सुर्खियों में क्यों?
संसद ने विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 (VB-G RAM G) को अधिनियमित किया है। यह नया कानून महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 का स्थान लेगा।
अधिनियम के मुख्य उद्देश्य
- संवर्धित वैधानिक मजदूरी रोजगार गारंटी: प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों का सुनिश्चित मजदूरी रोजगार प्रदान करना। इसका लक्ष्य आजीविका सुरक्षा को 'विकसित भारत @2047' के विजन के अनुरूप सुदृढ़ करना है।
- ग्रामीण अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: विभिन्न योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से जल संरक्षण, आजीविका के साधनों और जलवायु-अनुकूल परिसंपत्तियों के निर्माण हेतु सार्वजनिक कार्यों का प्रभावी उपयोग करना।
- कृषि और श्रम के मध्य संतुलन: ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी-रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए यह ध्यान रखना कि कृषि के चरम मौसम के दौरान खेती के कार्यों के लिए श्रमिकों की कमी न हो।
- अभिसारी और एकीकृत नियोजन: ग्रामीण स्तर पर बहु-स्तरीय नियोजन को बढ़ावा देने के लिए पीएम गति शक्ति प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' के कार्यान्वयन पर बल देना।
- डिजिटल और जवाबदेह शासन: बायोमेट्रिक्स, जीआईएस (GIS) निगरानी, रियल-टाइम डैशबोर्ड और एआई (AI) समर्थित निरीक्षण प्रणालियों के माध्यम से प्रशासन में पारदर्शिता और कार्यकुशलता को सुदृढ़ करना।
प्रमुख वैधानिक प्रावधान
- विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक (VB-NRIS) में एकीकरण: यह अधिनियम जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका और जलवायु-प्रतिरोधिता को प्राथमिकता देते हुए सभी सार्वजनिक कार्यों को 'विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक' में समेकित करता है।
- विकसित ग्राम पंचायत योजना (VGPP) आधारित नियोजन: यह 'पीएम गति शक्ति' और 'राष्ट्रीय स्थानिक प्रणालियों' के साथ एकीकृत योजनाओं के माध्यम से ग्राम पंचायत के नेतृत्व में नियोजन को सुनिश्चित करता है।
- कृषि कार्यों हेतु विशेष प्रावधान: कृषि श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह राज्यों को बुवाई और कटाई के चरम मौसम के दौरान अधिकतम 60 दिनों तक कार्यों को स्थगित रखने की अनुमति देता है।
- केंद्र प्रायोजित योजना (CSS): इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन केंद्र और राज्यों के मध्य साझा उत्तरदायित्व के साथ एक 'केंद्र प्रायोजित योजना' के रूप में किया जाएगा।
- मानकीय और नियम-आधारित आवंटन: यह राज्यों को वस्तुनिष्ठ और नियम-आधारित निधि आवंटन सुनिश्चित करता है। यदि कोई राज्य निर्धारित सीमा से अतिरिक्त व्यय करता है, तो वह भार राज्य द्वारा वहन किया जाएगा। साथ ही, राज्य के भीतर निधि का समान वितरण अनिवार्य है।
- विशेष छूट: यह प्राकृतिक आपदाओं या असाधारण परिस्थितियों के दौरान केंद्र सरकार को अस्थायी छूट/शिथिलता देने के लिए सशक्त बनाता है।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: यह बायोमेट्रिक्स, जीआईएस (GIS) आधारित नियोजन, रियल-टाइम निगरानी, सूचनाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण और सोशल ऑडिट के माध्यम से निगरानी को सुदृढ़ करता है।
- संस्थागत निगरानी ढांचा: इसमें नीतिगत मार्गदर्शन और प्रभावी निगरानी हेतु केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर 'ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदों' और संचालन समितियों की स्थापना का प्रावधान है।
- मजदूरी दर का निर्धारण: केंद्र सरकार को समय-समय पर मजदूरी दरें अधिसूचित करने के लिए अधिकृत किया गया है।
- कार्यान्वयन हेतु राज्य योजनाएं: यह राज्यों को अधिनियम के लागू होने के छह महीने के भीतर अपनी कार्यान्वयन योजनाओं को अधिसूचित करना अनिवार्य बनाता है।
- बेरोजगारी भत्ता: यदि निर्धारित समय सीमा में काम उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो यह राज्यों को बेरोजगारी भत्ता देने के लिए बाध्य करता है, जिससे श्रमिकों हेतु न्यूनतम कानूनी गारंटी सुरक्षित रहती है।
