सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, पंचायती राज मंत्रालय ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996 की 30वीं वर्षगांठ मनाई गई।
पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 की मुख्य विशेषताएं
- संवैधानिक अधिदेश: यह संविधान के अनुच्छेद 243M(4)(b) को क्रियान्वित करता है। इसके अंतर्गत भाग IX (पंचायती राज) के प्रावधानों को विशिष्ट संशोधनों के साथ पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया है।
- भौगोलिक विस्तार: यह अनुसूचित क्षेत्रों वाले 10 राज्यों, - आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में लागू होता है।
- वर्तमान स्थिति: जनजातीय अनुसूचित क्षेत्रों वाले 10 में से 9 राज्यों ने अपने PESA नियम बना लिए हैं, जबकि ओडिशा ने नियमों का प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार कर लिया है।
- परंपरा को मान्यता: यह अधिनियम जनजातीय समुदायों को उनके परंपरागत कानूनों, सामाजिक प्रथाओं और सामुदायिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन के माध्यम से स्वयं पर शासन करने के अधिकार को विधिक मान्यता देता है।
- सीटों का आनुपातिक आरक्षण: पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों (STs), अनुसूचित जातियों (SCs) और अन्य के लिए सीटों का आरक्षण उनकी वास्तविक जनसंख्या प्रतिशत के अनुरूप होना चाहिए।
- अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए कम से कम 50% सीटें सुनिश्चित की गई हैं।
- इन क्षेत्रों में पंचायतों के सभी स्तरों पर अध्यक्ष का पद अनिवार्य रूप से किसी अनुसूचित जनजाति (ST) के व्यक्ति के पास ही होगा।
- प्रतिनिधित्व-विहीन जनजातियों का नामांकन: किसी जनजातीय समुदाय का कोई भी सदस्य निर्वाचित न होने की स्थिति में राज्य सरकार के पास उस समुदाय के सदस्यों को ब्लॉक या जिला स्तर के निकायों में नामित करने की शक्ति है।
प्रदत्त शक्तियां और अधिकार | अनिवार्य परामर्श के क्षेत्र |
राज्य विधानमंडलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्राम सभाओं और उपयुक्त स्तर पर पंचायतों को निम्नलिखित विशिष्ट शक्तियों से संपन्न किया जाए:
| अधिनियम यह अनिवार्य करता है कि निम्नलिखित कार्यों को शुरू करने से पहले ग्राम सभाओं या उपयुक्त स्तर पर पंचायतों से परामर्श किया जाना चाहिए:
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पेसा (PESA) अधिनियम कार्यान्वयन के लिए पहलें
- डिजिटल नियोजन (PESA-GPDP पोर्टल): इसे 2024 में शुरू किया गया ताकि टोला-वार नियोजन को सुगम बनाया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि विकास कार्य जनजातीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हों।
- भाषाई समावेशन: जमीनी स्तर पर जागरूकता सुनिश्चित करने के लिए पेसा (PESA) से संबंधित पुस्तिकाओं (मैनुअल) का संथाली, गोंडी, भीली और मुंडारी जैसी जनजातीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
- पेसा (PESA) प्रकोष्ठों की स्थापना: मंत्रालय और राज्यों (जैसे आंध्र प्रदेश) में समर्पित प्रकोष्ठ पेसा कार्यान्वयन के लिए तकनीकी और वित्तीय निगरानी प्रदान करते हैं।
- उत्कृष्टता केंद्र (CoE): पंचायती राज मंत्रालय (MoPR) ने जनजातीय स्वशासन पर शोध एवं दस्तावेजीकरण को संस्थागत बनाने के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग किया है।
- राज्य-विशिष्ट अधिसूचना: झारखंड के नए नियमों में पारंपरिक मुखिया (जैसे, मानकी, मुंडा) को ग्राम सभा की बैठकों में अध्यक्ष बनाने का प्रावधान किया गया है। इससे स्वदेशी नेतृत्व को बल मिलता है।
चिंताएं और चुनौतियां
पेसा के कार्यान्वयन में विधिक अस्पष्टताओं, संस्थागत प्रतिरोध, शक्तियों के अप्रभावी हस्तांतरण और जमीनी स्तर की सीमित क्षमता के कारण कई चुनौतियां सामने आती हैं।
