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आसियान (ASEAN)

30 Nov 2024
58 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, प्रधान मंत्री ने लाओस (लाओ पीडीआर) के वियनतियाने में 21वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में भाग लिया। 

आसियान (दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का संगठन) के बारे में

  • यह एक अंतर-सरकारी समूह है। इसका उद्देश्य अपने सदस्यों व एशिया के अन्य देशों के बीच राजनीतिक एवं आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।  
  • आसियान की स्थापना 1967 में आसियान घोषणा-पत्र (बैंकॉक घोषणा-पत्र) पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी। इस घोषणा-पत्र पर इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड ने हस्ताक्षर किए थे। 
    • वर्तमान में इसके 10 सदस्य हैं (मानचित्र देखें)।
  • मुख्यालय: इसका मुख्यालय इंडोनेशिया के जकार्ता में स्थित है।  
  • संस्थागत तंत्र:
    • आसियान की अध्यक्षता: सदस्य देश प्रतिवर्ष चक्रीय क्रम में आसियान की अध्यक्षता करते हैं। यह सदस्य देशों के अंग्रेजी नामों के वर्णमाला क्रम के आधार पर निर्धारित होती है। 
    • आसियान शिखर सम्मेलन: यह आसियान में नीति-निर्माण हेतु सर्वोच्च निकाय है। इसमें आसियान सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष शामिल होते हैं। आसियान शिखर सम्मेलन की बैठकें वर्ष में दो बार आयोजित की जाती हैं। यह क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा करता है और नीतिगत दिशा-निर्देश निर्धारित करता है।
    • आसियान समन्वय परिषद (ASEAN Coordinating Council: ACC): यह आसियान समझौतों और निर्णयों के कार्यान्वयन की देखरेख करती है।
    • आसियान सचिवालय: यह आसियान की गतिविधियों और पहलों का समर्थन करता है तथा सुगम बनाता है।
    • आसियान क्षेत्रीय मंच (ASEAN Regional Forum: ARF): यह आसियान सदस्य देशों और उनके सहयोगियों के बीच राजनीतिक तथा सुरक्षा मुद्दों पर वार्ता व सहयोग के लिए मंच है।
      • भारत 1996 में ARF में शामिल हुआ था।
    • निर्णय लेना: आसियान के सभी निर्णय आपसी परामर्श और सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
  • आसियान फ्यूचर फोरम:
    • इसे 2023 में वियतनाम ने 43वें आसियान शिखर सम्मेलन में प्रस्तावित किया था।
    • यह आसियान सदस्य देशों के साथ-साथ भागीदार देशों के लिए नए विचारों और नीतिगत सिफारिशों को साझा करने का एक साझा मंच है।
    • भारत इसका एक संस्थापक सदस्य है।

21वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन के मुख्य आउटकम्स

  • आसियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी की प्रगति की समीक्षा की गई और सहयोग की भावी दिशा तय की गई।
    • नेताओं ने आसियान-भारत साझेदारी की पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए एक नई आसियान-भारत कार्य योजना (2026-2030) बनाने पर सहमति व्यक्त की और दो संयुक्त वक्तव्य अपनाए।
    • शिखर सम्मेलन की थीम "कनेक्टिविटी और लचीलापन बढ़ाने (Enhancing Connectivity and Resilience)" के अनुरूप 10-सूत्री योजना की घोषणा की गई।
  • आसियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर संयुक्त वक्तव्य:
    • व्यापार को बढ़ाने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने और सहयोग के लिए आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौते (AITIGA) की समीक्षा में तेजी लाना।
    • संयुक्त गतिविधियों का समर्थन करने के लिए डिजिटल भविष्य हेतु आसियान-भारत फंड के लॉन्च का स्वागत किया गया।
  • डिजिटल परिवर्तन को आगे बढ़ाने पर संयुक्त वक्तव्य:
    • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): DPI विकास में सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों को साझा करना; क्षेत्रीय एकीकरण के लिए संयुक्त पहलों को लागू करना; स्वास्थ्य क्षेत्रक में मौजूद साझा चुनौतियों का समाधान करना आदि।
    • वित्तीय प्रौद्योगिकी: नवीन डिजिटल समाधानों के माध्यम से सीमा-पार भुगतान प्रणालियों पर सहयोग का पता लगाना।
  • साइबर सुरक्षा: डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए साइबर सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने पर सहमति प्रकट की गई। प्रथम आसियान-भारत ट्रैक 1 साइबर नीति वार्ता का स्वागत किया गया।
    • ट्रैक 1 डिप्लोमेसी (कूटनीति) के बारे में:
      • ट्रैक 1 डिप्लोमेसी को आधिकारिक कूटनीति भी कहते हैं। इसके तहत सरकारों के बीच सीधे औपचारिक और आधिकारिक वार्ताएं होती हैं। 
      • ये औपचारिक वार्ताएं राजनयिकों, राष्ट्राध्यक्षों और अन्य आधिकारिक प्राधिकारियों द्वारा आयोजित की जाती हैं।
  • अन्य प्रमुख क्षेत्र: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण, सतत वित्त-पोषण व निवेश, तथा एक कार्यान्वयन तंत्र की भी घोषणा की गई।

