेटा प्रबंधन और विश्लेषण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का एकीकरण।
- शाखाओं का संचालन: समिति इस बात पर बल देती है कि 'जांच' और 'अभियोजन' दोनों शाखाओं का गठन 6 माह के भीतर पूर्ण कर लिया जाना चाहिए। इन शाखाओं की संरचना, कर्मचारी-व्यवस्था (स्टाफिंग) और क्षेत्राधिकार को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
- अन्य सुझाव:
- विशेषीकृत विशेषज्ञता: भ्रष्टाचार की परिष्कृत होती प्रकृति से निपटने के लिए फोरेंसिक अकाउंटिंग और साइबर जांच सहित विशेषीकृत विशेषज्ञता रखने वाले कर्मियों की नियुक्ति को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- हितधारकों की सहभागिता: जनता को उनके अधिकारों और लोकपाल की भूमिका के विषय में शिक्षित करना चाहिए, ताकि एक ऐसे जागरूक जनमानस का निर्माण हो सके जो भ्रष्टाचार को अब और सहन न करे।
निष्कर्ष
इस प्रकार, यद्यपि लोकपाल के पास सुदृढ़ सांविधिक आधार है, किंतु परिचालन में विलंब और प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा है। एक प्रभावी भ्रष्टाचार-रोधी प्रहरी के रूप में इसकी भूमिका को साकार करने के लिए समय पर संस्थागत सुदृढ़ीकरण, प्रौद्योगिकी का उपयोग और बेहतर समन्वय अनिवार्य है।