- "परामर्श" बनाम "सहमति": अधिनियम में "परामर्श" (Consultation) शब्द की अधिकारियों द्वारा प्रायः गलत व्याख्या की जाती है ताकि ग्राम सभा की स्पष्ट मंजूरी के बिना भी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।
- उदाहरण: वेदांता-नियमगिरी (ओडिशा): समुदाय के कड़े विरोध के बावजूद, शुरुआत में परामर्श का हवाला देते हुए खनन की मंजूरी को आगे बढ़ाया गया था।
- राज्य की विधियों के साथ टकराव: वन, खनन और उत्पाद शुल्क से संबंधित कई राज्य स्तरीय विधियां अभी भी पेसा प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं, जिससे विधिक टकराव उत्पन्न होता है।
- उदाहरण: वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पेसा, 1996 के तहत वनोपज पर नियंत्रण के लिए अतिव्यापी प्रावधान।
- प्रशासनिक जड़ता: नौकरशाही प्रतिरोध और जनजातीय समुदायों में जागरूकता की कमी के परिणामस्वरूप प्रायः उच्च-स्तरीय पंचायतें या अधिकारी ग्राम सभा के निर्णयों की उपेक्षा कर देते हैं।
- उदाहरण: झारखंड में, पेसा अधिनियम के लागू होने के लगभग 30 वर्ष बाद पेसा नियमों को अधिसूचित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप लंबे समय तक प्रशासनिक शून्यता की स्थिति बनी रही और इस बीच भूमि का हस्तांतरण हुआ।
- सीमित राजकोषीय स्वायत्तता: वैधानिक शक्तियाँ होने के बावजूद, कई ग्राम सभाओं के पास स्वतंत्र शासन के लिए आवश्यक निधियों और कर्मियों का वास्तविक हस्तांतरण नहीं है।
- विकास बनाम अधिकार विमर्श: विशेषकर संसाधन-समृद्ध अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा को प्रायः विकास-विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप जनजातीय स्वशासन के लिए सांविधानिक रक्षोपायों पर निष्कर्षण परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
आगे की राह
- विधिक सामंजस्य: राज्यों को पेसा (PESA) की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए असंगत विषय विधियों (खनन, वन, उत्पाद शुल्क) में तत्काल संशोधन करना चाहिए।
- बाध्यकारी सहमति: "परामर्श" की विधिक व्याख्या को सुदृढ़ करके इसे भूमि और संसाधन संबंधी सभी मामलों के लिए "पूर्व सूचित सहमति" के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए।
- सांविधिक संशोधन या बाध्यकारी कार्यकारी दिशा-निर्देशों के माध्यम से स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति के नियमगिरी सिद्धांतों को संहिताबद्ध करना।
- परिणाम-आधारित निगरानी: सामाजिक अंकेक्षण को संस्थागत बनाना और केवल डिजिटल डेटा प्रविष्टि के बजाय ग्राम सभा के निर्णयों के जमीनी प्रभाव पर नजर रखने के लिए PESA-GPDP पोर्टल का उपयोग करना।
- राजकोषीय सशक्तीकरण: स्थानीय परिसंपत्तियों के प्रबंधन में वास्तविक आत्मनिर्भरता को प्राप्त करने के लिए ग्राम सभाओं को निधियों का प्रत्यक्ष अंतरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- विकास विमर्श को पुनर्गठित करना: दोहन आधारित, अधोशीर्ष (टॉप-डाउन) परियोजनाओं के स्थान पर समुदाय के नेतृत्व वाले सतत विकास मॉडल को अपनाया जाना चाहिए तथा जनजातीय स्वशासन को एक संवैधानिक परिसंपत्ति के रूप में माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
PESA के लगभग तीन दशक पूरे होने के साथ ही, अब इसे राजकोषीय स्वायत्तता, विधिक सामंजस्य और प्रशासनिक जवाबदेही द्वारा समर्थित होकर प्रक्रियात्मक परामर्श से ठोस सहमति की ओर निर्णायक रूप से अग्रसर होना चाहिए। हालिया डिजिटल, भाषाई और संस्थागत पहलों के माध्यम से पेसा अनुसूचित क्षेत्रों में महज एक वैधानिक आश्वासन से ऊपर उठकर जनजातीय स्वशासन और समावेशी विकास के एक जीवंत ढांचे के रूप में विकसित हो सकता है।