कूटनीति के अन्य ट्रैक

  • ट्रैक 1.5 कूटनीति: इसमें सरकारी प्रतिनिधि और गैर-सरकारी विशेषज्ञ (जैसे कि शिक्षाविद, थिंक टैंक के सदस्य, या सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि) औपचारिक ट्रैक 1 कूटनीति से कम औपचारिक ढंग से वार्ताएं और बैठकें करते हैं। यह पारंपरिक ट्रैक 1 कूटनीति और ट्रैक 2 कूटनीति के बीच की कड़ी मानी जाती है।
  • ट्रैक 2 कूटनीति: यह सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना गैर-सरकारी विशेषज्ञों के बीच वार्ता के लिए एक अनौपचारिक माध्यम होता है।

 

 

भारत के लिए आसियान का महत्त्व

  • आर्थिक साझेदारी और व्यापार: आसियान भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और भारत के कुल वैश्विक व्यापार का 11% आसियान के साथ होता है।
    • 2023-24 के दौरान भारत और आसियान के बीच 122.67 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। 
  • हिंद-प्रशांत रणनीति के साथ तालमेल: आसियान सेंट्रलिटी का भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और 'हिंद-प्रशांत' रणनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो इस क्षेत्र में हितों के बीच तालमेल को दर्शाता है।
    • इसके अलावा, भारत अपने पूर्वी पड़ोसी देशों में (उदाहरण- म्यांमार में) स्थिरता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भमिका निभा रहा है।
  • पूर्वोत्तर के साथ कनेक्टिविटी: आसियान के साथ कनेक्टिविटी से संबंधित पहलें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को क्षेत्रीय व्यापार और वाणिज्य के केंद्र के रूप में स्थापित करके आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकती हैं।
    • जैसे- कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट, आदि।
  • चीन के प्रभाव को संतुलित करना: आसियान के साथ संबंधों को मजबूत करने से भारत को क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी।
  • समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना: भारत मलक्का जलडमरूमध्य सहित महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने के लिए आसियान के साथ अपने संबंधों को मज़बूत कर रहा है। यह भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। 
  • पर्यटन और शिक्षा: आसियान देश भारतीय पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। वहीं आसियान देशों के छात्र तेजी से भारत में अध्ययन कर रहे हैं। आसियान देशों के साथ यह सौहार्दपूर्ण संबंध भारत की सॉफ्ट पॉवर व सद्भावना को मजबूत करता है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आसियान का महत्त्व

  • भू-राजनीतिक और आर्थिक केंद्रीयता: आसियान दक्षिण-पूर्व एशिया के केंद्र में अवस्थित है और दक्षिण-पूर्व एशिया गतिशील एशिया-प्रशांत व हिंद महासागर क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम है। एशिया-प्रशांत व हिंद महासागर क्षेत्र आर्थिक संवृद्धि और भू-राजनीतिक परिवर्तन के प्रमुख केंद्र हैं।
  • नियम-आधारित व्यवस्था: आसियान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित सुरक्षा संरचना को बढ़ावा देने में केंद्रीय भूमिका निभाता है, जो क्षेत्र की शांति, सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
  • बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता को संतुलित करना: आसियान सेंट्रलिटी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसी प्रमुख शक्तियों के प्रभाव को संतुलित करने में मदद करती है।
  • कनेक्टिविटी: आसियान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय एकीकरण और विकास को बढ़ावा देने के लिए कनेक्टिविटी पहलों को प्रोत्साहित करता है, जो मास्टर प्लान ऑन आसियान कनेक्टिविटी (MPAC), 2025 का पूरक है।

 

 

भारत-आसियान संबंधों में चुनौतियां

  • आर्थिक चिंताएं: क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) समझौते से बाहर निकलने के भारत के फैसले ने आसियान सदस्यों में आर्थिक तौर पर निराशा की भावना पैदा की है।
  • व्यापार असंतुलन: पिछले कुछ वर्षों में आसियान देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है।
    • 2016-17 में व्यापार घाटा 9.66 बिलियन डॉलर था, जो 2022-23 में बढ़कर 43.57 बिलियन डॉलर हो गया।  
  • बहुपक्षीय जुड़ाव का अभाव: भारत का आसियान देशों के साथ बहुपक्षीय की बजाय द्विपक्षीय आधार पर अधिक जुड़ाव है।  
  • बढ़ता चीनी प्रभाव: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से दक्षिण पूर्व एशिया में चीन की उपस्थिति बढ़ती जा रही है। यह आर्थिक लाभ और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की क्षमता का दोहन करने की आसियान की क्षमता को सीमित करती है।    
  • कनेक्टिविटी: कनेक्टिविटी बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद, भारत और आसियान देशों के बीच भौतिक व डिजिटल कनेक्टिविटी सीमित बनी हुई है।
    • अवसंरचनात्मक परियोजनाओं, जैसे कि कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग आदि को पूरा करने में देरी हो रही है। यह विलंब आसियान व भारत के मध्य आर्थिक सहयोग की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहा है। इससे व्यापार, निवेश और लोगों के बीच संपर्क प्रभावित हो रहा है। 

