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चोल गंगम झील (CHOLA GANGAM LAKE) | Current Affairs | Vision IAS
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चोल गंगम झील (CHOLA GANGAM LAKE)

Posted 19 Aug 2025

Updated 28 Aug 2025

1 min read

सुर्ख़ियों में क्यों?

तमिलनाडु सरकार ने गंगईकोंडा चोलपुरम में 1000 साल पुरानी चोल गंगम झील को विकसित करने का फैसला किया है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • यह घोषणा राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती मनाने के लिए आयोजित आदि तिरुवथिराई महोत्सव के दौरान की गई।
  • आदि तिरुवथिराई महोत्सव राजेंद्र चोल प्रथम के दक्षिण पूर्व एशिया के समुद्री अभियान और गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण के 1,000 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में मनाया गया।
    • यह महोत्सव तमिल शैव भक्ति परंपराओं, 63 नयनारों और चोल राजवंश द्वारा संरक्षण प्रदान किए गए संत-कवियों के प्रति सम्मान है। इसके अलावा, यह शैव सिद्धान्त दर्शन को भी रेखांकित करता है।

चोल गंगम झील के बारे में

  • चोला गंगम झील को पोन्नेरी झील के नाम से भी जाना जाता है। यह इंसान द्वारा निर्मित भारत की सबसे बड़ी प्राचीन झील मानी जाती है।
  • स्थान: यह झील भारत के तमिलनाडु राज्य के अरियालुर जिले में गंगईकोंडा चोलपुरम के नजदीक स्थित है।
  • निर्माण: इसका निर्माण राजेंद्र चोल प्रथम ने करवाया था।
    • राजेंद्र चोल प्रथम (1014 से 1044 ईस्वी) सबसे शक्तिशाली चोल शासक राजराज प्रथम के सुपुत्र थे।
    • राजेंद्र चोल प्रथम गंगा घाटी को जीतकर 'गंगईकोंडा चोल' ("गंगा को जीतने वाला चोल") की उपाधि धारण की थी।
      • तिरुवलंगडू ताम्रपत्रों के अनुसार, राजेंद्र चोल प्रथम ने गांगेय क्षेत्र अभियान (कलिंग शासक और बंगाल के पाल शासक महिपाल सहित कई राजाओं पर विजय) की सफलता के उपलक्ष्य में गंगईकोंडा चोलपुरम को अपनी राजधानी बनाया।
  • इतिहास
    • राजेंद्र चोल प्रथम ने गंगा नदी का पवित्र जल इस झील में डाला था। इसी वजह से झील का नाम चोल गंगम रखा गया।
  • यह झील राजेंद्र चोल द्वारा स्थापित विजय का 'जल स्तंभ' मानी जाती है।
  • विजयनगर काल के दौरान इस झील को पोन्नेरी कहा जाता था।
  • जल स्रोत: इस झील को एक नहर से कोलिडाम नदी से जोड़ा गया है। कोलिडाम कावेरी नदी की एक सहायक नदी है।
  • संरचना: झील के अंडाकार तटबंध को लैटेराइट चट्टानों से मजबूती प्रदान की गई है।
  • उद्देश्य: गंगईकोंडा चोलपुरम झील का निर्माण पेयजल और सिंचाई के लिए कराया गया था।