MGNREGA और VB-G RAM G के बीच तुलना
पहलू | मनरेगा | विकसित भारत–G RAM G |
मजदूरी रोजगार गारंटी | प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिनों का सुनिश्चित रोजगार। | प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 125 दिनों का सुनिश्चित रोजगार। |
कार्यों की प्रकृति | सीमित रणनीतिक फोकस के साथ कार्यों की बहुल और बिखरी हुई श्रेणियां। | जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका और जलवायु लचीलेपन पर ध्यान केंद्रित करते हुए 4 स्पष्ट रूप से परिभाषित प्राथमिक क्षेत्र। |
वित्तपोषण का उत्तरदायित्व | केंद्र अकुशल मजदूरी लागत वहन करता है, राज्य बेरोजगारी भत्ता वहन करते हैं। | मजदूरी के लिए राज्य की लागत-साझेदारी: अधिकांश राज्यों के लिए 60:40, कुछ विशेष-श्रेणी के राज्यों के लिए 90:10। |
वैधानिक 'विराम' (पॉज़) प्रावधान | कोई स्पष्ट वैधानिक "विराम अवधि" नहीं। | राज्य एक वित्तीय वर्ष में 60 दिनों तक की अधिसूचना जारी कर सकते हैं जब कार्य निष्पादित नहीं किया जाएगा। |
वित्तपोषण दृष्टिकोण | अप्रत्याशित आवंटन के साथ मांग-आधारित वित्तपोषण। | रोजगार गारंटी को सुरक्षित रखते हुए पूर्वानुमानित बजटिंग सुनिश्चित करने वाला मानकीय वित्तपोषण। |
नियोजन ढांचा | ग्राम पंचायत नियोजन केंद्रीय है। | संस्थागत अभिसरण और अवसंरचना नियोजन को एकीकृत करता है। |
अधिनियम से जुड़ी प्रमुख चिंताएं
- सीमित संसदीय और सार्वजनिक संवीक्षा: विधेयक को सीमित बहस और व्यापक सार्वजनिक परामर्श के बिना जल्दबाजी में पारित किया गया, जिससे इसकी लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न उठते हैं।
- अधिकार-आधारित ढांचे का क्षरण: यह अधिनियम आपूर्ति-आधारित और सीमित आवंटन मॉडल की ओर स्थानांतरित होकर मनरेगा के मांग-आधारित और अधिकार-आधारित चरित्र को प्रभावित करता है, जिससे कार्य के वैधानिक अधिकार को आघात पहुंचता है।
- संघवाद का क्षरण: निधि आवंटन और योजना के संचालन सहित निर्णय लेने की शक्तियां केंद्र के पास हैं, जिससे राज्य केवल कार्यान्वयन एजेंसियां बनकर रह गए हैं।
- राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: लागत-साझेदारी (60:40) और राज्यों द्वारा अतिरिक्त व्यय वहन करने की आवश्यकता राज्य के वित्त पर दबाव डालती है, जिससे राजकोषीय स्वायत्तता कमजोर होती है।
- पारदर्शिता और सार्वजनिक संवीक्षा का कमजोर होना: अधिनियम में सार्वजनिक प्रकटीकरण के दायरे, सूक्ष्मता और प्रवर्तनीयता पर स्पष्टता का अभाव है।
- डिजिटल प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता: बायोमेट्रिक उपस्थिति, जीपीएस (GPS) निगरानी और डिजिटल डैशबोर्ड का अनिवार्य उपयोग तकनीकी विफलताओं या अपवर्जन के कारण श्रमिकों को काम और मजदूरी से वंचित कर सकता है।
- डेटा संरक्षण व्यवस्था से जोखिम: 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023' इस बात पर अनिश्चितता पैदा करता है कि कौन सी जानकारी सार्वजनिक पटल पर रहेगी, जिससे कार्यक्रम के डेटा तक पहुंच संभावित रूप से प्रतिबंधित हो सकती है।
निष्कर्ष
VB-G RAM G अधिनियम के लिए एक विश्वसनीय मार्ग केवल इसकी वैधानिक रूपरेखा में नहीं, बल्कि इसके कार्यान्वयन की भावना में निहित है। यदि इसके साथ सुदृढ़ संसदीय निगरानी, राज्यों और पंचायतों के साथ वास्तविक परामर्श, मजबूत सोशल ऑडिट तंत्र और डिजिटल बहिष्करण के विरुद्ध स्पष्ट सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं, तो यह अधिनियम एक संतुलित साधन के रूप में विकसित हो सकता है, जो आजीविका सुरक्षा को दीर्घकालिक ग्रामीण परिसंपत्ति निर्माण के साथ संयोजित करता है।
तकनीकी नवाचार को संघवाद, पारदर्शिता और काम के अधिकार के संवैधानिक सिद्धांतों के साथ संरेखित करना यह सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य होगा कि मनरेगा से यह संक्रमण 'विकसित भारत @2047' के तहत परिकल्पित समावेशी ग्रामीण विकास की नींव को मजबूत करे।