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डीप ओशन मिशन (DEEP OCEAN MISSION)

10 Apr 2025
28 min

सुर्ख़ियों में क्यों? 

हाल ही में, "मत्स्य 6000" नामक चौथी पीढ़ी की गहरे समुद्र में चलने वाली पनडुब्बी ने अपना वेट टेस्टिंग सफलतापूर्वक पूरा किया। 

मत्स्य 6000 के बारे में

  • "मत्स्य 6000" समुद्रयान परियोजना (डीप ओशन मिशन के तहत एक परियोजना) के तहत स्वदेशी रूप से विकसित मानव चालक दल युक्त पनडुब्बी है। 
  • समुद्रयान परियोजना का उद्देश्य (अवधि 2020-2021 से 2025-2026): गहरे समुद्र में अन्वेषण/ खोज के लिए वैज्ञानिक उपकरणों के साथ 3 लोगों को समुद्र में 6000 मीटर की गहराई तक ले जाने के लिए एक सेल्फ-प्रोपेल्ड मानवयुक्त पनडुब्बी विकसित करना है।
  • इसे राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) द्वारा विकसित किया गया है। यह तीन लोगों को समुद्र में 6000 मीटर की गहराई तक ले जाने के लिए डिज़ाइन की गयी है।
    • चेन्नई स्थित राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है।
  • उद्देश्य: 6000 मीटर गहराई तक गहरे समुद्र के संसाधनों और समुद्री जैव विविधता का व्यापक अध्ययन करना।
  • इसके सफल लॉन्च के बाद, मानव-चालक दल युक्त समुद्र के अंदर अभियान भेजने में सक्षम भारत छठा देश बन गया है। अन्य पांच देश अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और चीन हैं। 

डीप ओशन मिशन के बारे में

  • लॉन्च: इसे 2021 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) द्वारा कैबिनेट की मंजूरी के साथ केंद्रीय क्षेत्रक की एक योजना के रूप में शुरू किया गया था। 
  • उद्देश्य: गहरे समुद्र के संसाधनों की खोज करने, संधारणीय समुद्री विकास को बढ़ावा देने, ब्लू इकोनॉमी पहल का समर्थन करने तथा जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से निपटने के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास करना। 
  • वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप: यह मिशन संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 14 (SDG-14) के अनुरूप है। SDG-14 "जलीय जीवन" के संरक्षण तथा जीवन और पर्यावरण को बनाए रखने में महासागर की भूमिका पर केंद्रित है। 
    • संधारणीयता के मामले में महासागरों के महत्व को ध्यान में रखते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने 2021-2030 के दशक को "महासागरीय विज्ञान और सतत विकास दशक" घोषित किया है। 
  • बजट और समय-सीमा: इस मिशन का अनुमानित बजट 4077 करोड़ रुपये है। इस मिशन को चरणबद्ध तरीके से 5 वर्षों (2021-2026) में कार्यान्वित किया जाना है। 
    • प्रथम चरण (2021-2024) के लिए 2823.4 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। 
  • नोडल मंत्रालय: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES), इस बहु-संस्थागत मिशन का प्रबंधन करने वाला नोडल मंत्रालय है। 

डीप ओशन मिशन का महत्व 

  • सामरिक महत्व: भारत की 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा, नौ तटीय राज्य और 1,382 द्वीप के साथ-साथ अद्वितीय समुद्री स्थिति भारत को समुद्री संसाधनों के उपयोग की महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान करती है। 
  • भारत को लगभग 23,72,298 वर्ग किमी का अनन्य आर्थिक क्षेत्र आवंटित है, जिसका अभी पूरी तरह से उपयोग और अन्वेषण नहीं किया गया है। 
  • यह मिशन सरकार के 'न्यू इंडिया' विजन का समर्थन करता है, जो ब्लू इकोनॉमी को संवृद्धि के दस प्रमुख आयामों में से एक मानता है। 
  • आर्थिक प्रभाव: इसका उद्देश्य दीर्घकालिक आर्थिक लाभ के लिए समुद्री संसाधनों का संधारणीय उपयोग सुनिश्चित करना है। यह GDP की संवृद्धि, बेहतर आजीविका और रोजगार सृजन में योगदान देगा। 
  • इसके तहत निकेल, कोबाल्ट और पॉलिमेटेलिक नोड्यूल्स सहित अन्य खनिजों जैसे संसाधनों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: यह मानव चालक दल युक्त पनडुब्बी के माध्यम से गहरे समुद्र में अन्वेषण की सुविधा प्रदान करता है। इससे वैज्ञानिकों को अज्ञात गहरे समुद्री क्षेत्रों का प्रत्यक्ष रूप से निरीक्षण एवं अध्ययन करने में सहायता मिलती है। 
  • अंडरवॉटर इंजीनियरिंग: इससे परिसंपत्तियों के निरीक्षण और समुद्री अवसंरचना की सुरक्षा एवं रख-रखाव में नवाचार को बढ़ावा मिलता है। 
  • महासागर संबंधी साक्षरता और पर्यटन: यह समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों के बारे में आम लोगों के मध्य  जागरूकता को प्रोत्साहित करता है और समुद्री पर्यटन के लिए नए रास्ते भी खोलता है। 

डीप ओशन मिशन के समक्ष मौजूद चुनौतियां 

  • उच्च दबाव: 5,000 मीटर की गहराई पर दबाव समुद्र की सतह पर दबाव से लगभग 500 गुना ज्यादा होगा। इसलिए इस मिशन के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए और टिकाऊ उपकरणों की जरूरत होगी, जो इस अत्यधिक दबाव को झेल सकें एवं अपना काम सुचारू रूप से कर सकें।
  • तकनीकी चुनौतियां: 
    • उपकरण संबंधी सुभेद्यता: जल के अंदर इलेक्ट्रॉनिक्स और उपकरणों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।  
    • खनन संबंधी चुनौतियां: समुद्र तल से सतह तक खनिज और अन्य संसाधनों को पंप करके सतह पर लाने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 
    • संचार संबंधी सीमाएं: जल के भीतर वेव्स बैकस्कैटरिंगम हाई एट्यूएशन,आदि के चलते संचार प्रणालियों को चुनोतियों का सामना करना पड़ता है।
  • भू-राजनीतिक और सामरिक चुनौती: चीन की गहरे समुद्र में बढ़ती उपस्थिति विशेष रूप से दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में  भारत के अन्वेषण संबंधी प्रयास को बाधित कर सकती है। 

आगे की राह

  • स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ाना: भारत को महासागरीय अनुसंधान संबंधी पोतों और एकूस्टिक रिसर्च सिस्टम्स में अतिरिक्त निवेश करना चाहिए। इससे गहरे समुद्र की खोज में भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का लाभ उठाना: भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों के साथ भागीदारी करनी चाहिए। इससे विशेषज्ञता, संसाधन-साझाकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा। 
    • क्वाड जैसे मंच गहरे समुद्री अनुसंधान और खनन में समन्वित प्रयासों को बढ़ावा दे सकते हैं। 
  • हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) का उपयोग करना: भारत को गहरे समुद्र में अन्वेषण रणनीतियों को मजबूत करने के लिए IPOI's के चार प्रमुख स्तंभों अर्थात समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री संसाधन, क्षमता-निर्माण और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

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