अन्य बहुपक्षीय संगठनों के संबंध में आसियान का विश्लेषण 

  • क्वाड (QUAD):
    • आसियान सेंट्रलिटी को चुनौती: आसियान का मानना ​​है कि क्वाड संभावित रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी केंद्रीय भूमिका को कमजोर कर रहा है। 
      • क्वाड के रणनीतिक फ्रेमवर्क में संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत जैसी प्रमुख शक्तियों की भागीदारी क्षेत्रीय सुरक्षा व कूटनीतिक मामलों में आसियान के प्रभाव एवं नेतृत्व के संबंध में चिंता पैदा करती है।
    • आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF) पर प्रभाव: आसियान द्वारा स्थापित ARF का उद्देश्य अमेरिका और चीन सहित 27 प्रतिभागियों के लिए राजनीतिक व सुरक्षा वार्ता के लिए एक मंच प्रदान करके हिंद-प्रशांत में आसियान के प्रभाव को बनाए रखना है। 
      • क्वाड के उदय को एक प्रतिस्पर्धी सुरक्षा पहल के रूप में देखा जाता है, जो संभावित रूप से ARF को दरकिनार कर रही है।
    • ZOPFAN फ्रेमवर्क के लिए खतरा: आसियान सदस्यों ने 1971 में शांति, स्वतंत्रता और तटस्थता क्षेत्र (Zone of Peace, Freedom, and Neutrality: ZOPFAN) समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह हिंद-प्रशांत, विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने पर केंद्रित है।  
      • क्षेत्र में क्वाड की गतिविधियों को तटस्थता की इस प्रतिबद्धता को संभावित रूप से कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।
  • दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क/ SAARC):
    • आर्थिक और व्यापार विकास: सार्क की तुलना में आसियान ने क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार में तेजी से वृद्धि की है। इसके विपरीत सार्क आर्थिक एकीकरण और सहयोग का समान स्तर हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
    • क्षेत्रीय पहलों में सफलता: आसियान ने खाद्य सुरक्षा, कृषि विकास, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रकों में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है, जो अक्सर इन क्षेत्रकों में सार्क की उपलब्धियों से बढ़कर है।
  • बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल (BIMSTEC/ बिम्सटेक):
    • दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सेतु: बिम्सटेक सार्क और आसियान देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है। साथ ही, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अंतर-क्षेत्रीय कनेक्टिविटी एवं सहयोग को बढ़ाता है।

 

 

संबंधों को मजबूत बनाने के लिए आगे की राह 

  • 10-सूत्रीय योजना: यह भारत और आसियान देशों के बीच गहन सहयोग, आपसी सम्मान एवं साझा विकास के लिए एक ठोस आधार तैयार करती है। साथ ही, हिंद-प्रशांत में आसियान सेंट्रलिटी के भारत के विज़न को आगे बढ़ाती है। उल्लेखनीय है कि भारत ने अपने इस विज़न को 2018 में शांगरी ला डायलॉग में रेखांकित किया था।  
  • आर्थिक और व्यापार संबंधों को बढ़ाना: व्यापार असंतुलन को दूर करने में मदद करने के लिए आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के दायरे एवं प्रभावशीलता को अपडेट और विस्तारित करना चाहिए।
  • समुद्री सहयोग: भारत और आसियान के बीच एक मजबूत समुद्री सहयोग SLOCs की सुरक्षा की पूरी क्षमता को प्राप्त करने और सामरिक व रणनीतिक हिंद-प्रशांत क्षेत्र की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। 
  • चीन का प्रतिसंतुलन: भारत को एक 'हिंद-प्रशांत समुद्री साझेदारी' शुरू करनी चाहिए, जो आसियान देशों के साथ पारस्परिक रूप से लाभप्रद समुद्री सुरक्षा साझेदारी की तलाश करती हो। 
  • कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना: प्रमुख कनेक्टिविटी परियोजनाओं (जैसे, भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग) को पूरा किया जाना चाहिए। साथ ही, व्यापार एवं सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाते हुए अन्य आसियान देशों तक इन परियोजनाओं के विस्तार का पता लगाने का प्रयास करना चाहिए।
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