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द्विपक्षीय निवेश संधि (BILATERAL INVESTMENT TREATY: BIT)

02 May 2025
35 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

केंद्रीय बजट 2025 में मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) के प्रावधानों में संशोधन के संबंध में घोषणा की गई थी, ताकि इसे और अधिक निवेशक-अनुकूल बनाया जा सके।

द्विपक्षीय निवेश संधियों (BIT) के बारे में

  • इन्हें अंतर्राष्ट्रीय निवेश समझौतों (International Investment Agreements: IIAs) के नाम से भी जाना जाता है। ये समझौते विदेशी निवेशकों को उन नीतिगत या नियामक उपायों के विरुद्ध सुरक्षा का आश्वासन देते हैं, जो उनके निवेश को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही, ये समझौते यह संतुलन भी स्थापित करते हैं कि एक देश को अपने क्षेत्र में निवेश को विनियमित करने का संप्रभु अधिकार प्राप्त है।
  • अवधारणा: ये संधियां निवेशकों को मेजबान देश (जैसे- भारत, जहां विदेशी निवेश किया जाता है) के खिलाफ कानूनी दावा करने का अधिकार देती हैं। 
    • निवेशकों को यह अधिकार निवेशक-राज्य विवाद निपटान (Investor-State Dispute Settlement: ISDS) प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त होता है, जबकि निवेशक के गृह देश (जैसे- संयुक्त राज्य अमेरिका) को राज्य-राज्य विवाद निपटान (State-to-State Dispute Settlement) के माध्यम से यह अधिकार प्रदान किया जाता है।
  • भारत ने 2015 में नए मॉडल BIT को मंजूरी दी थी, जिसने भारतीय मॉडल BIT, 1993 का स्थान लिया है।
    • तब से, इस नए मॉडल BIT का उपयोग न केवल नए BITs के लिए, बल्कि व्यापक आर्थिक सहयोग समझौतों (CECA), व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौतों (CEPA) और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के निवेश संबंधी प्रावधानों पर वार्ता या पुनः वार्ता के आधार के रूप में किया जा रहा है।
  • हाल ही में, उज्बेकिस्तान (2024 में) और संयुक्त अरब अमीरात (2024 में) के साथ BITs पर हस्ताक्षर किए गए हैं। 

मॉडल BIT 2015 की प्रमुख विशेषताएं

  • निवेश की "उद्यम" आधारित परिभाषा: इसका तात्पर्य एक ऐसे उद्यम से है, जिसे देश के घरेलू कानूनों के अनुसार एक निवेशक द्वारा पूर्ण विश्वास के साथ गठित, संगठित और संचालित किया जाता है।
  • उचित प्रक्रिया के माध्यम से गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार: इसके तहत प्रत्येक पक्ष (संधिकर्ता देश) द्वारा निवेश और निवेशकों को पूर्ण संरक्षण एवं सुरक्षा प्रदान की जाती है।
  • राष्ट्रीय व्यवहार: विदेशी निवेशकों को घरेलू कंपनियों के समान दर्जा देना।
  • एक्सप्रोप्रिएशन (स्वत्वाधि‍हरण) के खिलाफ सुरक्षा (Protections against expropriation): कोई भी पक्ष किसी निवेशक के निवेश का प्रत्यक्ष रूप से या उस निवेश के स्वामित्व पर अधिकार कर निवेश का राष्ट्रीयकरण नहीं कर सकता। 
  • कुछ गतिविधियों को इसके दायरे से बाहर रखा जाना: जैसे- सरकारी खरीद, कराधान, सब्सिडी, अनिवार्य लाइसेंस और राष्ट्रीय सुरक्षा।
  • निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) की व्यवस्था: एक विदेशी निवेशक को ISDS तंत्र अपनाने से पहले कम-से-कम पांच वर्ष की अवधि के लिए उस देश के स्थानीय विवाद निपटान तंत्रों का उपयोग करना चाहिए।

 