चोल साम्राज्य (9वीं शताब्दी - 13वीं शताब्दी) के बारे में 

  • उत्पत्ति:  शुरुआत में चोल पल्लवों के अधीन उरैयूर में सामंत के रूप में कार्य करते थे।  9वीं शताब्दी में विजयालय चोल के नेतृत्व में मध्यकालीन चोल साम्राज्य की स्थापना मानी जाती है। 
  • प्रमुख अभिलेख: चोलों की प्रशासनिक और स्थानीय स्वशासन चुनाव प्रणाली का विवरण उत्तरमेरुर अभिलेख में मिलता है।
  • प्रशासन: चोल साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था जिन्हें मंडलम कहा जाता था। मंडलम के नीचे की प्रशासनिक इकाइयां वलनाडु → नाडु → कुर्रम और कोट्टम थीं।
  • स्थानीय स्व-शासन: भारत के इतिहास में चोलों की स्थानीय स्वशासन प्रणाली का विशिष्ट महत्त्व है। चोल काल में ग्राम सभा को उर या सभा के नाम से जाना जाता था। इसके सदस्यों का चुनाव पर्चियां निकालकर की जाती थीं, जिसे स्थानीय भाषा में कुडावोलाई प्रणाली कहा जाता था।
  • कर प्रणाली: वेट्टि (बंधुआ मजदूरी), और कडमई (भू-राजस्व)।
  • समुद्री:
    • शक्तिशाली नौसेना: चोल शासक राजराज चोल ने शक्तिशाली नौसेना का गठन किया जिसे राजेंद्र चोल ने और मजबूत किया। सबसे प्रसिद्ध सैन्य अभियान- 1025 ई. में श्रीविजय साम्राज्य (दक्षिण-पूर्व एशिया) पर नौसैनिक अभियान था।
    • चोल शासकों के श्रीलंका, चीन, मालदीव और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध थे।
    • प्रमुख चोल बंदरगाह: महाबलीपुरमकावेरीपट्टनम (जिसे पूम्पुहार भी कहा जाता है), और कोरकई
  • सांस्कृतिक उपलब्धियां:
    • भव्य मंदिर: महान चोल मंदिर (गंगईकोंडा चोलपुरम, ऐरावतेश्वर और बृहदेश्वर) यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
    • मूर्तियां: चोल कालीन कांस्य प्रतिमाओं का भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में उल्लेखनीय स्थान है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण चोलकालीन नटराज शिव की प्रतिमा है।

महत्त्वपूर्ण चोल मंदिर 

विवरण 

बृहदेश्वर मंदिर के बारे में

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के बारे में

ऐरावतेश्वर मंदिर के बारे में

स्थान 

तंजावुर जिला

गंगईकोंडा चोलपुरम

तंजावुर जिले के दारासुरम में

स्थापत्य शैली 

द्रविड़

द्रविड़

द्रविड़ शैली, यह मंदिर रथ जैसा प्रतीत होता है।

अधिष्ठाता देवता 

भगवान शिव

भगवान शिव

भगवान शिव

निर्माण काल 

1010 ईस्वी

1035 ईस्वी

12वीं शताब्दी

निर्माता 

राजराज चोल प्रथम

राजेंद्र चोल प्रथम

राजराज चोल द्वितीय

अन्य तथ्य

इसे पेरुवुदैयार कोविल के नाम से भी जाना जाता है।

इसके विमान की ऊंचाई 55 मीटर है। इसे भी बृहदेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

इसका नाम भगवान इंद्र के वाहन सफेद हाथी 'ऐरावत' के नाम पर रखा गया है।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल

सूची में शामिल

सूची में शामिल

सूची में शामिल

प्रमुख विशेषता

मंदिर के अभिलेख और भित्तिचित्र शहर के भाग्य के उदय और पतन का वर्णन करते हैं।

मंदिर के ताखों में पत्थर की मूर्तियां विराजमान हैं: जैसे- नटराज, दक्षिणामूर्ति, हरिहर, लिंगोद्भव, विष्णु, ब्रह्मा, महिषासुरमर्दिनी, ज्ञान सरस्वती आदि

मंदिर पर उत्कीर्ण नक्काशी और अभिलेख भारतीय पुराणों में वर्णित कथाओं का विवरण प्रदान करते हैं। मंदिर की सीढ़ियों पर सुंदर सजावटी उत्कीर्ण संगीत की सात धुनों का प्रतिनिधित्व करते हैं

 

निष्कर्ष

चोल गंगम झील और चोल काल के मंदिर सम्मिलित रूप से चोलों की इंजीनियरिंग प्रतिभा, समुद्री शक्ति, संस्कृति के संरक्षण की प्रतिबद्धता और प्रशासनिक दूरदृष्टि की कहानी बयां करते हैं। चोल स्थापत्य में उपयोगिता, कला और आध्यात्मिकता का सहज मिश्रण देखने को मिलता है। उनकी जल प्रबंधन प्रणाली, स्थापत्य विशिष्टता, समुद्री अभियान और शैव परंपराओं के संरक्षण जैसे कार्य आज भी भारतीय संस्कृति के गौरव को बढ़ाते हैं।

  • Tags :
  • Gangaikonda Cholapuram
  • Sangam Age
  • Imperial Chola
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