भारत के वर्तमान BIT ढांचे से जुड़ी समस्याएं

  • अस्पष्टता: इसमें "निवेश", "प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून (Customary International Law: CIL)" आदि शब्दावली में स्पष्टता का अभाव है। इस वजह से ISDS अधिकरण द्वारा संधि की व्याख्या में विवाद और चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
  • उदाहरण के लिए- विदेश मामलों की समिति (2021-22) के अनुसार, भारत को विवाद से संबंधित 37 नोटिस प्राप्त हुए हैं। इनमें से 8 अभी भी अलग-अलग मध्यस्थता चरणों में हैं।
  • एक नियत समय तक स्थानीय अदालतों का उपयोग: निवेशकों को किसी भी विवाद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने से पहले भारत के स्थानीय अदालतों में एक निश्चित अवधि तक कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होता है। भारत की अदालतों पर पहले से ही काम का बहुत बोझ है, इसलिए इस नियम की वजह से विवादों का निपटारा होने में और ज़्यादा समय लग सकता है। इससे निवेशकों के लिए कानूनी प्रक्रिया और भी अनिश्चित हो जाती है।
  • ISDS अधिकरणों के अधिकार क्षेत्र पर प्रतिबंध: उन्हें घरेलू न्यायालय द्वारा लिए गए निर्णय के "मेरिट" की समीक्षा करने से रोक दिया गया है, बिना यह परिभाषित किए कि "मेरिट" का क्या अर्थ है।
  • मॉडल BIT में निम्नलिखित मुद्दों के कारण विदेशी निवेशकों को सीमित अधिकार प्राप्त हैं:
    • "निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार" मानकों को छोड़ दिया गया है। इसके अलावा, मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) और "वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation)" के सिद्धांत भी अनुपस्थित हैं।
    • कर-संबंधी विनियामक उपायों को शामिल न करने से निवेशकों का विश्वास कम हो जाता है।
    • ISDS अधिकरणों के पास यह शक्ति नहीं है कि वे सरकार को अपनी नीतियों में कोई बदलाव करने का आदेश दें। वे केवल यही फैसला दे सकते हैं कि अगर किसी विदेशी निवेशक को नुकसान हुआ है, तो उसे पैसे के रूप में मुआवजा दिया जाए। 
  • ICSID सम्मेलन में शामिल न होना: भारत निवेश संबंधी विवादों के निपटान के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Centre for Settlement of Investment Disputes: ICSID) का सदस्य नहीं है। इस वजह से, जो निवेशक ICSID के माध्यम से भारत में अपने फैसले लागू करवाना चाहते हैं, उनके पास सीमित विकल्प ही बचते हैं।
    • ICSID को ICSID कन्वेंशन द्वारा 1966 में स्थापित किया गया था। यह विश्व बैंक की एक संस्था है। यह अनुबंधित देशों और अनुबंध करने वाले अन्य देशों के नागरिकों के बीच निवेश संबंधी विवादों के सुलह एवं माध्यस्थम् (Conciliation and arbitration) की सुविधा प्रदान करता है।

आगे की राह

  • देशों और निवेशकों के लिए शब्दावली में अधिक स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए तथा माध्यस्थम् संबंधी विवेकाधिकार पर अंकुश लगाना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए, भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हुई द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) में यह साफ-साफ बताया गया है कि किस तरह की सरकारी कार्रवाई को संधि का उल्लंघन माना जाएगा। इसकी बजाय, संधि में यह कहा जाना चाहिए था कि देश की कार्रवाई को प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून (CIL) के सिद्धांतों के अनुसार आंका जाएगा।
  • स्थानीय उपायों की अनिवार्य उपयोग अवधि को समाप्त या कम कर देना चाहिए। साथ ही, निवेशकों को घरेलू न्यायालयों या अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के बीच चयन करने की अनुमति देनी चाहिए। 
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी निवेशकों के साथ समान व्यवहार किया जाए, BITs में MFN के प्रावधानों को उचित शर्तों के साथ शामिल किया जाना चाहिए ताकि "ट्रीटी शॉपिंग" को रोका जा सके।
    • ट्रीटी शॉपिंग आमतौर पर ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें कोई व्यक्ति जटिल कंपनियों या कानूनी संरचनाओं का उपयोग कर दो देशों के बीच कर संधि से मिलने वाले लाभों का अप्रत्यक्ष रूप से लाभ उठाने का प्रयास करता है, जबकि वह स्वयं उन देशों में से किसी का निवासी नहीं होता।
  • यूरोपीय संघ की नई पीढ़ी की निवेश संधियों में शामिल निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार (Fair and Equitable Treatment) के प्रावधान की तरह, भारत को भी इस सिद्धांत को एक सीमित और स्पष्ट रूप में अपनाना चाहिए। ऐसा प्रावधान किसी देश की मनमानी कार्रवाई को अवैध ठहराने की अनुमति देगा, साथ ही निवेशकों और संप्रभु राज्यों के अधिकारों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने में मदद करेगा।
  • विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रवर्तन तंत्र प्रदान करके निवेशकों का विश्वास बढ़ाने के लिए ICSID कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने चाहिए। 
  • व्यापक कर उपायों को शामिल किया जाना चाहिए। ISDS अधिकरणों को नीतिगत मामलों में राष्ट्रीय प्राधिकारियों के निर्णय को स्थगित करते हुए अपमानजनक या भेदभावपूर्ण कर संबंधी कार्रवाइयों की समीक्षा करने की अनुमति देनी चाहिए। 
  • विदेशी कानूनी फर्मों पर निर्भरता कम करने और माध्यस्थम लागत (Arbitration costs) को नियंत्रित करने के लिए निवेश माध्यस्थम में घरेलू संरचना का विकास करना चाहिए।
    • भारत को निवेश माध्यस्थम का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए नई दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम केंद्र (NDIAC) को बढ़ावा देना और विकसित करना चाहिए।
    • अंतर्राष्ट्रीय निवेश माध्यस्थम में विशेषज्ञता वाले घरेलू वकीलों और कानूनी फर्मों का एक समूह बनाना चाहिए।

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